यादों के आईने में नेतृत्व की तपस्या; प्रधानमंत्री मोदी के अनछुए पहलुओं को उजागर करती पुस्तक ‘अपनापन’

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नई दिल्ली | सार्वजनिक जीवन में नेतृत्व को अक्सर लोग सत्ता और भाषणों से तौलते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति तीन दशकों तक किसी व्यक्तित्व को करीब से देखता है, तो वह एक जननायक के भीतर छिपे ‘साधक’ और ‘कर्मयोगी’ से परिचित होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ३३ वर्षों के लंबे सफर और उनके साथ बिताए गए गहन अनुभवों को संजोकर लिखी गई पुस्तक ‘अपनापन’ इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है।

भाषण नहीं, तपस्या से आता है नेतृत्व: ‘अपनापन’ का सार

यह पुस्तक केवल स्मृतियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उस यात्रा का शब्द-चित्र है जो १९९१ की एकता यात्रा से शुरू होकर आज के आधुनिक भारत के निर्माण तक निरंतर जारी है। लेखक के अनुसार, दुनिया ने मोदी जी को लाल चौक पर तिरंगा फहराते देखा, लेकिन इस पुस्तक में उस सोच का वर्णन है जिसने तिरंगे को देश के हर युवा के दिल तक पहुँचाने का संकल्प लिया था।
पुस्तक की प्रमुख विशेषताएं:

  • कर्मयोगी का अनुशासन: देर रात तक काम करने के बाद भी अगली सुबह उसी ऊर्जा के साथ राष्ट्र सेवा में जुटने की प्रेरणा।
  • संवेदनशीलता: गरीब, किसान, माताएं और बहनों के प्रति प्रधानमंत्री के हृदय में धड़कने वाली संवेदनाओं का सजीव चित्रण।
  • संगठनात्मक कौशल: सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों के लिए यह एक मार्गदर्शिका है कि कैसे सामूहिक प्रयासों से बड़े लक्ष्य साधे जाते हैं।

युवाओं और समाजसेवियों के लिए एक विजन

‘अपनापन’ उन लोगों के लिए एक विशेष झरोखा है जो भारत में हो रहे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों को करीब से समझना चाहते हैं। लेखक का मानना है कि यह पुस्तक युवाओं को सिखाती है कि जनता से जुड़कर और उनकी समस्याओं को समझकर कैसे बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन का वातावरण बनाया जा सकता है।

लेखक का संदेश:
“इस पुस्तक को पढ़ते समय यदि पाठक यह महसूस कर सकें कि देश बदलने के लिए बड़े पद की नहीं, बल्कि बड़े संकल्प की जरूरत होती है, तो मेरा यह प्रयास सार्थक होगा।”

क्यों पढ़ें ‘अपनापन’?

यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को राजनीतिक चश्मे से हटकर एक इंसान, एक अनुशासित कार्यकर्ता और एक विजनरी लीडर के रूप में देखना चाहते हैं। इसमें घटनाओं के साथ-साथ वह ‘सोच’ भी साझा की गई है, जिसने सपनों को सिद्धि में बदलने का साहस किया।

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