विरासत संरक्षण में नैतिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी : विशेषज्ञ
‘विरासत का प्रवाह’ राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ, समुदाय की भागीदारी पर भी जोर
रायपुर । संस्कृति विभाग, पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय के तत्वावधान में ‘विरासत का प्रवाह : नैतिकता, संरक्षण और समुदाय’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुक्रवार को शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे विशेषज्ञों, विद्वानों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों ने विरासत संरक्षण के विविध पहलुओं पर विस्तार से मंथन किया।
संगोष्ठी में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि इतिहास और विरासत के संरक्षण एवं प्रस्तुतीकरण में तथ्य, प्रमाण, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आधार बनाया जाना चाहिए। साथ ही स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को विरासत संरक्षण की स्थायी व्यवस्था के लिए आवश्यक बताया गया।

विरासत केवल स्मृतियां नहीं, सामूहिक पहचान का आधार
कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन एवं परिचय पुरातत्त्ववेत्ता प्रभात कुमार सिंह ने दिया। उन्होंने कहा कि विरासत केवल अतीत की स्मृतियों, ऐतिहासिक इमारतों या पुरावशेषों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक पहचान, ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण आधार है।

उन्होंने कहा कि विरासत संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। संरक्षण की प्रक्रिया में विरासत के मूल स्वरूप, ऐतिहासिक संदर्भ और उसके सामाजिक महत्व को समझना आवश्यक है।
शोध और व्यवहारिक प्रयासों में समन्वय जरूरी
मुख्य अतिथि नई दिल्ली की प्रो. ऋचा कम्बोज ने विरासत संरक्षण के व्यापक आयामों पर विचार रखते हुए शोध, ज्ञान और व्यवहारिक संरक्षण प्रयासों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।
विशिष्ट अतिथि गुजरात के ओजस हिरानी और छत्तीसगढ़ के टोप लाल शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि विरासत संरक्षण को प्रभावी और दीर्घकालिक बनाने के लिए शैक्षणिक संस्थानों, शासन और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
इतिहास लेखन में तथ्य, तर्क और नैतिकता जरूरी : शशांक शर्मा
साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने भारतीय इतिहास के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए इतिहास और विरासत से जुड़े विषयों को प्रमाणिक एवं तथ्यपरक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि इतिहास से संबंधित विषयों में भ्रामक अथवा तथ्यहीन कथनों और गढ़े गए आख्यानों के व्यापक दुष्परिणाम हो सकते हैं। इसलिए इतिहास के अध्ययन, लेखन और प्रस्तुतीकरण में तथ्य, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पालन किया जाना चाहिए।
शर्मा ने कहा कि इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति और पहचान को आकार देने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में इतिहास लेखन में शुचिता, निष्पक्षता और नैतिकता का विशेष महत्व है। विरासत और इतिहास को भावी पीढ़ियों तक सही संदर्भ और प्रमाणिकता के साथ पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।
वर्तमान और भावी पीढ़ियों के प्रति सामूहिक दायित्व : डॉ. संजय कन्नौजे
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृति एवं पुरातत्त्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने की। उन्होंने कहा कि विरासत संरक्षण वर्तमान और भावी पीढ़ियों के प्रति सामूहिक दायित्व है। संरक्षण प्रक्रिया में नैतिकता, प्रामाणिकता, वैज्ञानिक पद्धति और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को समान महत्व दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों की सक्रिय सहभागिता से संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी, संवेदनशील और टिकाऊ बनाए जा सकते हैं। विरासत से जुड़े समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया का सहभागी बनाना आवश्यक है, ताकि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण केवल सरकारी प्रयास बनकर न रह जाए।
विशेषज्ञों के अनुभवों से प्रशिक्षित होंगे प्रतिभागी
शुभारंभ सत्र के अंत में अतिथि वक्ताओं को स्मृति चिह्न एवं राजकीय गमछा भेंट कर सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों के लिए अनुभव एवं विचारों के आदान-प्रदान का मंच बन रहा है। कार्यक्रम में संरक्षण की आधुनिक एवं वैज्ञानिक पद्धतियों, नैतिक पहलुओं तथा समुदाय की भूमिका पर विशेषज्ञों के अनुभव साझा किए जा रहे हैं।
संगोष्ठी के माध्यम से विरासत संरक्षण को केवल शासकीय जिम्मेदारी के बजाय समाज, समुदाय, विशेषज्ञों और संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी के रूप में विकसित करने की दिशा में विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है।

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