हाई कोर्ट ने डॉक्टर का जिला बदर आदेश किया निरस्त
रिपोर्टर ✒️ बसंत कुमार
प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर राज्य सरकार की कार्रवाई रद्द, डॉ. दुष्यंत खोसला को बड़ी राहत
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुर्ग जिले के प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ. दुष्यंत खोसला को बड़ी राहत देते हुए उनके विरुद्ध पारित जिला बदर (एक्सटर्नमेंट) आदेश तथा राज्य शासन के गृह विभाग द्वारा पारित अपीलीय आदेश को निरस्त कर दिया है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जिला बदर की पूरी कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत की गई तथा वैधानिक प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाली कठोर प्रशासनिक कार्रवाई बिना पर्याप्त साक्ष्य और निष्पक्ष सुनवाई के नहीं की जा सकती। इस फैसले को प्रशासनिक शक्तियों के न्यायसंगत उपयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बिना सुनवाई दर्ज किए गए बयान
याचिकाकर्ता डॉ. खोसला की ओर से हाई कोर्ट में अधिवक्ता श्रद्धा राज ज्योतिषी, प्रमांशु शर्मा एवं संदीप कुमार तिवारी ने पक्ष रखा। याचिका में बताया गया कि जिला प्रशासन ने याचिकाकर्ता को प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए बिना ही एकतरफा तरीके से गवाहों के बयान दर्ज कर लिए।
साथ ही, डॉ. खोसला को गवाहों से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने और अपना पक्ष रखने का वैधानिक अवसर भी नहीं दिया गया। अधिवक्ताओं ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन बताया।
मौलिक अधिकारों पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि जिला बदर जैसा आदेश किसी भी नागरिक के निवास, देश के भीतर आवागमन और सम्मानजनक आजीविका जैसे मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कठोरता से पालन करें। न्यायालय ने संकेत दिया कि प्रक्रिया में लापरवाही नागरिक स्वतंत्रता पर अनुचित हस्तक्षेप के समान है।
केवल लंबित मुकदमे पर्याप्त आधार नहीं
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा— किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल आपराधिक मामले दर्ज होना या उनका लंबित होना जिला बदर का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि डॉ. खोसला की गतिविधियों से लोक व्यवस्था प्रभावित हो रही थी या उनकी उपस्थिति से जनसुरक्षा को गंभीर खतरा था।
इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने 8 जनवरी 2026 को पारित जिला बदर आदेश और 7 मई 2026 को पारित राज्य सरकार के अपीलीय आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।
न्याय की जीत: अधिवक्ताओं की प्रतिक्रिया
फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता श्रद्धा राज ज्योतिषी ने कहा कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने वाली कार्रवाई पर्याप्त साक्ष्यों और निष्पक्ष सुनवाई के बिना नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि न्यायालय ने माना है कि जिला बदर की पूरी प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी और यह निर्णय भविष्य में प्रशासनिक शक्तियों के विधिसम्मत उपयोग के लिए मार्गदर्शक बनेगा।
अधिवक्ता प्रमांशु शर्मा ने कहा कि यह फैसला केवल याचिकाकर्ता के लिए राहत नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मिसाल है।
प्रशासन को स्पष्ट संदेश
हाई कोर्ट के इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञ एक महत्वपूर्ण नजीर मान रहे हैं। उनका कहना है कि अदालत ने कार्यपालिका को स्पष्ट संदेश दिया है कि बिना तथ्य, पर्याप्त साक्ष्य और न्यायसंगत प्रक्रिया के किसी भी नागरिक के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई स्वीकार्य नहीं होगी।
यह निर्णय भविष्य में जिला बदर जैसे मामलों में प्रशासनिक विवेक और न्यायिक संतुलन दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाएगा।

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