मुंगेली में भवन अनुज्ञा निरस्त, फिर भी निर्माण जारी होने का आरोप; नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल

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जीवन मंगलानी, बरखा मंगलानी और पूनम मंगलानी से जुड़े 6000 वर्गफीट के निर्माण का मामला गरमाया; पहले अनुमति, फिर निरस्तीकरण और अब पुनः आवेदन के बीच कार्रवाई पर उठ रहे सवाल

• वर्ष 2025 की अवैध प्लॉटिंग सूची में संबंधित खसरे का नाम होने का दावा, एसडीएम से मार्गदर्शन मांगने की प्रक्रिया पर सवाल; सीएमओ बोले—पुनः आवेदन उच्च राजस्व अधिकारी को भेजा गया

मुंगेली। शहर में भवन निर्माण की अनुमति जारी करने, बाद में उसे निरस्त करने और उसके बावजूद कथित तौर पर निर्माण कार्य जारी रहने के मामले ने नगर पालिका परिषद मुंगेली की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो अलग-अलग भूखंडों पर कुल 6000 वर्गफीट क्षेत्र में निर्माण को लेकर विवाद सामने आया है। इस मामले में जीवन मंगलानी, बरखा मंगलानी और पूनम मंगलानी के नाम सामने आ रहे हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, संबंधित भूखंडों के लिए जारी भवन निर्माण अनुज्ञाएं निरस्त की जा चुकी हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर आरोप है कि मौके पर निर्माण कार्य अब भी जारी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब नगर पालिका स्वयं निर्माण अनुज्ञाओं को निरस्त कर चुकी है, तो उसके बाद मौके की स्थिति स्पष्ट करने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कार्रवाई कहां तक हुई?

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मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भवन निर्माण अनुज्ञा जारी करने से लेकर उसके निरस्तीकरण और फिर संबंधित पक्ष के दोबारा आवेदन तक की प्रक्रिया में भूमि की स्थिति, अवैध प्लॉटिंग की सूची और सीमांकन जैसे मुद्दे सामने आ रहे हैं। यदि निर्माण नियमानुसार नहीं हो रहा है, तो उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? वहीं, यदि भूमि को लेकर राजस्व विवाद है, तो उसका समयबद्ध निराकरण क्यों नहीं किया जा रहा? इन सवालों पर नगर पालिका और राजस्व विभाग की स्पष्ट स्थिति सामने आना जरूरी है।

पहले अनुमति जारी की, फिर निरस्त की; जांच प्रक्रिया पर सवाल

नगर पालिका परिषद मुंगेली के उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक, भवन निर्माण अनुज्ञा क्रमांक 2026-25-000029 और 2026-25-000030 दिनांक 17 मार्च 2026 को जारी की गई थीं। इसके बाद जून 2026 में दोनों अनुज्ञाओं को निरस्त करने संबंधी सूचनाएं जारी की गईं। उपलब्ध विवरण में पहली सूचना क्रमांक 930, दिनांक 3 जून 2026 तथा दूसरी सूचना क्रमांक 931 का उल्लेख है।

निरस्तीकरण संबंधी दस्तावेजों में अनुमति की शर्त क्रमांक 1 का पालन नहीं होने तथा शर्त क्रमांक 11 के उल्लंघन का हवाला दिया गया है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अनुमति जारी की गई थी, तब संबंधित भूखंडों के दस्तावेजों, भूमि की स्थिति और भवन निर्माण संबंधी शर्तों की जांच किस आधार पर की गई थी? यदि बाद में नियमों के उल्लंघन की जानकारी सामने आई, तो उसे पकड़ने में कितना समय लगा और इसके लिए जिम्मेदार प्रक्रिया क्या थी?

नगर पालिका प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों अनुज्ञाएं किन दस्तावेजों के आधार पर जारी की गई थीं, निरस्तीकरण के पीछे वास्तविक कारण क्या थे और उसके बाद निर्माण स्थल पर निगरानी के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए। अनुमति जारी करने और निरस्त करने के बीच की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा के बिना मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती।

अनुज्ञा निरस्त, फिर भी निर्माण जारी होने का आरोप; मौके पर कार्रवाई कहां?

