बस्तर की ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू हुए संस्कृति संचालक डॉ. संजय कन्नौजे

जगदलपुर संग्रहालय में भूमकाल आंदोलन की ऐतिहासिक बंदूकों और दुर्लभ प्रतिमाओं का किया अवलोकन
आने वाली पीढ़ियों को इतिहास और सभ्यता से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं संग्रहालय
रायपुर । विश्व संग्रहालय दिवस के अवसर पर संस्कृति, पुरातत्व एवं धर्मस्व विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने जगदलपुर स्थित पंडित गंगाधर सामंत पुरातत्त्व संग्रहालय का विशेष दौरा किया। उन्होंने वहां संरक्षित ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक धरोहरों का गहन निरीक्षण किया। इस दौरान डॉ. कन्नौजे ने संग्रहालय के अधिकारियों व कर्मचारियों को शुभकामनाएं देते हुए छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में उनके योगदान की सराहना की।

भूमकाल आंदोलन की बंदूकें और 5वीं शताब्दी की प्रतिमाएं बनीं आकर्षण निरीक्षण के दौरान डॉ. कन्नौजे ने संग्रहालय में संजोए गए कई अमूल्य पुरावशेषों का बारीकी से अवलोकन किया, जिनमें प्रमुख हैं। ऐतिहासिक प्रतिमाएंरू गढ़धनोरा से प्राप्त 5वीं शताब्दी की भगवान विष्णु की प्रतिमा और जगदलपुर से मिली 11वीं शताब्दी की उमा-महेश्वर की दुर्लभ प्रतिमा। ब्रिटिश काल से लेकर अब तक सुरक्षित रखी गई ऐतिहासिक बंदूकें, इनमें विशेष रूप से शहीद गुंडाधुर के ऐतिहासिक भूमकाल आंदोलन के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियार और काकतीय राजवंश के अंतिम शासक महाराज प्रवीरचंद्र भंजदेव के महल से जब्त ऐतिहासिक हथियार शामिल हैं।

बस्तर की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं संचालक संस्कृति एवं पुरातत्व डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि बस्तर की ऐतिहासिक महत्ता पर विशेष जोर दिया। बस्तर केवल अपने नैसर्गिक और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक विरासत के लिए भी देशभर में अनूठी पहचान रखता है। यहां की मूर्तिकला, स्थापत्य और जीवंत लोक परंपराएं हमारे गौरवशाली अतीत का आईना हैं। उन्होंने आम जनता से भी अपील की कि वे अपनी इस धरोहर को पहचानें और इसके संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाएं। साथ ही, उन्होंने बस्तर संभाग के सुदूर वनांचलों में बिखरी लोक कलाओं व पारंपरिक विरासतों को चिन्हित कर सहेजने की आवश्यकता पर बल दिया।

गढ़धनोरा के गोबरहीन शिव मंदिर का भी किया भ्रमण इस सांस्कृतिक दौरे के अंतर्गत डॉ. कन्नौजे ने कोंडागांव जिले के ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व के स्थल गढ़धनोरा स्थित गोबरहीन शिव मंदिर का भी भ्रमण किया। उन्होंने वहां पूजा-अर्चना कर मंदिर की प्राचीन स्थापत्य शैली और पुरातात्विक महत्व की जानकारी ली। उन्होंने रेखांकित किया कि संग्रहालय केवल पुरानी वस्तुओं को रखने का डिपो नहीं हैं, बल्कि ये हमारी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, संस्कृति और सभ्यता से जोड़ने का एक जीवंत माध्यम हैं।

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