5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में ‘जोखिम के लिए कीमत चुकाती दुनिया’ विषय पर पूर्ण सत्र को डॉ. पी. के. मिश्रा ने संबोधित किया
घरेलू क्षमता, विविधीकरण और खुलेपन में निहित है भारत की आर्थिक सुदृढ़ता : डॉ. पी. के. मिश्रा
दुनिया केवल जोखिम का नहीं, बल्कि अनिश्चितता का सामना कर रही है : बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर डॉ. पी. के. मिश्रा

बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के बीच भूगोल फिर आर्थिक निर्णयों के केंद्र में आया : डॉ. पी. के. मिश्रा

सुदृढ़ता की कीमत होती है; महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जोखिम की तुलना में यह कीमत उचित है या नहीं : वैश्विक झटकों की तैयारी की आर्थिक लागत पर डॉ. पी. के. मिश्रा
आर्थिक सुरक्षा आत्मनिर्भरता और वैश्वीकरण के बीच संतुलन में है—रणनीतिक कमजोरियों वाले क्षेत्रों में घरेलू क्षमता और एकाग्रता के जोखिम वाले क्षेत्रों में विविधीकरण जरूरी
नई दिल्ली । प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी. के. मिश्रा ने आज नई दिल्ली में आयोजित 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के पूर्ण सत्र ‘जोखिम के लिए कीमत चुकाती दुनिया’ को संबोधित करते हुए तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्थिक सुदृढ़ता, विविधीकरण और रणनीतिक तैयारी के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि आर्थिक जोखिम की प्रकृति में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। दुनिया अब केवल ऐसे जोखिमों का सामना नहीं कर रही है, जिनकी संभावनाओं का आकलन किया जा सकता है, बल्कि ऐसी अनिश्चितताओं का भी सामना कर रही है, जिनके लिए विश्वसनीय रूप से संभावनाएं निर्धारित करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी, भू-राजनीतिक संघर्ष, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, व्यापार प्रतिबंध और तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों ने जोखिम और अनिश्चितता के बीच इस अंतर को स्पष्ट किया है।
उन्होंने कहा कि जिस भूगोल को कभी तकनीक के कारण आर्थिक निर्णयों के लिए कम महत्वपूर्ण माना जा रहा था, वह अब फिर से आर्थिक निर्णय लेने के केंद्र में आ गया है। समुद्री परिवहन मार्गों में व्यवधान हजारों किलोमीटर दूर ऊर्जा की कीमतों को प्रभावित कर सकता है, वहीं महत्वपूर्ण खनिजों और उनके प्रसंस्करण का कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक संकेंद्रण नई कमजोरियां पैदा कर रहा है। उन्होंने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते संक्रमण से भी रणनीतिक निर्भरता के नए स्वरूप सामने आ रहे हैं, जिनका समाधान आवश्यक है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि अनिश्चितता आर्थिक व्यवहार को बदलती है। कंपनियां आपूर्तिकर्ताओं में विविधता ला रही हैं, भंडार बनाए रख रही हैं और वैकल्पिक उत्पादन क्षमता विकसित कर रही हैं। इसी प्रकार सरकारें भी भंडार मजबूत करने, राजकोषीय बफर बढ़ाने और रणनीतिक क्षमताओं के विकास पर जोर दे रही हैं। उन्होंने कहा, “सुदृढ़ता की कीमत होती है।” ऐसे में प्रमुख आर्थिक सवाल यह है कि जिस व्यवधान से बचने के लिए यह अतिरिक्त लागत वहन की जा रही है, उसकी संभावित लागत की तुलना में यह कीमत कितनी उचित है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर उभरती यह प्रतिक्रिया वैश्वीकरण से पीछे हटने का संकेत नहीं है, बल्कि अधिक अनिश्चितता वाली दुनिया में वैश्वीकरण को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाए, इसका पुनर्मूल्यांकन है। देश अब घरेलू क्षमताओं को विविधीकृत अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों, रणनीतिक भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाओं और व्यापक आर्थिक सहयोग के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
भारत के अनुभव का उल्लेख करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि आर्थिक सुदृढ़ता का अर्थ दुनिया से अलग-थलग होना नहीं हो सकता। “इसका अर्थ ऐसी क्षमता होना है, जिससे हम दुनिया के लिए खुले रहें, लेकिन उसके प्रति अत्यधिक संवेदनशील न बनें।” उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, रणनीतिक औद्योगिक क्षमताओं और बाहरी आर्थिक संबंधों के विविधीकरण को भारत की रणनीति के महत्वपूर्ण तत्वों के रूप में रेखांकित किया।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि आर्थिक सुदृढ़ता के साथ उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि घरेलू क्षमता विकसित करने का अर्थ किसी भी कीमत पर आयात को प्रतिस्थापित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी क्षमताओं का निर्माण करना होना चाहिए जो प्रतिस्पर्धी और बड़े स्तर पर विस्तार योग्य हों तथा अंततः वैश्विक बाजारों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में हो रहे बदलाव का उल्लेख किया।
उन्होंने व्यापक आर्थिक सुदृढ़ता के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि राजकोषीय गुंजाइश, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत वित्तीय प्रणाली और विश्वसनीय संस्थाएं किसी देश को बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता प्रदान करती हैं। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और सतत विकास के आयाम भी तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं तथा ऊर्जा, खाद्य, प्रौद्योगिकी और पर्यावरणीय सुरक्षा अब परस्पर संबद्ध हो गई हैं।
समापन में डॉ. मिश्रा ने कहा कि सुदृढ़ता का अर्थ आत्मनिर्भरता और वैश्वीकरण में से किसी एक को चुनना नहीं है। उन्होंने कहा, “अधिक तर्कसंगत दृष्टिकोण इन दोनों के बीच है—जहां रणनीतिक कमजोरी हो, वहां घरेलू क्षमता; जहां अत्यधिक संकेंद्रण का जोखिम हो, वहां विविधीकरण; और जहां वैश्विक एकीकरण उत्पादकता तथा प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करता हो, वहां खुलापन।”
आत्मनिर्भरता के व्यापक अर्थ का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस बात को भी याद किया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया के लिए अपने दरवाजे बंद करना नहीं, बल्कि स्वयं को टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने की क्षमता विकसित करना है।

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