मुंगेली जिले में खाद्य आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल, एक ही कर्मी पर तीन केंद्रों की जिम्मेदारी से उठी पारदर्शिता पर शंका
मुंगेली – जिले के खाद्य नागरिक आपूर्ति निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। धान उपार्जन और चावल गुणवत्ता परीक्षण की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं, जिससे न केवल व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है, बल्कि जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था भी कटघरे में दिखाई दे रही है।
सूत्रों के अनुसार, पंकज कुमार गोयल तकनीकी सहायक प्रदाय केन्द्र धपई व लोरमी प्रदाय केन्द्र धपई, लोरमी एवं सरगाँव जिले के लोरमी, धपई और सरगांव केंद्रों में एक ही कर्मी को जिम्मेदारी सौंप दी गई है। यह स्थिति प्रशासनिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी असंभव प्रतीत होती है। खास बात यह है कि लोरमी और सरगांव के बीच लगभग 60 से 70 किलोमीटर की दूरी है। ऐसे में एक ही दिन में तीनों केंद्रों पर पहुंचकर चावल के लॉट का परीक्षण करना, रिपोर्ट तैयार करना और ओटीपी के माध्यम से ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करना सवालों को जन्म देता है।
मिली जानकारी के मुताबिक, एक लॉट का विश्लेषण करने में औसतन 20 से 25 मिनट का समय लगता है। ऐसे में यदि लाखों रुपए के चावल का परीक्षण एक ही दिन में तीन अलग-अलग केंद्रों पर किया जा रहा है, तो यह प्रक्रिया संदेहास्पद नजर आती है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या वास्तव में मौके पर जाकर परीक्षण किया जा रहा है या फिर कहीं दूर बैठकर केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं।
कोरबा जिले में हाल ही में सामने आए ओटीपी घोटाले की तर्ज पर मुंगेली में भी इसी प्रकार की गतिविधियों की आशंका जताई जा रही है। वहां बिना मौके पर पहुंचे, दूसरे व्यक्ति की आईडी और ओटीपी के माध्यम से कागज तैयार किए गए थे। अब मुंगेली में भी वैसी ही स्थिति बनने की बात कही जा रही है, जिससे खाद्य गुणवत्ता की विश्वसनीयता पर गहरा संकट उत्पन्न हो गया है।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि संबंधित अधिकारी बिलासपुर से रोजाना आना-जाना करते हैं। इतनी लंबी दूरी तय कर तीनों केंद्रों पर समय पर पहुंचना और पूरे दिन की प्रक्रिया पूरी करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं माना जा रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वास्तव में निरीक्षण हो रहा है या केवल दस्तावेजों में ही पूरा काम दर्शाया जा रहा है।
कर्मचारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि संबंधित अधिकारी का रवैया अधीनस्थ कर्मचारियों के प्रति कठोर और अपमानजनक है, जिसके चलते एक कर्मचारी ने मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर इस्तीफा तक दे दिया। वहीं, उनके निजी ड्राइवर ने भी घरेलू कार्यों के दबाव के चलते नौकरी छोड़ दी।
ट्रांसफर और पदस्थापना को लेकर भी अंदरूनी खींचतान की बात सामने आई है। पूर्व प्रभारी जितेंद्र लहरे के स्थानांतरण को लेकर यह आरोप लगाया जा रहा है कि उन्हें जानबूझकर प्रताड़ित कर दूसरे जिले भेजा गया। उनके स्थान पर तत्काल एक करीबी व्यक्ति को प्रभार सौंप दिया गया, जिससे पूरे मामले में ‘सिंडिकेट’ जैसी स्थिति की चर्चा तेज हो गई है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि बिना मौके पर जांच किए चावल की गुणवत्ता को स्वीकृति दी जा रही है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका सीधा असर सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर पड़ेगा और आम जनता को निम्न गुणवत्ता का चावल मिल सकता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन और संबंधित उच्च अधिकारी इस पूरे मामले से अनभिज्ञ हैं या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है।
जिले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो, ताकि व्यवस्था में जनता का विश्वास बना रहे।

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