आडवाणी जी: एक शताब्दी की ओर बढ़ती प्रेरणादायी यात्रा – प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी
कल 8 नवंबर को श्री लालकृष्ण आडवाणी जी अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ये कितना सुखद संयोग है कि आज ही दीपावली का पावन पर्व भी है। प्रभु श्रीराम और दीपों के इस उत्सव के साथ आडवाणी जी के जीवन का इतना महत्वपूर्ण पड़ाव जुड़ना, इस अवसर को और भी यादगार बनाता है। इस संयोग को एक और बात विशेष बनाती है। इसी वर्ष हम जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती भी मना रहे हैं।

कल का ये अवसर मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भावुक कर देने वाला है। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे हमेशा आडवाणी जी का स्नेह, सान्निध्य और मार्गदर्शन मिलता रहा है। आज उनके साथ बिताए हुए अनगिनत पल, उनसे जुड़ी कितनी ही स्मृतियां मन में उमड़ रही हैं।

सार्वजनिक जीवन में काम करते हुए कई दशक पहले मुझे उनके संपर्क में आने का अवसर मिला था। धीरे-धीरे हमारा ये संबंध इतना आत्मीय हो गया कि वे मेरे लिए अभिभावक की तरह बन गए। उन्होंने मेरा हाथ थामकर मुझे राजनीति की बारीकियां सिखाईं, कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया। जीवन में जब भी कोई कठिन परिस्थिति आई, उनका अनुभव और उनकी सीख मेरे लिए संबल बने। उनकी वैचारिक स्पष्टता, उनका आत्मविश्वास और अपने सिद्धांतों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा ने मुझे हमेशा प्रेरित किया।
आज भी जब मैं उनसे मिलने जाता हूं, तो उनके साथ बिताया हुआ समय मुझे नई ऊर्जा और नई प्रेरणा से भर देता है। आज इस अवसर पर श्रद्धेय आडवाणी जी के लिए मन में एक ही भाव उमड़ रहा है…
“जीवेत शरदः शतं, पश्येम शरदः शतं, शृणुयाम शरदः शतं।”
ऐसे व्यक्तित्व बहुत कम हैं, जिनके जीवन में आधुनिक भारत के इतिहास के इतने सारे अध्याय समाए हों। आडवाणी जी का जन्म 8 नवंबर, 1927 को देव दीपावली के दिन हुआ था। 1947 में, जब वे युवा थे, तब उन्हें विभाजन की पीड़ा सहनी पड़ी। सिंध में अपना घर, अपना परिवेश, अपनी जानी-पहचानी दुनिया छोड़कर उन्हें आना पड़ा। सब कुछ पीछे छूट गया और जीवन की नई शुरुआत शून्य से करनी पड़ी। लेकिन इस कठिन अनुभव को लेकर उनके मन में कभी कोई कड़वाहट या पछतावा नहीं रहा।
कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, नए सिरे से कुछ खड़ा करने का उनका ये संकल्प जीवनभर उनके साथ रहा। जनसंघ को मजबूत बनाने और बाद में भारतीय जनता पार्टी के निर्माण में भी उनका यही गुण सामने आया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में देश की राजनीति ने बड़े बदलाव देखे। 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से घटकर 200 से भी नीचे आ गईं। 1996 में भाजपा पहली बार देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। आडवाणी जी ने कार्यकर्ताओं की अनेक पीढ़ियों को तैयार किया। उन्होंने राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत पर पार्टी की मजबूत नींव रखी।
यहां मैं आडवाणी जी के व्यक्तित्व की दो ऐसी विशेषताओं का उल्लेख करना चाहूंगा, जो एक नेता के रूप में उन्हें अलग पहचान देती हैं। पहली है, उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता। उनके भाषणों और लेखन में इसकी झलक साफ दिखाई देती थी। जनसंघ और भाजपा के लिए उन्होंने जो प्रस्ताव लिखे, वे आज भी पढ़ने और समझने योग्य हैं। उनके इंटरव्यू में भी विचारों की गहराई के साथ शब्दों की स्पष्टता और सटीकता दिखाई देती थी। दूसरी विशेषता थी, भारतीय राजनीति में लंबे समय तक हावी रही छद्म धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनका स्पष्ट और निर्भीक रुख। उन्होंने देश के राजनीतिक विमर्श में इस प्रवृत्ति की वास्तविकता को उजागर किया।
आडवाणी जी को जो भी जिम्मेदारी मिली, उन्होंने उसे पूरी निष्ठा और लगन से निभाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने सबसे पहले राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया। इसके बाद वे दिल्ली आए, जहां उन्हें अटल जी के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिला। इसके बाद की कहानी तो इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। दोनों ने दशकों तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। आडवाणी जी के लिए अटल जी हमेशा उनके नेता और मार्गदर्शक रहे।
