‘पावस प्रसंग’ में शास्त्रीय नृत्य-संगीत से सजी सांस्कृतिक संध्या
शास्त्रीय गायन, भरतनाट्यम और कथक की मनोहारी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध
डॉ. आरती सिंह ने 10 विद्यार्थियों के साथ प्रस्तुत किया कथक, ‘शिव पंचाक्षर स्तोत्र’ और वर्षा ऋतु की भावाभिव्यक्ति ने बांधा समां
रायपुर । संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा विभागीय आयोजन-2026 के अंतर्गत राजधानी रायपुर में ‘पावस प्रसंग’ का आयोजन किया गया। महंत घासीदास संग्रहालय परिसर स्थित मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में वर्षा ऋतु की भावभूमि को शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत किया गया। कार्यक्रम में शास्त्रीय गायन, भरतनाट्यम और कथक समूह की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय कला की समृद्ध परंपरा से रूबरू कराया।
‘पावस प्रसंग’ के प्रथम दिवस की पहली प्रस्तुति कक्षा आठवीं की छात्रा अलका कुर्रे ने शास्त्रीय गायन के माध्यम से दी। उन्होंने अपनी सुरमयी एवं भावपूर्ण प्रस्तुति से सांस्कृतिक संध्या का आगाज किया। उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीय संगीत की बारीकियों और भावों का सुंदर समन्वय देखने को मिला।

इसके बाद होरित गौर ने भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीय नृत्य की लय, ताल, मुद्राओं और भावाभिव्यक्ति का प्रभावी प्रदर्शन देखने को मिला। भरतनाट्यम की विशिष्ट मुद्राओं और नृत्य संयोजन ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।

डॉ. आरती सिंह के निर्देशन में 10 विद्यार्थियों ने दी कथक प्रस्तुति
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण डॉ. आरती सिंह एवं उनके 10 विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत कथक रहा। सामूहिक कथक प्रस्तुति में ‘शिव पंचाक्षर स्तोत्र’ सहित वर्षा ऋतु की भावभूमि को लय, ताल, मुद्राओं और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से मंच पर साकार किया गया।
कथक कलाकारों ने सामूहिक नृत्य संयोजन में अनुशासन, तालमेल और भावाभिव्यक्ति का प्रभावी प्रदर्शन किया। वर्षा ऋतु से जुड़े विविध भावों को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए कलाकारों ने दर्शकों को प्रकृति और शास्त्रीय कला के सुंदर संगम का अनुभव कराया।
डॉ. आरती सिंह लखनऊ एवं रायगढ़ घराने से प्रशिक्षित कथक कलाकार हैं और उन्हें तीन दशकों से अधिक समय से कथक साधना एवं प्रशिक्षण का अनुभव है। वे दूरदर्शन की मान्यता प्राप्त कलाकार हैं तथा आईसीसी से भी चयनित रही हैं। उन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक मंचों पर कथक की प्रस्तुतियां दी हैं। आगामी माह तिरुपति में भी उनकी प्रस्तुति प्रस्तावित है, जहां वे ‘सियाराम’ की प्रस्तुति लेकर जाएंगी।
डॉ. आरती सिंह ने कथक के क्षेत्र में विभिन्न विषयों पर रचनात्मक प्रस्तुतियां एवं नृत्य संयोजन तैयार किए हैं। इनमें ‘सियाराम’, ‘फर्स्ट नायिका’ और ‘दिव्य ज्योति’ प्रमुख हैं। ‘दिव्य ज्योति’ स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित नृत्य नाटिका है, जिसमें उनके जीवन, विचारों और प्रेरणादायी व्यक्तित्व को नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।
युवा प्रतिभाओं ने भी दिखाई शास्त्रीय कला के प्रति रुचि
कार्यक्रम में युवा कलाकारों की सहभागिता भी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। निधि टंडन, जो वर्तमान में भिलाई में कक्षा दसवीं की विद्यार्थी हैं, ने भी कथक प्रस्तुति में सहभागिता की। वह गुरु श्रीमती अमृता सान्याल के सानिध्य में पिछले लगभग पांच वर्षों से कथक का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं।
निधि ने कक्षा पांचवीं से ही कथक सीखना शुरू किया और नियमित अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्यम से इस शास्त्रीय नृत्य विधा में अपनी प्रतिभा विकसित की है। उनकी सहभागिता ने कार्यक्रम में नई पीढ़ी की शास्त्रीय कला के प्रति बढ़ती रुचि को भी रेखांकित किया।
वरिष्ठ कलाकारों के अनुभव और युवा प्रतिभाओं का संगम
‘पावस प्रसंग’ की प्रस्तुतियों में वरिष्ठ कलाकारों के अनुभव और युवा प्रतिभाओं के उत्साह का सुंदर समन्वय देखने को मिला। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि भारतीय शास्त्रीय कलाओं की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने में नियमित प्रशिक्षण, निरंतर साधना और नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है।
वर्षा ऋतु की भावभूमि और शास्त्रीय कला का सुंदर संगम
‘पावस प्रसंग’ में वर्षा ऋतु को केवल प्राकृतिक परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संगीत और नृत्य परंपरा में निहित विविध भावनाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया। शास्त्रीय गायन और नृत्य के माध्यम से प्रकृति, भक्ति, उल्लास और संवेदना जैसे विभिन्न भावों को मंच पर प्रभावी अभिव्यक्ति मिली।
मुक्ताकाशी मंच पर उपस्थित कला एवं संस्कृति प्रेमियों ने कलाकारों की प्रस्तुतियों का उत्साहपूर्वक आनंद लिया और उनका उत्साहवर्धन किया। प्रस्तुतियों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की समृद्ध परंपरा, विविधता और भावप्रधानता को प्रभावी ढंग से सामने रखा।
संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित यह आयोजन कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने के साथ-साथ शास्त्रीय कलाओं को आमजन तक पहुंचाने और नई पीढ़ी को भारतीय कला एवं संस्कृति की समृद्ध परंपराओं से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा। ‘पावस प्रसंग’ की सांस्कृतिक संध्या वर्षा ऋतु की संवेदनाओं और भारतीय शास्त्रीय संगीत-नृत्य के सुंदर संगम के रूप में यादगार रही।

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