किसी भवन निर्माण अनुज्ञा को निरस्त कर देना अपने आप में पूरी कार्रवाई नहीं है। उसके बाद मौके पर नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि दोनों भूखंडों पर निर्माण कार्य जारी है। यदि यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह नगर पालिका की निगरानी व्यवस्था और कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करेगा।

क्या नगर पालिका के इंजीनियर या संबंधित अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया? क्या निर्माण की वर्तमान स्थिति का प्रतिवेदन तैयार किया गया? क्या संबंधित पक्ष को निर्माण रोकने के संबंध में कोई निर्देश दिया गया? यदि निरस्तीकरण के बाद भी निर्माण होता पाया गया, तो नियमानुसार क्या कार्रवाई की गई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि केवल फाइलों में नोटिस और आदेश जारी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। वास्तविक स्थिति मौके पर जाकर जांचने और उसके अनुसार नियमानुसार कार्रवाई करने की जरूरत है। हालांकि, निर्माण की वर्तमान स्थिति और किसी नियम उल्लंघन की पुष्टि संबंधित विभाग के निरीक्षण तथा आधिकारिक दस्तावेजों से होना आवश्यक है।

अवैध प्लॉटिंग की सूची में खसरे का नाम होने का दावा

इस मामले में भूमि की स्थिति को लेकर भी विवाद सामने आया है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि वर्ष 2025 में एसडीएम मुंगेली कार्यालय की ओर से नगर पालिका को भेजी गई अवैध प्लॉटिंग संबंधी सूची में उस खसरे का उल्लेख था, जहां वर्तमान में निर्माण किए जाने का आरोप है। उनका सवाल है कि यदि संबंधित खसरा पहले से अवैध प्लॉटिंग की सूची में दर्ज था, तो भवन निर्माण अनुज्ञा जारी करने से पहले इस तथ्य की जांच क्यों नहीं की गई?

शिकायतकर्ताओं का यह भी कहना है कि संबंधित जमीन को अवैध प्लॉटिंग से जुड़ा बताया गया है और इस संबंध में राजस्व अधिकारियों के पूर्व पत्राचार का हवाला दिया जा रहा है। ऐसे में नगर पालिका द्वारा दोबारा राजस्व विभाग से मार्गदर्शन मांगे जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।

हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए वर्ष 2025 की मूल सूची, संबंधित खसरा नंबर, एसडीएम कार्यालय के पत्र और राजस्व अभिलेखों का मिलान जरूरी है। भूमि का स्वामित्व, उसका सीमांकन और अवैध प्लॉटिंग की स्थिति सक्षम अधिकारी की रिपोर्ट से ही स्पष्ट हो सकती है। नगर पालिका को इन दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।

एनओसी जारी करने और निरस्त करने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में

स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि संबंधित भूमि के संबंध में नगर पालिका की ओर से पहले अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी किया गया और बाद में उसे निरस्त कर दिया गया। यदि ऐसा हुआ है, तो एनओसी जारी करने का आधार क्या था और बाद में उसे निरस्त करने की नौबत क्यों आई, इसकी जानकारी सामने आनी चाहिए।

क्या एनओसी जारी करने से पहले राजस्व अभिलेखों और अवैध प्लॉटिंग संबंधी सूची की जांच की गई थी? क्या बाद में कोई नया तथ्य सामने आया? क्या संबंधित अधिकारियों ने भूमि की वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया था? इन प्रश्नों का जवाब दस्तावेजों की समीक्षा से ही मिल सकता है।

नगर पालिका प्रशासन को एनओसी से संबंधित फाइल, जारी करने की तारीख, निरस्तीकरण के कारण और संबंधित अधिकारियों की टिप्पणी की जानकारी स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि पूरी प्रक्रिया में कहीं कोई चूक हुई या नहीं।

सीएमओ का पक्ष—दोबारा आवेदन आया, उच्च राजस्व अधिकारी को भेजा

इस मामले में नगर पालिका परिषद मुंगेली के सीएमओ होरी सिंह ठाकुर ने बताया कि संबंधित भवन निर्माण अनुज्ञाएं निरस्त की गई थीं। इसके बाद संबंधित पक्ष की ओर से दोबारा आवेदन प्रस्तुत किया गया है।

सीएमओ के अनुसार, आवेदन में संबंधित पक्ष ने पीछे स्थित मकान के लिए कुछ वर्ष पहले भवन निर्माण अनुज्ञा जारी होने का हवाला दिया है। साथ ही मुख्य मार्ग की जमीन से संबंधित दावा करते हुए भूमि को अवैध प्लॉटिंग की सूची से हटाने की मांग की गई है।

सीएमओ ने बताया कि आवेदन को उच्च राजस्व अधिकारी के पास भेजा गया है। उनके बयान में सरकारी जमीन और एसएनजी कॉलेज की जमीन से संबंधित विषय का भी उल्लेख हुआ। संबंधित पक्ष अपने दावे के समर्थन में सीमांकन करा सकता है।

सीएमओ के इस बयान के बाद अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि राजस्व विभाग से रिपोर्ट कब तक प्राप्त होगी और तब तक निर्माण स्थल पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। यदि भूमि की स्थिति को लेकर विवाद है, तो उसका निराकरण जरूरी है, लेकिन साथ ही निरस्त अनुज्ञाओं से जुड़े निर्माण की वर्तमान स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।

आवेदन एक विभाग से दूसरे विभाग तक, लेकिन मौके की निगरानी कौन करेगा?

