परंपरागत खेती से व्यावसायिक उद्यानिकी का सफर

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नारायणपुर के कालेंद्र कुमेटी बने किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत

रायपुर । छत्तीसगढ़ के जनजातीय बाहुल्य नारायणपुर जिले में उद्यानिकी विभाग के प्रयासों और आधुनिक कृषि तकनीकों के समावेश से किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। जिले के किसानों को परंपरागत और कम मुनाफे वाली फसलों से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक उद्यानिकी की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका असर किसानों की खेती के तरीके के साथ-साथ उनकी आमदनी पर भी दिखाई दे रहा है।

विकासखंड नारायणपुर के ग्राम केरलापाल निवासी किसान कालेंद्र कुमेटी पिता स्व. दुकुरू इस बदलाव की एक सशक्त मिसाल बनकर सामने आए हैं। एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना का लाभ लेकर उन्होंने पारंपरिक खेती से आगे बढ़ते हुए सब्जी उत्पादन को व्यावसायिक रूप दिया। आधुनिक तकनीक, विभागीय मार्गदर्शन और मेहनत के बेहतर समन्वय से आज वे खेती के माध्यम से प्रतिवर्ष 2 से 3 लाख रुपये तक की आमदनी अर्जित कर रहे हैं।

ड्रिप सिंचाई और उन्नत बीज ने बदली खेती की तस्वीर

एक समय कालेंद्र कुमेटी पूरी तरह पारंपरिक खेती पर निर्भर थे। खेत में कड़ी मेहनत और लागत लगाने के बावजूद उन्हें अपेक्षाकृत सीमित मुनाफा ही मिल पाता था। खेती में मेहनत अधिक और आय सीमित होने के कारण बेहतर विकल्प की तलाश उनके लिए जरूरी हो गई थी।

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इसी दौरान उन्होंने जिला उद्यानिकी विभाग से संपर्क किया। विभागीय अधिकारियों ने उन्हें उद्यानिकी फसलों की संभावनाओं के साथ-साथ ड्रिप सिंचाई प्रणाली, उन्नत बीज और सब्जी उत्पादन की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी। वर्ष 2025-26 में एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत उन्हें लौकी एवं मिर्च की खेती के लिए अनुदान के साथ आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया।

सरकारी सहायता मिलने के बाद कालेंद्र ने अपने खेत में उद्यानिकी फसलों की खेती शुरू करने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे उन्होंने आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए खेती के पारंपरिक तरीके में बदलाव किया और सब्जी उत्पादन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया।

करेला, बरबटी, लौकी और मिर्च की लहलहाती फसलें

वर्तमान में कालेंद्र कुमेटी के खेत में करेला, बरबटी, लौकी और मिर्च की फसलें लहलहा रही हैं। खेत में दिखाई दे रही फसलें उनकी मेहनत और आधुनिक कृषि तकनीक के बेहतर इस्तेमाल की तस्वीर पेश कर रही हैं।

ड्रिप सिंचाई तकनीक के जरिए खेत में पानी और उर्वरक का संतुलित प्रबंधन किया जा रहा है। इससे फसलों को आवश्यकता के अनुसार पानी और पोषक तत्व उपलब्ध हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप फसल की गुणवत्ता के साथ उत्पादन में भी वृद्धि हुई है।

कालेंद्र के लिए यह बदलाव केवल खेती की तकनीक बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति को भी मजबूती मिली है। आधुनिक तरीके से सब्जी उत्पादन कर वे अब खेती से प्रतिवर्ष 2 से 3 लाख रुपये तक की आमदनी अर्जित कर रहे हैं।

आसपास के किसानों ने भी अपनाया व्यावसायिक सब्जी उत्पादन

कालेंद्र कुमेटी की सफलता का प्रभाव उनके खेत तक सीमित नहीं रहा। उनकी खेती और आमदनी में आए बदलाव को देखकर आसपास के गांवों के अन्य किसान भी व्यावसायिक सब्जी उत्पादन की ओर आकर्षित हुए हैं।

जानकारी के अनुसार, कालेंद्र की सफलता से प्रेरित होकर आसपास के करीब 10 से 15 अन्य किसान अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर व्यावसायिक सब्जी उत्पादन को अपनाने लगे हैं। इससे क्षेत्र में आधुनिक उद्यानिकी खेती को लेकर किसानों की रुचि बढ़ने लगी है।

सरकारी योजना, तकनीकी मार्गदर्शन और मेहनत का बेहतर परिणाम

कालेंद्र कुमेटी का सफर इस बात का उदाहरण है कि किसानों को यदि समय पर शासकीय योजनाओं का लाभ, तकनीकी मार्गदर्शन और आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों तथा किसान स्वयं मेहनत और लगन के साथ नई तकनीकों को अपनाए, तो खेती को लाभकारी व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है।

एकीकृत बागवानी विकास मिशन के माध्यम से मिले सहयोग और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन ने कालेंद्र को पारंपरिक खेती से व्यावसायिक उद्यानिकी की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दिया। आज उनकी फसल और आय में आया बदलाव आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है।

कालेंद्र कुमेटी की कहानी यह दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक और योजनाबद्ध तरीके से की गई उद्यानिकी खेती ग्रामीण क्षेत्रों में आय के नए अवसर पैदा कर सकती है। साथ ही, इससे किसानों को अपनी पारंपरिक खेती के साथ व्यावसायिक सब्जी उत्पादन को अपनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

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