“नेक्स्ट- जेनरेशन जीएसटी और भारत के विकास का अगला चरण” : श्रीमती निर्मला सीतारमण
The Union Minister for Finance and Corporate Affairs, Smt. Nirmala Sitharaman meeting with the Managing Director of IMF News, Ms. Kristalina Georgieva, in New Delhi on September 07, 2022.
‘विकसित भारत’ बनने के भारत के संकल्प के लिए एक ऐसी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें हर स्तर और आकार के उद्यम फल-फूल सकें, चाहे उनकी शुरुआत कहीं से भी हुई हो। पिछले बारह वर्षों में हमारी सरकार ने इन अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण के लिए निरंतर कार्य किया है। वर्ष 2017 में जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) लागू होने से अप्रत्यक्ष कराधान के लिए एक साझा राष्ट्रीय ढांचा स्थापित हुआ। ‘नेक्स्ट- जेनरेशन का जीएसटी’ (Next-Gen GST) नौ वर्षों के क्रियान्वयन तथा करदाताओं और राज्यों के अनुभवों के आधार पर इसी प्रयास को आगे बढ़ाता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, नेक्स्ट- जेनरेशन जीएसटी की परिकल्पना दो परस्पर जुड़े उद्देश्यों के साथ की गई थी: कर दरों को कम व तर्कसंगत बनाना और अनुपालन को अधिक सरल बनाना। दरों में किए गए संशोधन 22 सितंबर 2025 से प्रभावी हुए। प्रक्रियात्मक सुधारों का अगला चरण शीघ्र ही जीएसटी परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सम्मिलित रूप से, इन प्रयासों का उद्देश्य परिवारों को राहत देना, व्यवसायों को अधिक निश्चितता प्रदान करना और करदाताओं के लिए एक ऐसी प्रणाली सुनिश्चित करना है जिसमें वे बिना किसी अनावश्यक कठिनाई के अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें।

राज्य इस पूरी यात्रा में बराबर के साझेदार रहे हैं। वे परिषद में अपनी प्राथमिकताओं और अनुभवों को लेकर आए, निर्णयों को आकार देने में सहयोग किया और उनके क्रियान्वयन का दायित्व संभाला। मैं इस प्रतिबद्धता के लिए उनका आभार व्यक्त करती हूँ। जीएसटी की प्रगति प्रत्येक सरकार के उत्तरदायित्वों का सम्मान करते हुए एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने की इसी तत्परता पर टिकी है।
इसके परिणाम विश्वास को सुदृढ़ करते हैं। अक्टूबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच, दर्ज की गई कर-योग्य आपूर्ति के मूल्य में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 25.8% की वृद्धि हुई। कर दरों की हल्की संरचना के साथ-साथ दर्ज आर्थिक गतिविधियों में भी व्यापक विस्तार देखा गया है। यह उस सुधार के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक आधार है जिसका उद्देश्य उद्यमों और सार्वजनिक वित्त दोनों को संबल प्रदान करना है।
यह सुदृढ़ता हालिया राजस्व आंकड़ों में स्पष्ट दिखाई देती है। अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान सकल जीएसटी संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि से 11.6% अधिक है। जून से सितंबर तक के प्रत्येक महीने में वार्षिक आधार पर दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की गई; इन चार महीनों का कुल संग्रह मिलकर लगभग 15% की गति से बढ़ा। कर वापसी (रिफंड) के बाद शुद्ध संग्रह में भी इस छमाही के दौरान 10.4% की वृद्धि हुई। इस प्रकार, करदाताओं को दी गई राहत और विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों में वृद्धि साथ-साथ हुई है।
इस विस्तार का दायरा उसके पैमाने जितना ही महत्वपूर्ण है। सभी 11 क्षेत्रक समूहों और सभी प्रमुख राज्यों में दर्ज कर-योग्य आपूर्ति में वृद्धि देखी गई। भारत जैसी विविध अर्थव्यवस्था में यह व्यापक प्रसार अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभिन्न क्षेत्रों और भौगोलिक हिस्सों में होने वाली यह वृद्धि अधिक से अधिक व्यवसायों को विस्तार लेते बाज़ारों में भाग लेने का अवसर देती है, और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न मांग, निवेश तथा रोज़गार से अधिकाधिक समुदायों को लाभान्वित करती है।
सुधार के बाद की अवधि की तुलना में उपभोक्ताओं को की गई प्रत्यक्ष बिक्री (बी2सी) में भी 26.7% की बढ़ोतरी हुई। जब कर राहत का प्रभाव कीमतों में दिखाई देता है, तो परिवारों के पास अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने या बचत करने के लिए अधिक गुंजाइश होती है। उपभोक्ता राहत और उद्यम विकास आपस में गहराई से जुड़े हैं: परिवारों की क्रय शक्ति व्यवसायों द्वारा दी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की मांग को बनाए रखती है। इसका लाभ परिवार से लेकर खुदरा विक्रेता, आपूर्तिकर्ता और उत्पादक तक सभी तक पहुंचता है।
