साल में फीस और ट्यूशन का खर्च आय से भी तेज़ बढ़ा : जयराम रमेश
नई दिल्ली । देश में शिक्षा की बढ़ती लागत अब आम परिवारों के लिए सबसे बड़ा आर्थिक बोझ बन गई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी यानी सीएमआईई ने 2014/15 से 2025/26 तक के घरेलू व्यय के आंकड़ों का विश्लेषण कर जो रिपोर्ट जारी की है, उसने सरकार और नीति-निर्माताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कांग्रेस नेता जय राम रमेश ने इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा अब सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक संकट बनती जा रही है। सीएमआइई के मुताबिक पिछले एक दशक में शिक्षा पर होने वाला खर्च घरेलू आय की तुलना में कई गुना तेजी से बढ़ा है।
यानी आपकी सैलरी जितनी बढ़ी, उससे कहीं ज्यादा स्कूल-कॉलेज और ट्यूशन की फीस बढ़ गई। इसी वजह से परिवार अब अपनी कुल आय का पहले से कहीं बड़ा हिस्सा सिर्फ बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करने को मजबूर हैं। जयराम रमेश ने सीएमआईई डेटा के 5 सबसे अहम बिंदु गिनाए। पहला, शिक्षा पर खर्च आय से तेज़ी से बढ़ रहा है। दूसरा, घरों का बजट अब पहले जैसा नहीं रहा – शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। तीसरा, निजी ट्यूशन शिक्षा पर खर्च का सबसे तेजी से बढ़ता हिस्सा बन गया है। कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अब बिना ट्यूशन के संभव ही नहीं मानी जा रही। चौथा बिंदु सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। सीएमआईई कहता है कि पिछले 10 साल में स्कूल और कॉलेजों की फीस में हर साल जो बढ़ोतरी हुई है, वो उसी साल हुई घरेलू आय की बढ़ोतरी से भी ज्यादा रही है। यानी आमदनी 5% बढ़ी तो फीस 8-10% बढ़ गई। पांचवां, किताबों पर खर्च सबसे तेज़ी से बढ़ा है। पाठ्यपुस्तकों और रेफरेंस बुक्स की कीमतें आसमान छू रही हैं। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मॉक टेस्ट, स्टडी मटेरियल और ऑनलाइन कोर्स पर भी अभिभावक मोटा खर्च कर रहे हैं।
हाल के हफ्तों में जंतर-मंतर और देश के कई शहरों में छात्र सड़कों पर उतरे। आंदोलन की तात्कालिक वजह प्रधानमंत्री और पूर्व शिक्षा मंत्री की जोड़ी पर लगी “धांधलीपूर्ण परीक्षा व्यवस्था” के आरोप थे। पेपर लीक, रद्द परीक्षाएं और नतीजों में गड़बड़ी को लेकर छात्रों का गुस्सा फूटा। लेकिन जयराम रमेश ने कहा कि सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि मामला सिर्फ पेपर लीक तक सीमित नहीं है। युवाओं और उनके माता-पिता की पीड़ा की जड़ें बहुत गहरी हैं। एक तरफ शिक्षा की पहुंच यानी सीटें, कॉलेज, क्वालिटी की समस्या है। दूसरी तरफ सामर्थ्य यानी फीस भरने की क्षमता की समस्या है। जब फीस, किताब और कोचिंग मिलाकर एक बच्चे की पढ़ाई पर सालाना लाखों का खर्च आने लगे, तो मध्यम वर्ग का बजट चरमरा जाता है। उन्होंने कहा कि छात्र अब सिर्फ परीक्षा में पारदर्शिता नहीं मांग रहे, बल्कि वे तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि शिक्षा को फिर से किफायती बनाया जाए, सरकारी स्कूल-कॉलेजों की गुणवत्ता सुधारी जाए और निजी संस्थानों की मनमानी फीस पर लगाम लगे। शिक्षा को संविधान में “मौलिक अधिकार” कहा गया है, लेकिन हकीकत में यह लगातार महंगी होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रफ्तार रही तो आने वाले 5 साल में कई परिवारों के लिए उच्च शिक्षा पहुंच से बाहर हो जाएगी। इससे न सिर्फ असमानता बढ़ेगी, बल्कि युवाओं में निराशा और आक्रोश भी बढ़ेगा। अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पेपर लीक रोकने के लिए सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024 को सख्ती से लागू करना, दूसरी तरफ शिक्षा की लागत को नियंत्रित करने के लिए ठोस नीति बनाना। फिलहाल छात्रों, अभिभावकों और विपक्ष की निगाहें संसद और शिक्षा मंत्रालय पर टिकी हैं। जयराम रमेश ने कहा कि सरकार को अब जवाब देना होगा। सवाल एक ही है – क्या शिक्षा फिर से आम आदमी के बजट में लौट पाएगी


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