राजनीति के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जब दो बड़े कद के नेता इतने लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ खड़े रहे हों। अक्सर समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं, महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं और साथ चलने वाले नेता भी अलग-अलग रास्तों पर निकल जाते हैं। लेकिन अटल जी और आडवाणी जी का साथ अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। इतिहास साक्षी है, पांच-छह दशकों की इस लंबी यात्रा में दोनों एक-दूसरे के सहयोगी बने रहे। एक-दूसरे के प्रति उनका विश्वास और सम्मान हमेशा बना रहा। अटल जी के जीवन के अंतिम समय तक ये साथ कायम रहा। भारतीय राजनीति में आपसी विश्वास, सहयोग और समर्पण की ये परंपरा आज भी एक बड़ी प्रेरणा है।
आडवाणी जी जब दिल्ली आए थे, तब ये शहर विभाजन की विभीषिका से उबरने का प्रयास कर रहा था। ऐसे समय में उन्होंने जनसंघ को मजबूत बनाने के लिए खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। 1967 में वे दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष बने। इस दौरान उन्होंने स्वर्गीय विजय कुमार मल्होत्रा जी के साथ मिलकर काम किया, जो मुख्य कार्यकारी पार्षद बने थे।
एक सांसद के रूप में आडवाणी जी की यात्रा 1970 के दशक से शुरू हुई। संसद में उनकी सक्रिय भागीदारी की आज भी सराहना होती है। एक सांसद के रूप में, दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के रूप में और सत्ता पक्ष में रहते हुए भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। संसदीय जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के बावजूद वे लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में जाते रहे, लोगों से मिलते रहे और उनसे संवाद करते रहे।
1991 के लोकसभा चुनाव की स्मृतियां आज भी मेरे मन में ताजा हैं। उस समय तय हुआ था कि आडवाणी जी दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ेंगे। इनमें से एक सीट गांधीनगर की थी। आडवाणी जी का गुजरात से बहुत पुराना नाता रहा है। विभाजन के बाद उनके पिताजी कच्छ में आकर बसे थे। 1976 में, जब देश में आपातकाल अपने चरम पर था, तब आडवाणी जी गुजरात से राज्यसभा सांसद भी बने थे। इस तरह 1991 में गांधीनगर से चुनाव लड़ना उनके लिए एक तरह से घर वापसी जैसा था।
उस समय मैं भाजपा के संगठन में काम कर रहा था। मुझे आडवाणी जी के नामांकन पत्र तैयार करने से लेकर पूरे चुनाव अभियान में उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। गांधीनगर की जनता ने भी उन्हें बार-बार बड़े बहुमत से विजयी बनाकर संसद भेजा। मेरे लिए ये भी बहुत सौभाग्य की बात रही कि गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र का मतदाता होने के नाते मुझे अनेक बार आडवाणी जी को अपना वोट देने का अवसर मिला। अपने संसदीय क्षेत्र और वहां के लोगों के प्रति उनका लगाव, उनकी चिंता और उनकी जरूरतों का ध्यान रखने का उनका भाव, हम सभी के लिए सीखने योग्य है।
आपातकाल आडवाणी जी के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उस दौर में वे लोकतंत्र को बचाने और संविधान की रक्षा के संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। आपातकाल के दौरान उन्होंने जो कुछ देखा, अनुभव किया और महसूस किया, उसकी झलक उनकी पुस्तक ‘A Prisoner’s Scrap-Book’ में भी मिलती है। इस पुस्तक का एक हिस्सा है—‘A Tale of Two Emergencies’। इसमें उन्होंने जून 1975 से भारत में शुरू हुई घटनाओं और 1933 में हिटलर के शासन के दौरान जर्मनी में हुई घटनाओं के बीच आश्चर्यजनक समानताओं का बहुत प्रभावी ढंग से वर्णन किया है।
आडवाणी जी विपक्ष में जितने प्रखर नेता रहे, प्रशासन में भी उतने ही कुशल साबित हुए। 1977 में जब जनता सरकार बनी, तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। इस मंत्रालय में उनके कार्यकाल को आज भी विशेष रूप से प्रभावशाली माना जाता है। बाद में उप प्रधानमंत्री और देश में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले गृह मंत्रियों में से एक के रूप में उन्होंने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हमारे सुरक्षा बलों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने जो प्रयास किए, उन्हें आज भी बड़े आदर और आत्मीयता से याद किया जाता है। आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख हमेशा स्पष्ट और दृढ़ रहा। उनके इसी संकल्प के कारण देश को आतंकवाद से निपटने के लिए एक सख्त कानून मिला।
सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा आडवाणी जी के जीवन का एक ऐतिहासिक अध्याय है। इस यात्रा ने भारतीय समाज को एक नई और सकारात्मक दिशा दी। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे इस ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ने का अवसर मिला। यात्रा की परिकल्पना से लेकर उसकी तैयारियों और फिर उसे आगे बढ़ाने तक, मुझे हर चरण में योगदान देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रथयात्रा के शुभारंभ के समय सोमनाथ में उपस्थित रहना भी मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव था।
इतनी लंबी यात्रा अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है। लगातार सफर, लंबे समय तक काम करना, शारीरिक थकान और इन सबके बीच अपने उद्देश्य पर पूरी तरह केंद्रित रहना, इसके लिए अद्भुत धैर्य और सहनशक्ति की आवश्यकता होती है। आडवाणी जी ने इस पूरी यात्रा में जिस जीवटता और संकल्पशक्ति का परिचय दिया, वो अपने आप में प्रेरणादायी है।
इस यात्रा से जुड़ा एक प्रसंग आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है। बिहार में आडवाणी जी की गिरफ्तारी हम सभी के लिए बहुत दुखद क्षण था। उस समय गुजरात में भाजपा ने चिमनभाई पटेल की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके पीछे संदेश बिल्कुल स्पष्ट था…अपनी विचारधारा और राम मंदिर के निर्माण के संकल्प पर कोई समझौता नहीं होगा। हमारे अनेक वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शपथ ली कि चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होकर ही रहेगा। और फिर वर्षों बाद वो ऐतिहासिक अवसर भी आया, जब जनता-जनार्दन के आशीर्वाद से अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर का सपना साकार हुआ।
आडवाणी जी के व्यक्तित्व के ऐसे अनेक पहलू हैं, जो उन्हें और भी विशिष्ट बनाते हैं। उनकी सादगी और सरलता भी ऐसी ही एक विशेषता है। नवनिर्माण आंदोलन के बाद आडवाणी जी जूनागढ़ आए थे। वहां वे एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह पूरे एक महीने तक रहे और विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करने में जुटे रहे। इन चुनावों में जनता ने इंदिरा गांधी की कांग्रेस को नकार दिया था।
आडवाणी जी ने अपने आचरण से हमेशा सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और शुचिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है। जो लोग उनके साथ रहे हैं, वे जानते हैं कि वे अखबारों को भी कितने ध्यान से और कितनी बारीकी से पढ़ते रहे हैं। सिनेमा और रंगमंच से भी उनका गहरा लगाव रहा है। वर्षों तक वे बड़े उत्साह से फिल्मों की समीक्षा भी करते रहे हैं। इतिहास के प्रति उनकी गहरी समझ और उसे सहेजकर रखने की उनकी भावना भी उल्लेखनीय है। उनकी पुस्तक ‘My Country My Life’ में इसकी सुंदर झलक मिलती है।
आडवाणी जी का अपनी सिंधी संस्कृति से हमेशा गहरा जुड़ाव रहा है। लेह के पास सिंधु दर्शन पूजा को लोकप्रिय बनाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे स्वयं भी एक बार आडवाणी जी और जॉर्ज फर्नांडिस जी के साथ सिंधु दर्शन पूजा में शामिल होने का सौभाग्य मिला था।
आडवाणी जी की इस असाधारण जीवन यात्रा की बात हो और कमला आडवाणी जी का उल्लेख न हो, तो ये यात्रा अधूरी रह जाएगी। इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में कमला जी हमेशा उनकी शक्ति और संबल बनी रहीं। हर कदम पर उनका साथ दिया।
कराची में पले-बढ़े आडवाणी जी ने शायद ही कभी कल्पना की होगी कि जीवन उन्हें कितनी लंबी और असाधारण यात्रा पर ले जाएगा। देश के प्रति उनके योगदान के लिए कृतज्ञ राष्ट्र ने वर्ष 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया।
आज जब आडवाणी जी अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तो मैं ईश्वर से उनके उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना करता हूं। वे इसी तरह हम सभी को प्रेरणा देते रहें, हमारा मार्गदर्शन करते रहें।

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