सहकारी समितियों में ‘स्वच्छता अभियान’ या सिर्फ फोटो सेशन? सहकारिता सप्ताह के नाम पर झाड़ू हाथ में, कैमरे के सामने मुस्कान… ‘शब्द नहीं, चित्र ही काफी’

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मुंगेली । भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के गठन के पांच वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 29 जून से 6 जुलाई 2026 तक देशभर में सहकारिता सप्ताह मनाया जा रहा है। इस दौरान विभिन्न कार्यक्रमों के साथ सहकारी समितियों में विशेष स्वच्छता अभियान भी चलाया गया। आधिकारिक दावों में इस अभियान को स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी का बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है, लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी और सामने आई तस्वीरें कुछ अलग संकेत देती नजर आ रही हैं।

सूत्रों के अनुसार जिले की कई सहकारी समितियों में स्वच्छता अभियान के नाम पर झाड़ू लेकर कुछ समय का प्रतीकात्मक श्रमदान किया गया। अभियान शुरू होते ही कैमरे सक्रिय हुए, तस्वीरें ली गईं और औपचारिकता पूरी होने के बाद कई जगह व्यवस्थाएं फिर पुराने ढर्रे पर लौटती दिखाई दीं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यह पहल वास्तविक सफाई से अधिक औपचारिकता और फोटो सेशन तक सीमित रही।

दावे बड़े, लेकिन जमीनी तस्वीरें उठाने लगीं सवाल

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अभियान के दौरान समिति परिसर, कार्यालय कक्ष, गोदाम और आसपास के क्षेत्रों की सफाई किए जाने का दावा किया गया। प्लास्टिक मुक्त परिसर, व्यवस्थित अभिलेख और हरित वातावरण निर्माण जैसे संदेश भी दिए गए।

हालांकि सूत्रों के अनुसार कई स्थानों पर वास्तविक स्थिति इन दावों से मेल खाती नहीं दिखी। कुछ समिति परिसरों में पुराने कचरे, धूल-गंदगी, बिखरे रिकॉर्ड और अव्यवस्थित कार्यालय व्यवस्था को लेकर स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए। लोगों का कहना है कि यदि नियमित साफ-सफाई की प्रभावी व्यवस्था होती, तो विशेष अभियान की जरूरत ही क्यों पड़ती।

‘शब्द नहीं, चित्र’ चर्चा के केंद्र में

अभियान की सबसे अधिक चर्चा तस्वीरों को लेकर रही। सोशल मीडिया और विभागीय समूहों में साझा किए गए फोटो में अधिकारी-कर्मचारी झाड़ू लेकर सफाई करते दिखाई दिए। लेकिन आमजन के बीच सवाल बना रहा कि क्या सफाई वास्तव में उतनी व्यापक हुई, जितना प्रचारित किया गया।

सूत्रों के हवाले से स्थानीय नागरिकों का कहना है कि “शब्दों से ज्यादा चित्र सच बोलते हैं।” यदि अभियान का उद्देश्य स्थायी बदलाव है, तो उसका असर केवल फोटो में नहीं बल्कि समिति परिसरों की नियमित स्वच्छता में भी दिखना चाहिए।

स्थायी सुधार पर टिकी असली कसौटी

सहायक आयुक्त सहकारिता हितेश श्रीवास ने अभियान के दौरान सहकारिता को आर्थिक विकास के साथ सामाजिक दायित्व और सामुदायिक सहभागिता का मजबूत माध्यम बताया। उन्होंने डिजिटल सेवाओं और आधुनिक तकनीक के विस्तार की भी बात कही।

हालांकि जानकारों का मानना है कि किसी भी अभियान की वास्तविक सफलता शपथ, भाषण या प्रतीकात्मक सफाई से नहीं आंकी जा सकती। सफलता की असली कसौटी नियमित निगरानी, पारदर्शिता और स्थायी सुधार है।

जनता की नजर अब परिणामों पर

सहकारिता सप्ताह के तहत चलाए गए इस अभियान ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल औपचारिकता निभाना है या वास्तव में जमीनी बदलाव लाना। जनता की अपेक्षा है कि स्वच्छता अभियान दिखावे से आगे बढ़कर वास्तविक परिणाम दे।

फिलहाल जिले में इतना जरूर कहा जा रहा है— “स्वच्छता अभियान का अच्छा उदाहरण… शब्द नहीं, चित्र ही काफी हैं।”

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