देवरानी-जेठानी मंदिर- पत्थरों पर जीवंत इतिहास और रहस्यमयी शिल्प का संगम
ताला की अद्भुत शैव विरासत, जहाँ कला, अध्यात्म और पुरातत्व की सीमाएं मिलती हैं
रायपुर । छत्तीसगढ़ की हृदयस्थली में बिलासपुर जिले में बसा ताला केवल एक पुरातत्व स्थल नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला की उस पराकाष्ठा का प्रमाण है, जहाँ पत्थर बोलते हैं। रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग पर मनियारी नदी के तट पर स्थित देवरानी-जेठानी मंदिर अपनी अद्वितीय मूर्तिकला और रहस्यमयी रूद्र शिव प्रतिमा के कारण दुनिया भर के इतिहासकारों और पर्यटकों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है।
मनियारी के तट पर गुप्तकालीन वैभव बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर ताला गांव में स्थित ये दो शिव मंदिर लगभग 1500 वर्ष पुराने (छठवीं-सातवीं शताब्दी) माने जाते हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार यह गुप्तकालीन स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। मनियारी नदी की कलकल ध्वनि के बीच खड़े ये मंदिर कभी एक समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक सत्ता के केंद्र हुआ करते थे।

शैव और तांत्रिक साधना का प्राचीन केंद्र ताला प्राचीन काल से ही शैव मत और तांत्रिक क्रियाओं का गढ़ रहा है। यहाँ की मूर्तियों के विन्यास से स्पष्ट होता है कि यह स्थल महामृत्युंजय जाप और शिव उपासना के विभिन्न संप्रदायों की गतिविधियों का मुख्य केंद्र था। पास ही स्थित मल्हार (ऐतिहासिक नगर) और धूमनाथ मंदिर इस क्षेत्र की प्राचीन आध्यात्मिक महत्ता की पुष्टि करते हैं।
स्थापत्य कला भग्न अवशेषों में छिपी भव्यता भले ही समय की मार से जेठानी मंदिर आज भग्न अवस्था में है, लेकिन इसके स्तंभों पर उकेरी गई यक्ष, गण और भारवाहकों की आकृतियां आज भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। मंदिरों की संरचना में अर्द्धमंडप, अंतराल और गर्भगृह का शास्त्रीय नियोजन दिखाई देता है। उत्तरी भाग में विराजमान विशाल हाथियों की प्रतिमाएं प्राचीन शिल्पकला के वैभव की गवाह हैं।

मूर्तिकला का अद्भुत खजाना रूद्र शिव का रहस्य ताला की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की रहस्यमयी रूद्र शिव प्रतिमा है। वर्ष 1987-88 के उत्खनन में मिली 2.54 मीटर ऊंची यह प्रतिमा विश्व की दुर्लभतम मूर्तियों में से एक है, जिसमें अनोखा चमत्कार है। प्रतिमा का हर अंग किसी न किसी जीव की आकृति से बना है। चेहरे पर मयूर, कंधों पर मकर, जंघाओं पर हाथी और पेट पर केकड़े जैसी आकृतियों का ऐसा संयोजन है कि वह शिव के अघोर स्वरूप को साक्षात प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त यहाँ चतुर्भुज कार्तिकेय, अर्धनारीश्वर और शालभंजिका की दुर्लभ प्रतिमाएं भारतीय मूर्तिकला के स्वर्ण युग की याद दिलाती हैं।

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