एआई के सहारे उगाही का नया खेल, लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नेटवर्क का पुणे पुलिस ने किया खुलासा

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पुणे । संगठित अपराध में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। पुणे पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़कर एआई तकनीक के माध्यम से उद्योगपतियों को धमकी भरे कॉल और संदेश भेजकर करोड़ों रुपये की उगाही की कोशिश कर रहा था। मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि एक 17 वर्षीय नाबालिग को हिरासत में लिया गया है।

पुलिस के अनुसार, पिछले दो सप्ताह के दौरान पुणे के चार उद्योगपतियों को दो करोड़ रुपये से लेकर 50 करोड़ रुपये तक की फिरौती की मांग वाले कॉल और संदेश मिले थे। शिकायत मिलने के बाद अपराध शाखा ने जांच शुरू की और तकनीकी पड़ताल के दौरान पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान राजस्थान के हनुमानगढ़ निवासी पावन प्रकाशराम बराड़ और सत्यप्रकाश कालूराम शिलोरा तथा हरियाणा के सिरसा निवासी रविकुमार राजेंद्रकुमार जांगड़ा के रूप में हुई है। वहीं, पंजाब के बठिंडा से एक नाबालिग को हिरासत में लिया गया। पुलिस का कहना है कि आरोपी पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ की विभिन्न फैक्ट्रियों में काम करते थे और वहीं से उद्योगपतियों की गतिविधियों तथा अन्य जानकारियां जुटाकर गैंग तक पहुंचाते थे।

जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से तीन विदेशी पिस्तौल, दस कारतूस और कई मोबाइल फोन बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार, 18 जून को पुणे-सासवड रोड स्थित एक स्टील फैक्टरी के मालिक से 50 करोड़ रुपये की उगाही की मांग के दौरान फैक्टरी के बाहर चार राउंड फायरिंग भी की गई थी, ताकि धमकी का असर बढ़ाया जा सके।

अपर पुलिस आयुक्त (अपराध) तेजस्वी सातपुते ने बताया कि गिरोह ऐसे कॉलिंग और मैसेजिंग एप का उपयोग कर रहा था, जो एआई तकनीक के जरिए कॉल को दुनिया के अलग-अलग सर्वरों से रूट करते थे। इससे कॉल का वास्तविक स्रोत छिप जाता था और डिजिटल ट्रैकिंग कठिन हो जाती थी। आरोपी आपसी संपर्क के लिए एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल करते थे।

जांच में सबसे अहम खुलासा यह हुआ कि धमकी भरे वॉयस कॉल और ऑडियो संदेश तैयार करने के लिए एआई टूल का इस्तेमाल किया जा रहा था। पुलिस के मुताबिक, अधिकांश आरोपी मराठी भाषा नहीं जानते थे, लेकिन उद्योगपतियों को धाराप्रवाह मराठी में धमकी भरे कॉल किए गए। अधिकारियों का मानना है कि ये आवाजें एआई की मदद से तैयार की गई थीं, जिससे पीड़ितों को कॉल करने वाले की वास्तविक पहचान का पता नहीं चल सका।

पुलिस का कहना है कि रविकुमार की पहचान लॉरेंस बिश्नोई के भाई आरजू बिश्नोई और गैंग के अन्य सदस्यों के संपर्क में रहने वाले व्यक्ति के रूप में हुई है। वह संभावित निशानों की जानकारी गैंग तक पहुंचाता था। जांच में शुभम लोणकर का नाम भी सामने आया है, जो पुणे में बिश्नोई गैंग के नेटवर्क से जुड़ा बताया जा रहा है और फिलहाल फरार है।

पुणे पुलिस अब एआई के इस्तेमाल की तकनीकी प्रक्रिया, गिरोह के डिजिटल नेटवर्क और इससे जुड़े अन्य सदस्यों की भूमिका की गहन जांच कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि यह मामला दर्शाता है कि संगठित अपराध अब आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा लेकर अपने नेटवर्क को और अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है।

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