ग्राम जोंधरा में धूमधाम से मना भोजली त्योहार, लोकगीतों ने बांधा समां
रिपोर्टर ✒️ रूपचंद रॉय
मस्तूरी । छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी लोक संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक भोजली त्योहार ग्राम जोंधरा में इस वर्ष भी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया। ग्रामवासियों ने भोजली पर्व को प्रतिवर्ष की तरह महोत्सव के रूप में मनाते हुए अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए रखने का संदेश दिया। त्योहार में महिलाओं की सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

भोजली पर्व के अवसर पर गांव के अलग-अलग मोहल्लों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। कई मोहल्लों में एक दिवसीय अखंड रामायण पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पूरे दिन गांव में धार्मिक वातावरण के साथ लोक संस्कृति और आपसी भाईचारे की भावना देखने को मिली।

महिलाओं की रही विशेष सहभागिता
भोजली त्योहार छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति में विशेष महत्व रखता है। जोंधरा में भी महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भोजली पर्व में सक्रिय सहभागिता निभाई। महिलाओं द्वारा भोजली गीत गाए गए और पारंपरिक तरीके से उत्सव मनाया गया। इस दौरान गांव की पुरानी परंपराओं और लोकाचार की झलक देखने को मिली।
ग्रामवासियों का कहना है कि आधुनिकता के दौर में अपनी पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। इसी उद्देश्य से जोंधरा के ग्रामीण वर्षों से भोजली त्योहार को उत्सव के रूप में मनाते आ रहे हैं। इससे बच्चों और युवा पीढ़ी को भी अपनी संस्कृति एवं परंपराओं को करीब से जानने और समझने का अवसर मिल रहा है।
संगीत मंडलियों ने बढ़ाया उत्सव का रंग
भोजली कार्यक्रम में डिपरापारा और भिलौनी की संगीत मंडलियों ने विशेष प्रस्तुति दी। लोक संस्कृति से जुड़े पारंपरिक गीतों की प्रस्तुतियों ने पूरे माहौल को उत्सवमय बना दिया। संगीत मंडलियों की प्रस्तुतियों पर ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। लोकगीतों और पारंपरिक धुनों ने भोजली पर्व को एक सामान्य धार्मिक आयोजन से आगे बढ़ाकर सांस्कृतिक महोत्सव का रूप दे दिया।
पंचायत और ग्राम विकास समिति का सहयोग
कार्यक्रम के सफल आयोजन में ग्राम पंचायत जोंधरा एवं ग्राम विकास समिति जोंधरा का विशेष सहयोग रहा। आयोजन को व्यवस्थित एवं सफल बनाने में सरपंच समारू केंवट, विकास तिवारी, अभय तिवारी, जयसिंह, संजय, सुखऊ, हेमंत, इतवारी एवं सुकलाल चंदेल सहित ग्रामीणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से आयोजन में सहयोग करते हुए सामाजिक एकता और सहभागिता की मिसाल पेश की।
आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति बचाने की पहल
ग्रामवासियों ने कहा कि भोजली जैसे पारंपरिक त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि ये छत्तीसगढ़ की पहचान, लोक जीवन, कृषि संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक एकता से जुड़े हुए हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से पुरानी पीढ़ी अपनी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाती है।
जोंधरा में भोजली त्योहार का निरंतर आयोजन इस बात का उदाहरण है कि ग्रामीण अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को लेकर सजग हैं। लोकगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से अपनी संस्कृति को जीवित रखना भावी पीढ़ियों के लिए एक श्रेष्ठ प्रयास है। भोजली महोत्सव ने गांव में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता, भाईचारे और छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर प्रस्तुत की।

The News Related To The News Engaged In The www.apnachhattisgarh.com Web Portal Is Related To The News Correspondents The Editor Does Not Necessarily Agree With These Reports The Correspondent Himself Will Be Responsible For The News.