लघु और मध्यम उद्यमों के लिए एक राष्ट्रीय बाज़ार तभी सार्थक होता है जब वह उनके स्थानीय परिवेश से परे ग्राहकों तक पहुँचने का व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त करे। द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों के व्यवसायों को स्थानीय स्तर पर निवेश और रोज़गार जारी रखते हुए ऐसे संबंध बनाने में सक्षम होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, इन शहरों में विस्तार करने वाले उद्यम स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं और वितरकों के लिए नए अवसर सृजित कर सकते हैं। जीएसटी का साझा ढांचा इन कड़ियों को सुदृढ़ करता है; और सरल प्रशासनिक व्यवस्था को इन्हें बनाए रखना और भी सहज बनाना होगा।
इस व्यवस्था में सहभागिता अत्यंत व्यापक रही है। अगस्त के अंत तक केंद्र और राज्य क्षेत्राधिकारों के अंतर्गत कुल जीएसटी पंजीकरण लगभग 1.71 करोड़ तक पहुंच गए, जो एक वर्ष पहले की तुलना में लगभग 15% अधिक हैं। अप्रैल-जुलाई 2026 की कर अवधियों के लिए, निर्धारित तिथि तक दाखिल किए गए जीएसटीआर-3बी रिटर्न पिछले वर्ष की समान अवधियों की तुलना में 12.6% अधिक थे। ये सुधार प्रशासन पर एक समान दायित्व भी डालते हैं: नियमित अनुपालन को विश्वसनीय सेवा, स्पष्ट मार्गदर्शन और समस्याओं के समयबद्ध समाधान द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की कार्यप्रणाली इस अनुभव का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुधार-उपरांत आंकड़े दर्शाते हैं कि इनपुट टैक्स क्रेडिट के माध्यम से चुकाई गई कर देयता का अनुपात बढ़ा है, जबकि कर-योग्य आपूर्ति के सापेक्ष संचित क्रेडिट में कमी आई है। यह उन व्यवसायों के लिए उत्साहवर्धक है जो पात्र क्रेडिट के प्रभावी उपयोग पर निर्भर करते हैं। किसी छोटे उद्यम के लिए उसकी कार्यशील पूंजी ही यह तय करती है कि वह कितनी सुगमता से कच्चा माल खरीद सकता है, कोई ऑर्डर पूरा कर सकता है और अगला काम हाथ में ले सकता है।
कर वापसी (रिफंड) भी उतनी ही प्रासंगिक है। अप्रैल-सितंबर के दौरान लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये की धनराशि रिफंड के रूप में लौटाई गई। व्यवसायों के प्राप्य बकाये को वापस लौटाना एक सुव्यवस्थित कर प्रणाली का अनिवार्य अंग है। इस प्रक्रिया में अधिक निश्चितता और पूर्वानुमेयता उद्यमों को अधिक आत्मविश्वास के साथ खरीद और उत्पादन की योजना बनाने में सहायता करेगी। किसी करदाता को देय रिफंड प्राप्त होने का अनुभव प्रशासनिक दक्षता का एक प्रमुख पैमाना होता है।
राज्यों की राजस्व स्थिति भी अधिक सुदृढ़ हुई है। इस वर्ष अप्रैल-सितंबर के दौरान एकीकृत माल और सेवा कर (आईजीएसटी) निपटान में उनके हिस्से सहित राज्यों की कुल एसजीएसटी प्राप्तियों में लगभग 16% की वृद्धि हुई। ये संसाधन बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं में निवेश को गति प्रदान करते हैं, जिससे परिवारों और उद्यमों को अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बेहतर परिवेश मिलता है। इस प्रकार, ये लाभ एक-दूसरे को सशक्त बनाते हैं: परिवारों को मिलने वाली राहत मांग को बढ़ावा देती है, उद्यम आर्थिक गतिविधियों को सुदृढ़ करते हैं, और सार्वजनिक राजस्व विकास को निरंतर बनाए रखने में सहायक होता है।
यह अनुभव भविष्य में किए जाने वाले कार्यों को भी रेखांकित करता है। एक विकासशील प्रणाली को इस बात के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए कि छोटे प्रतिभागियों पर इसका कितना आर्थिक व समय संबंधी भार पड़ता है। उनका समय और संसाधन सीमित होते हैं। रिटर्न दाखिल करने, क्रेडिट या रिफंड की व्यवस्था में प्रत्येक सुधार से ऐसे संसाधनों की अधिक से अधिक बचत होनी चाहिए, ताकि उनका उपयोग व्यवसाय के संचालन और विस्तार में किया जा सके।
7 अक्टूबर को जीएसटी परिषद के समक्ष रखे जाने वाले प्रस्ताव राज्यों के साथ निरंतर विचार-विमर्श और समन्वय के माध्यम से तैयार किए गए हैं। ये प्रस्ताव अनुपालन में लगने वाले समय और लागत को कम करने के उद्देश्य से पंजीकरण, रिटर्न, रिफंड, विवादों के निपटारे और इनपुट टैक्स क्रेडिट के सुगम प्रवाह से जुड़े हैं। करदाताओं का अनुभव ही इसके क्रियान्वयन का मुख्य मार्गदर्शक बना रहना चाहिए।
जीएसटी की बढ़ती परिपक्वता हमें सुधारों के अगले चरण के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करती है। स्पष्टता, निश्चितता और करदाता के प्रति सम्मान की यही प्रतिबद्धता प्रत्यक्ष करों से जुड़े हमारे कार्य को भी दिशा देती है। एक भरोसेमंद कर प्रणाली उद्यमों को अपने तात्कालिक दायित्वों से आगे बढ़कर योजना बनाने तथा ऐसे अवसरों में निवेश करने में सक्षम बनाती है जिनके फलने-फूलने में समय लगता है। वे चाहे कहीं भी कार्य कर रहे हों, उन्हें यह भरोसा दिलाना प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप एक ‘विकसित भारत’ की आर्थिक शक्ति के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है।
(लेखिका केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री हैं)

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