मामले में संबंधित पक्ष के दोबारा आवेदन और राजस्व विभाग से मार्गदर्शन की प्रक्रिया के बीच स्थानीय नागरिकों की चिंता यह है कि निर्णय आने तक निर्माण की स्थिति क्या रहेगी। यदि संबंधित स्थल पर निर्माण जारी है, तो क्या उसकी निगरानी की जा रही है? यदि निर्माण की अनुमति निरस्त है, तो लागू नियमों के तहत आगे की कार्रवाई के संबंध में नगर पालिका ने क्या निर्णय लिया है?

भूमि के स्वामित्व या सीमांकन को लेकर विवाद होने पर राजस्व विभाग की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन नगर पालिका को अपनी ओर से यह स्पष्ट करना चाहिए कि भवन निर्माण अनुज्ञाओं के निरस्तीकरण के बाद उसने कौन-कौन से कदम उठाए हैं। दोनों विभागों के बीच समन्वय की कमी से मामला अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रहना चाहिए।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर जारी है और संबंधित अधिकारियों की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं दिखाई दे रही। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

6000 वर्गफीट का मामला, लेकिन जवाबदेही तय होगी कब?

दो अलग-अलग भूखंडों पर कुल 6000 वर्गफीट क्षेत्र से जुड़ा यह विवाद केवल भवन निर्माण की अनुमति तक सीमित नहीं है। यह नगर पालिका की अनुमति प्रक्रिया, भूमि संबंधी दस्तावेजों के सत्यापन, अवैध प्लॉटिंग की सूची और निरस्तीकरण के बाद की निगरानी से भी जुड़ा हुआ है।

जिला प्रशासन को दोनों भवन निर्माण अनुज्ञाओं की मूल फाइलों की समीक्षा करनी चाहिए। यह जांच होनी चाहिए कि अनुमति जारी करने के समय किन दस्तावेजों का परीक्षण किया गया, बाद में निरस्तीकरण क्यों किया गया, संबंधित पक्ष के दोबारा आवेदन में क्या आधार प्रस्तुत किए गए और अब तक निर्माण स्थल पर क्या कार्रवाई हुई है।

यदि जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार जवाबदेही तय की जानी चाहिए। इसी तरह, यदि संबंधित पक्ष भूमि के स्वामित्व या सीमांकन के संबंध में कोई दावा कर रहा है, तो उसका परीक्षण आधिकारिक अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए।

जिला प्रशासन से सवाल—फाइलों में कार्रवाई या मौके पर भी निगरानी?

मामले में अब जिला प्रशासन से समयबद्ध समीक्षा और स्पष्ट जवाब की मांग उठ रही है। स्थानीय नागरिक चाहते हैं कि संबंधित खसरों की स्थिति, अवैध प्लॉटिंग की कथित सूची, भवन निर्माण अनुज्ञाओं के निरस्तीकरण और पुनः आवेदन पर हुई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

सबसे अहम सवाल यही है कि जब दो भवन निर्माण अनुज्ञाएं निरस्त की जा चुकी हैं, तो निर्माण की वर्तमान स्थिति क्या है? राजस्व विभाग की रिपोर्ट कब तक आएगी? नगर पालिका ने मौके पर निरीक्षण कर क्या पाया? और यदि नियमों के विपरीत निर्माण की पुष्टि होती है, तो उसे रोकने के लिए क्या कार्रवाई की जाएगी?

फिलहाल, नगर पालिका के दस्तावेजों में अनुज्ञाओं के निरस्तीकरण और सीएमओ के बयान में पुनः आवेदन उच्च राजस्व अधिकारी को भेजे जाने की बात सामने आई है। निर्माण जारी होने, अवैध प्लॉटिंग से संबंध और अधिकारियों की कथित भूमिका से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। अब जरूरी है कि संबंधित विभाग केवल पत्राचार तक सीमित न रहें, बल्कि दस्तावेजों और मौके की स्थिति के आधार पर स्पष्ट निर्णय लें तथा जांच में दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई करें।

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