आर्टिकल : संशोधित ईपीएफ सीमा और सामाजिक सुरक्षा तंत्र का निर्माण, कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए

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✒️ श्री वी. अनंत नागेश्वररन् और सुश्री श्रुति सिंह

विश्वकर्मा जयंती पर, कामग़ारों और शिल्पकारों का सम्मान करने वाले इस पर्व के अवसर पर सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने के बहुत समय से लंबित निर्णय की घोषणा की। कोई पूछ सकता है कि सीमा में 10,000 रुपये की वृद्धि से आखिर क्या बदलाव आएगा? इस संशोधन की आवश्यकता क्यों है और इसका कर्मचारी या नियोक्ता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? तो आइए, मूल बातों से शुरुआत करते हैं।

25,000 रुपये की यह वैधानिक वेतन सीमा अनिवार्य ईपीएफ, कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) और कर्मचारी जमा-लिंक्ड बीमा (ईडीएलआई) कवरेज के लिए सीमा का काम करती है। ये तीनों योजनाएं भारत में वेतनभोगी कामग़ारों के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र के मूल आधार हैं: सेवानिवृत्ति/आपातकालीन निधि; नियोक्ता के अंशदान से वित्तपोषित पेंशन निधि, जिससे सेवानिवृत्ति के बाद भुगतान किया जाता है; और जीवन बीमा, जिसे नियोक्ता के अंशदान से ही वित्तपोषित किया जाता है, जिससे कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में उसके परिवार को सहायता मिल सके। पूर्णतः उचित यही है कि सामाजिक सुरक्षा को साल 2014 से स्थिर किसी संख्या पर आधारित न रखा जाए, जबकि इस अवधि में वेतन, न्यूनतम मजदूरी और जीवन-यापन की लागत लगातार बढ़ती रही है।

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पिछली वेतन सीमा के तहत, 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पर नौकरी शुरू करने वाला कोई भी नया कर्मचारी अनिवार्य ईपीएफ कवरेज से बाहर हो जाता था, ईपीएस के लिए पात्र नहीं होता था और ईडीएलआई के संरक्षण से भी वंचित रहता था। किसी मौजूदा कर्मचारी का वेतन समय के साथ इस सीमा से अधिक हो जाने पर कवरेज समाप्त नहीं होती थी, लेकिन ईपीएस के तहत पेंशन योग्य वेतन 15,000 रुपये पर ही सीमित रहता था। कोई यह तर्क दे सकता है कि अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारी इसके बजाय स्वैच्छिक कवरेज का विकल्प चुन सकते हैं। इस तर्क में समस्या यह है कि सीमा से अधिक वेतन पर स्वैच्छिक नामांकन के लिए संयुक्त विकल्प के तहत नियोक्ता की सहमति आवश्यक होती है, जिससे यह विकल्प सुनिश्चित अधिकार के बजाय सौदेबाज़ी का विषय बन जाता है। बढ़ी हुई वेतन सीमा के साथ, यह कवरेज सौदेबाज़ी का विषय न रहकर अधिकार बन जाएगी।

बढ़ी हुई वेतन सीमा कामगारों से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान तो नहीं करती, लेकिन यह औपचारिक सामाजिक सुरक्षा तंत्र को थोड़ा अधिक न्यायसंगत और थोड़ा व्यापक जरूर बनाती है। 10,000 रुपये की वृद्धि भले ही मामूली लगती हो, लेकिन अब सामाजिक सुरक्षा तंत्र के दायरे में आने वाले अतिरिक्त 51 लाख कामगारों की संख्या मामूली नहीं है। और अधिकांश अधिकारों के विपरीत, इस अधिकार का लाभ लेने के लिए कामगार को अपनी ओर से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।

मनुष्य अपने भविष्य की कल्पना करने और उसके लिए तैयारी करने में खास अच्छे नहीं होते। 65 वर्ष की उम्र के अपने भावी स्वरूप के लिए कोई बजट नहीं बनाता। हम अक्सर उस छोटे लाभ को चुनते हैं जो जल्दी मिल जाए, बजाय उस बड़े लाभ के जो देर से मिले। व्यवहार अर्थशास्त्र में इसे ‘हाइपरबोलिक डिस्काउंटिंग’ कहा जाता है। परिणामस्वरूप, सीमित आय में तत्काल उपभोग की जरूरतों को पूरा करने की तुलना में भविष्य में अपने लिए या किसी भावी परिस्थिति के लिए बचत करना और योजना बनाना अक्सर अधिक कठिन होता है। यही कारण है कि ईपीएफओ द्वारा संचालित अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा अंशदान जैसी व्यवस्थाओं की रूपरेखा महत्वपूर्ण है। यह बचत के लिए कामगार की इच्छा या इच्छाशक्ति पर निर्भर किए बिना काम करती है। आय के कामगार के खाते में पहुंचने से पहले ही पेंशन के लिए अंशदान अलग रख दिया जाता है—जो पैसा कभी दिखाई ही नहीं देता, उसे खर्च करना संभव नहीं होता। और धीरे-धीरे, हर महीने वेतन का एक छोटा हिस्सा अलग रखा जाता है, जिससे सेवानिवृत्ति निधि तैयार होती है, जिसका उपयोग आपातकाल में भी किया जा सकता है, साथ ही जीवन बीमा का कवरेज भी मिलता है—वह भी आपके अपनी ओर से बिना कोई अतिरिक्त प्रयास किए।

