करही गोलीकांड: 15 दिन बाद भी खाली हाथ पुलिस, हाईटेक दावों की खुली पोल35 जवान, हजारों CCTV, कॉल डिटेल—फिर भी गायब आरोपी, सवालों के घेरे में सिस्टमपीड़ित दर-दर भटका, IG दफ्तर तक पहुंचा परिवार—न्याय अब भी अधर में

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बिलासपुर । बिलासपुर रेंज आईजी रामगोपाल गर्ग ने पदभार संभालते ही स्मार्ट पुलिसिंग, हाईटेक मॉनिटरिंग और टेक्नोलॉजी से अपराधियों तक पहुंचने के बड़े-बड़े दावे किए थे। कहा गया था कि “त्रिनयन” और “सशक्त” जैसे ऐप अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी को तेज करेंगे, QR कोड के जरिए पीड़ित सीधे बड़े अफसरों तक पहुंच सकेंगे और थानेदारों की मनमानी पर लगाम लगेगी। लेकिन करही गोलीकांड ने इन तमाम दावों की जमीनी हकीकत खोलकर रख दी है। 15 दिन बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं। 35 जवान जांच में लगे होने, हजारों CCTV फुटेज और कॉल डिटेल खंगालने के दावों के बावजूद न कोई ठोस सुराग मिला, न किसी मुख्य आरोपी तक पुलिस पहुंच सकी। परिवार थाना से लेकर IG, विधायक, सांसद और मंत्री तक न्याय की गुहार लगा चुका है, लेकिन सिस्टम अब भी सिर्फ दावों और बैठकों में उलझा नजर आ रहा है। लोग पूछ रहे हैं —क्या टेक्नोलॉजी सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित है? क्या बैठकों और निर्देशों का असर जमीन पर नहीं दिखता? और जब पीड़ित परिवार खुद IG कार्यालय तक पहुंच चुका है, तब भी जांच में वह तेजी क्यों नहीं दिख रही, जिसकी बातें मंचों से की जाती हैं ?अगर सिस्टम इतना स्मार्ट हो गया है, तो फिर न्याय अब भी इतना कमजोर क्यों दिख रहा है? ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या हाईटेक पुलिसिंग सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और मीडिया की सुर्खियों तक सीमित है, जबकि जमीन पर अपराधी अब भी कानून से दो कदम आगे चल रहे हैं?

Janjgir-Champa के बिर्रा थाना क्षेत्र स्थित करही गांव में हुए बहुचर्चित गोलीकांड और आयुष कश्यप हत्याकांड को 15 दिन से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस अब तक किसी भी मुख्य आरोपी तक नहीं पहुंच सकी है।

जिस वारदात ने पूरे इलाके को हिला दिया था, अब वही मामला कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

23-24 अप्रैल की दरमियानी रात करही गांव में कांग्रेस नेता सम्मेलाल कश्यप के घर में घुसकर नकाबपोश बदमाशों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। हमले में 19 वर्षीय आयुष कश्यप की मौत हो गई, जबकि उसका छोटा भाई आशुतोष कश्यप घायल हो गया था।

वारदात के बाद पुलिस ने बड़े स्तर पर जांच शुरू करने का दावा किया। 35 पुलिसकर्मियों की टीम गठित की गई। हजारों CCTV फुटेज खंगाले गए। हजारों कॉल डिटेल की जांच हुई। 100 से ज्यादा लोगों से पूछताछ भी की गई।

लेकिन 15 दिन बाद भी नतीजा शून्य है।

न्याय के लिए हर दरवाजा खटखटा चुका परिवार

आयुष कश्यप के परिजन अब तक थाना, पुलिस अफसर, बिलासपुर रेंज IG और जनप्रतिनिधियों तक से मुलाकात कर चुके हैं।

परिवार ने बिलासपुर जाकर IG से आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की। जांजगीर में कांग्रेस विधायक Byas Kashyap से मिलकर न्याय की गुहार लगाई। मामला बढ़ने के बाद जांजगीर-चाम्पा की भाजपा सांसद Kamlesh Jangde ने भी प्रशासन को कार्रवाई के निर्देश देने की बात कही।

इसके बावजूद पुलिस अब तक खाली हाथ है।

“रेत खनन की वजह से गई बेटे की जान”

मृतक आयुष के पिता सम्मेलाल कश्यप लगातार आरोप लगा रहे हैं कि हत्या के पीछे अवैध रेत कारोबार का विवाद है। उनका कहना है कि कुछ रसूखदार लोगों के नाम पुलिस को दिए गए, लेकिन अब तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

यही वजह है कि अब गांव में चर्चा तेज हो गई है कि आखिर पुलिस की जांच किस दिशा में चल रही है ?

लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब पुलिस के पास तकनीक, संसाधन और पूरी टीम मौजूद है, तो फिर आरोपी अब तक गिरफ्त से बाहर कैसे हैं ?

विधायक का तंज — “पाताल से भी पकड़ सकती है पुलिस”

कांग्रेस विधायक ब्यास कश्यप ने मामले में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज पुलिस आधुनिक तकनीकों से लैस है।

उन्होंने कहा — “अगर पुलिस चाहे तो पाताल से भी अपराधियों को पकड़ सकती है। फिर 15 दिन बाद भी आरोपी बाहर घूम रहे हैं, यह बड़ा सवाल है।”

सांसद ने भी मांगी सख्त कार्रवाई

भाजपा सांसद कमलेश जांगड़े ने कहा कि घटना में शामिल किसी भी आरोपी को बख्शा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कलेक्टर और एसपी को कार्रवाई करने के लिए कहा है। साथ ही जिले में अवैध रेत उत्खनन पर रोक लगाने की जरूरत भी बताई।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

जिस घर में दो बेटों की हंसी गूंजती थी, वहां अब मातम पसरा है। आयुष की मौत के बाद परिवार गहरे सदमे में है। घायल भाई आशुतोष अब भी उस रात के खौफ से बाहर नहीं निकल पाया है।

परिवार को सिर्फ बेटे को खोने का दर्द नहीं है, बल्कि यह डर भी है कि कहीं यह मामला भी लंबी जांच और फाइलों में दबकर न रह जाए।

सिस्टम पर सबसे बड़ा सवाल

करही गोलीकांड अब सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं रह गया है। यह उस सिस्टम पर सवाल बन चुका है, जहां पीड़ित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकता है और आरोपी समय के साथ और दूर निकल जाते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है —
अगर यही वारदात किसी रसूखदार परिवार के साथ हुई होती, तो क्या तब भी 15 दिन तक आरोपी खुले घूम रहे होते?

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