पश्चिम बंगाल: परिवर्तन के साथ पुनर्जागरण
श्री राजनाथ सिंह लेखक भारत सरकार में रक्षा मंत्री हैं।
“हे नूतन, देखा दिक आर-बार, जन्मेरो प्रथम शुभोखोन” (हे नवीन, एक बार फिर से सामने आओ, ठीक उसी तरह जैसे जन्म के समय वह पहला शुभ क्षण आया था।)
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की यह पंक्तियाँ केवल एक कविता का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि समय-समय पर स्वतः स्फूर्त और नवीन होने वाली बंगाल की आत्मा का आह्वान भी हैं। गुरुदेव भली-भाँति समझते थे कि बंगाल समय के साथ केवल बदलता नहीं है, बल्कि वह बार-बार बेहतर और नए रूप में पल्लवित होता है। गुरुदेव की जयंती पर गायी जाने वाली यह कविता नवजागरण और नवचेतना की प्रतीक है। यह प्रार्थना पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर, नए, उज्ज्वल और रचनात्मक विचारों के स्वागत का आह्वान भी है।
यह एक सुखद संयोग है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती से कुछ दिन पहले ही, पश्चिम बंगाल कई दशकों के बाद नवजागरण का साक्षी बना है। 4 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को ऐतिहासिक विजय प्राप्त हुई है। लेकिन भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह चुनाव कभी सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं था। यह चुनाव इस महान भूमि के खोए हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने का एक अवसर था—एक ऐसा सभ्यतागत आह्वान, जो चुनावी समीकरणों और गणनाओं से कहीं ऊपर है।
आज जब पश्चिम बंगाल की चेतना और गौरव का अरुणोदय हो रहा है, तो हमें इस बात को समझने की आवश्यकता है कि बंगाल क्या है और बंगाल की चेतना का पुनर्जागरण किसे कहा जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है बंगाल की शताब्दियों पुरानी चेतना को समझना और जानना।
बंगाल सामाजिक चेतना का केंद्र होने से पहले ज्ञान और आध्यात्मिकता की पवित्र भूमि थी। 15वीं शताब्दी में नबद्वीप के गंगा तट पर एक युवा संन्यासी निमाई ने अपने कीर्तन के माध्यम से समाज को नई दिशा दी। उस युवा सन्यासी को आज हम आदि संत चैतन्य महाप्रभु के नाम से जानते हैं। चैतन्य महाप्रभु के द्वारा दिखाया गया भक्ति मार्ग आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के साथ-साथ सामाजिक समरसता का अभियान भी था। चैतन्य महाप्रभु ने जात-पात और ऊंच-नीच के बंधनों को तोड़ा। उनके द्वारा प्रवाहित वैष्णव परंपरा ने समाज में करुणा, समावेशिता, समता और सद्भावना को बल दिया।
यही चेतना बाउल परंपरा में भी दिखाई दी। बाउल परंपरा के फकीरों की पहचान जाति, धर्म या कोई ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता की भावना थी। बाउल परंपरा के सबसे महान प्रवर्तक लालन फकीर थे। वे किस संप्रदाय से थे, यह प्रश्न कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। उन्होंने हिंदु समाज में प्रचलित जाति व्यवस्था का भी विरोध किया तथा मुस्लिम समाज में होने वाले भेदभाव के खिलाफ भी आवाज उठायी। वे बंगाल की उस सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक थे, जिसमें सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का भाव समाहित था।
विगत तीन शताब्दियों में, बंगाल और बंगाल के लोगों ने केवल भारत के सामाजिक नवजागरण आंदोलन में भाग ही नहीं लिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। जब समाज अपनी जड़ता, कुरीतियों और विकृत परंपराओं के बोझ तले दब चुका था, तब राजा राममोहन राय ने न तो परंपरा का समूल रूप से परित्याग किया और न ही तर्कशून्य तरीके से उसको उचित ठहराया। उन्होंने लोगों को आत्मबोध कराकर, समाज को भीतर से सुधारने का मार्ग चुना। उनका संदेश स्पष्ट था — समाज का पुनर्जन्म बाहर से नहीं, भीतर की चेतना से होता है। सती प्रथा जैसी अमानवीय कुरीति के विरुद्ध उनका संघर्ष केवल समाज सुधार से जुड़ा आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय आत्मा को पुनर्जीवित करने का एक तप था। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि मुक्ति का मंत्र बना दिया। उन्होंने शिक्षा को नारी शक्ति के उत्थान, सशक्तिकरण और मुक्ति का साधन बना दिया।