हालांकि, इस संशोधन के साथ नियोक्ताओं के लिए एक लागत भी जुड़ी हुई है। अनिवार्य वेतन सीमा अब बढ़ाकर 25,000 रुपये किए जाने के साथ, नियोक्ताओं को काफी अधिक संख्या में कर्मचारियों को वैधानिक ईपीएफ कवरेज प्रदान करनी होगी और उनके मासिक अंशदान संबंधी दायित्व भी बढ़ जाएंगे। उदाहरण के लिए, 22,000 रुपये प्रति माह कमाने वाला ऐसा कर्मचारी, जो पहले अनिवार्य कवरेज से बाहर था, अब वैधानिक रूप से ईपीएफ कवरेज के दायरे में आएगा और नियोक्ता के लिए इस कर्मचारी को ईपीएफ कवरेज प्रदान करना अनिवार्य होगा। अब नियोक्ता को वेतन का 12 प्रतिशत अंशदान करना होगा, जो ईपीएस पेंशन योजना और कर्मचारी के अपने ईपीएफ खाते के बीच विभाजित होगा। यह राशि प्रति कर्मचारी प्रति माह 2,640 रुपये या वार्षिक 31,680 रुपये होगी। ऐसे 20 कर्मचारियों के मामले में, यह अतिरिक्त पेरोल लागत के रूप में प्रति वर्ष 6,33,600 रुपये होगी। इसके अलावा, ईडीएलआई बीमा अंशदान भी होगा, जो राशि में भले ही छोटा है, लेकिन अब इसकी गणना भी अधिक वेतन आधार पर की जाएगी। नियुक्ति संबंधी निर्णय लेते समय यह नियोक्ताओं के लिए एक वास्तविक लागत है।

अधिक लागत कंपनी के लिए एक स्पष्ट निष्कर्ष प्रतीत होती है, लेकिन यह केवल प्रारंभिक प्रभाव है और रोजगार बाजार इससे कहीं अधिक जटिल है। अधिक ईपीएफ कवरेज भर्ती के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में काम करता है, जिससे अधिक कुशल और अधिक कार्य-क्षमता वाले कामगार आकर्षित होते हैं, क्योंकि नए कर्मचारी किसी नौकरी का मूल्यांकन करते समय केवल मासिक वेतन को ही ध्यान में नहीं रखते। यह कवरेज कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखने में भी सहायक हो सकती है। पेंशन और बीमा लाभ वाला कामगार संभवतः अधिक समय तक काम पर बना रहेगा और नौकरी की शुरुआत थोड़ी अधिक सुरक्षा के साथ करेगा। दूरदर्शी नियोक्ता पहले से ही इसे समझते हैं और अच्छी प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए स्वैच्छिक कवरेज प्रदान करते हैं।

सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा यह है कि यह ट्रैम्पोलीन की तरह न केवल आपको संभालती है, बल्कि फिर से उछलकर आगे बढ़ने में भी सक्षम बनाती है। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य कामगारों को ऐसा कोष उपलब्ध कराना है, जिससे वे आपातकाल के समय या सेवानिवृत्ति के बाद आवश्यकता पड़ने पर धन प्राप्त कर सकें, जिससे कोई अस्थायी संकट जीवनभर की कठिनाई का रूप न ले और उन्हें ऋण-जाल में न फंसाए।

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी पहलें, जिन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक किफायती और सुलभ बनाया है, इस सुरक्षा तंत्र को और मज़बूत बनाती हैं। बदलते रोज़ग़ार स्व रूप हेतु तैयारी करने के लिए मजबूत उद्योग संपर्कों के साथ, कौशल उन्नयन, पुनःकौशल विकास और नव कौशल विकास के लिए कौशल विकास पारितंत्र का निर्माण किया जा रहा है। अटल पेंशन योजना (एपीवाई) अंशदायी पेंशन कवरेज को उन लोगों के लिए कम आय वर्ग तक और आगे बढ़ाती है, जो निवेश जोखिम उठाने और आर्थिक तथा बाजार वृद्धि के लाभों में भागीदारी के इच्छुक हैं। यह ट्रैम्पोलीन भी कदम दर कदम मज़बूत होता जा रहा है।

(वी. अनंत नागेश्वरन् भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं और श्रुति भारतीय आर्थिक सेवा की एक अधिकारी हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।)


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