ब्रेकिंग: आदेश कागज पर, अमल जमीन पर नहीं! एक तरफ ट्रांसफर में टालमटोल, दूसरी तरफ आरटीआई में चुप्पी – दोनों मामलों ने खोल दी सिस्टम की पोल

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जावेद अली आज़ाद/ ब्यूरो प्रमुख।

कोरबा (अपना छत्तीसगढ़) । कोरबा में एक ही समय में दो ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने सरकारी सिस्टम के कामकाज पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक घटना ट्रांसफर आदेश को न मानने की है, दूसरी घटना सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी न देने की है। दोनों में बात एक ही है- आदेश आया, लेकिन पालन नहीं हुआ।

घटनाक्रम-1: ट्रांसफर आदेश और हाईकोर्ट का रुख:

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कोरबा नगर निगम में पदस्थ उप अभियंता पीयूष राजपूत के मामले में हाईकोर्ट में याचिका WPS/5701/2024 दायर हुई। हाईकोर्ट ने इसमें सिर्फ इतना कहा कि 10 दिन में अभ्यावेदन दिया जाए और 30 दिन में उस पर निर्णय लिया जाए। कोर्ट ने ट्रांसफर पर रोक का कोई आदेश नहीं दिया। इसके बाद भी रिलीव को लेकर असमंजस बना रहा। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए नगरीय प्रशासन विभाग ने अब स्पष्ट निर्देश जारी किया है। निर्देश में कहा गया है- ट्रांसफर आदेश आते ही कर्मचारी को तुरंत रिलीव किया जाए। कोर्ट के स्थगन आदेश के बिना सिर्फ अभ्यावेदन या याचिका के नाम पर ट्रांसफर नहीं रोका जाएगा। सिर्फ अभ्यावेदन देने की अनुमति को ट्रांसफर पर रोक नहीं माना जाएगा। रिलीव न करने वाले आयुक्त / सीएमओ पर सीधी कार्रवाई होगी। सभी निकायों को 48 घंटे में रिलीव रिपोर्ट संचालनालय को भेजनी होगी।

घटनाक्रम-2: आरटीआई और द्वितीय अपील तक का सफर:

इसी दौर में जिला कोरबा निवासी जावेद अली आजाद ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी। आरटीआई के तहत नियमानुसार तय समय सीमा में जानकारी नहीं मिलने पर आवेदक में फोन पर लोक सूचना अधिकारी से बात कर सख्त आपत्ति दर्ज कराते हुए समय पर जानकारी देने की मांग की। आरोप है कि तय समय-सीमा में जानकारी नहीं दी गई। इसके बाद 04/11/2026 को द्वितीय अपील क्र. 420261104001631 राज्य सूचना आयोग रायपुर में दायर की गई। अपील में धारा 7(1) व 7(2) के उल्लंघन पर धारा 20(1) के तहत पेनल्टी, धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई और धारा 19(8)(ख) के तहत क्षतिपूर्ति की मांग की गई है। अब आयोग के फैसले पर नजर है।

दोनों घटनाओं से एक ही सवाल:

क्या आदेश सिर्फ फाइलों के लिए होते हैं? एक तरफ विभाग को 48 घंटे की डेडलाइन देनी पड़ रही है, दूसरी तरफ सूचना आयोग तक मामला जाना पड़ रहा है। अब देखना है कि कार्रवाई कागज से आगे बढ़कर जमीन पर उतरती है या नहीं।

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