बंगाल के ही बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदे मातरम्” जैसा अमर मंत्र राष्ट्र को दिया। वंदे मातरम् वह गीत था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ने में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को बल दिया और सदियों से सोये हुए देश को जगा दिया। यह गीत आज भी भारत की अंतर-आत्मा का स्वर है। बंगाल ने ही भारत की सबसे पहली महिला चिकित्सक डॉ. कादम्बिनी गांगुली जी को जन्म दिया, जिन्होंने सभी को, विशेषकर महिलाओं को, प्रेरित किया। बंगाल की ही धरती पर जन्मे, प्रखर राष्ट्रवादी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
संभवतः बंगाल की धरती ने जितनी भी विलक्षण प्रतिभाओं और महान लोगों को जन्म दिया, उनमें सबसे देदीप्यमान और प्रबुद्ध स्वामी विवेकानंद को कहा जा सकता है। शिकागो में दिया गया उनका भाषण इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उन्होंने पूरे विश्व को वेदान्त और भारत के महान सभ्यतागत मूल्यों से परिचित कराया।
यह सब बातें बंगाल की आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। यही उसकी सनातन और शाश्वत पहचान रही है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल को इसी दृष्टि से देखते हैं। यह अतीत में लौटने की आकांक्षा नहीं है, न ही यह आधुनिकता की चाह में परायी सभ्यता की प्रतिछाया बनने की लालसा है। यह वह दृष्टि है जो बंगाल को पुनः जागृत करना चाहती है ताकि वह अपने पूर्ण सामर्थ्य के बल पर फिर से अपने सर्वोच्च वैभव को प्राप्त कर सके।
दुर्भाग्यवश, लंबे समय तक बंगाल के कुछ बुद्धिजीवियों और राजनीतिक वर्गों ने अपनी ही सांस्कृतिक विरासत को बोझ समझा और उसे हेय दृष्टि से देखा। सभ्यता, धर्म, संस्कृति और बंगाल की चेतना की बात करने वाले लोगों और उनकी आवाज को दबाया गया। परंपरा को पिछड़ापन समझा गया और आधुनिकता के नाम पर औपनिवेशिक मानसिकता को बढ़ावा दिया गया। परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल ने दशकों तक विकासहीनता, अराजकता, संस्थागत पतन और वैचारिक जड़ता का दंश झेला।
बंगाल में हुआ यह चुनाव और परिवर्तन सिर्फ राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं हैं। बल्कि यह ऐसे लोगों के खिलाफ जनादेश भी है जिन्होंने बंगाल को उसके मूल से दूर किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव सत्ता की लड़ाई नहीं थी, बल्कि पश्चिम बंगाल के गौरव और विरासत को पुनर्स्थापित करने का यज्ञ था।
बेलूर मठ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आत्मिक जुड़ाव, स्वामी विवेकानंद के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और सुशासन को ‘सेवा’ के रूप में देखने का उनका दृष्टिकोण — ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि ‘प्रधान सेवक’ बंगाल के विकास और पुनर्जागरण को एक पावन दायित्व मानते हैं, जिसे वे अपने ‘प्रधान धर्म’ और ‘प्रधान कर्म’ के रूप में निभा रहे हैं।
इसलिए बंगाल के विकास और पुनर्निर्माण का अर्थ कई दशकों से उपेक्षित और जीर्ण-शीर्ण हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण तो है ही, साथ ही इसका अर्थ उन घाटों को पुनर्जीवित करना भी है जहाँ चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन ने लोगों को भाव-विभोर किया था। इसका अर्थ उन शैक्षणिक संस्थानों को सशक्त करना भी है जिनका स्वप्न ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने देखा था। इसका अर्थ उन आदिवासी भाइयों-बहनों को गरिमा, सम्मान और अवसर देना भी है जो सदियों से बंगाल में रहते आए हैं। इसका अर्थ लंबे समय से उपेक्षा झेल रहे पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना भी है।
पिछले कुछ दशकों में भय और कुशासन के कारण ऐसा प्रतीत होने लगा था मानो पश्चिम बंगाल का स्वर्णिम युग बीत चुका हो। किंतु आज बंगाल एक बार फिर नए आत्मविश्वास और नई ऊर्जा के साथ समृद्धि एवं शांति से भरे नए युग में प्रवेश कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और मार्गदर्शन के साथ बनने वाली पहली भाजपा सरकार गुरुदेव के द्वारा वर्णित ‘नूतन’ भावना के साथ सेवा का संकल्प लेकर आगे बढ़ेगी और बंगाल की प्रतिष्ठा और समृद्धि के साथ बंगाल का सांस्कृतिक गौरव बढ़ाने के लिए कार्य करेगी।

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