विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का खेल? 51 लाख के फुटपाथ निर्माण में भारी अनियमितता
दाऊपारा चौक से कलेक्टर निवास तक धंस रहे पेवर ब्लॉक, घटिया सामग्री के उपयोग पर ‘श्री ग्रुप’ पर ब्लैकलिस्ट की तलवार
मुंगेली। शहर के सबसे महत्वपूर्ण और वीआईपी मार्गों में शामिल दाऊपारा चौक से कलेक्टर निवास तक बन रहे फुटपाथ निर्माण कार्य ने नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगभग 51 लाख रुपये की लागत से तैयार किए जा रहे इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट में शुरुआती दौर से ही भारी अनियमितताएं सामने आने लगी हैं। निर्माण गुणवत्ता, तकनीकी मानकों की अनदेखी और घटिया सामग्री के इस्तेमाल के आरोपों ने पूरे मामले को विवादों के केंद्र में ला दिया है।
नगर पालिका परिषद मुंगेली द्वारा इस परियोजना को शहर की सुंदरता बढ़ाने, पैदल यात्रियों को सुरक्षित आवागमन उपलब्ध कराने और यातायात व्यवस्था बेहतर बनाने के उद्देश्य से स्वीकृति दी गई थी। लेकिन जिस निर्माण को आदर्श मॉडल बनना था, वही अब भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि विकास कार्यों के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग किया जा रहा है और जिम्मेदार लोग मौन साधे हुए हैं।

वीआईपी रोड पर बना सवालों का फुटपाथ
दाऊपारा चौक से कलेक्टर निवास तक का मार्ग प्रशासनिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। इसी मार्ग से वरिष्ठ अधिकारी, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अमला नियमित रूप से गुजरता है। ऐसे मार्ग पर गुणवत्ता से समझौता होना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
नगर पालिका ने बिलासपुर स्थित निर्माण एजेंसी मेसर्स श्री ग्रुप को यह कार्य सौंपा। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 27 अप्रैल 2026 को अनुबंध निष्पादित हुआ और 30 अप्रैल 2026 को कार्यादेश जारी किया गया। अनुबंध की शर्तों के अनुसार एजेंसी को चार माह के भीतर तकनीकी मानकों के अनुरूप पूरा निर्माण कार्य समाप्त करना था।
लेकिन कार्य प्रारंभ होने के कुछ ही सप्ताह बाद निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे।
शुरुआत से ही दिखने लगी थीं गड़बड़ियां
सूत्रों के अनुसार इंजीनियरिंग शाखा को शुरुआती चरण में ही बेस निर्माण, सामग्री की गुणवत्ता और तकनीकी प्रक्रिया में गंभीर कमियां दिखाई देने लगी थीं। संबंधित एजेंसी को मौखिक चेतावनी भी दी गई थी।
इसके बाद 27 मई 2026 को नगर पालिका द्वारा लिखित निर्देश जारी कर निर्माण कार्य में तत्काल सुधार करने को कहा गया। बावजूद इसके स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। आरोप है कि एजेंसी ने चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया और निर्माण कार्य उसी ढर्रे पर जारी रखा।
यहीं से यह संदेह गहराने लगा कि या तो निगरानी बेहद कमजोर रही, या फिर कहीं न कहीं संरक्षण का खेल चल रहा था।
निरीक्षण में खुली निर्माण की परतें
हाल ही में मुख्य नगर पालिका अधिकारी द्वारा किए गए निरीक्षण में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
- धंस रहे पेवर ब्लॉक
फुटपाथ निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बेस कोर्स की होती है। यही परत पूरी संरचना को मजबूती देती है। निरीक्षण में पाया गया कि कई स्थानों पर बेस लेयर की पर्याप्त रोलिंग और कंपैक्शन नहीं की गई।
इसके बावजूद जल्दबाजी में ऊपर पेवर ब्लॉक बिछा दिए गए। परिणामस्वरूप सामान्य दबाव और शुरुआती बारिश के बाद ही ब्लॉक धंसने लगे।
तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार यदि बेस लेयर मजबूत न हो तो पूरा फुटपाथ कुछ ही महीनों में खराब हो सकता है।
- घटिया एवं मिट्टीयुक्त रेत का उपयोग
शिकायतों में यह बात भी सामने आई कि निर्माण स्थल पर मानक रेत के बजाय मिट्टीयुक्त एवं सिल्टी रेत का उपयोग किया जा रहा था।
तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी रेत में मिट्टी की मात्रा अधिक होने से सीमेंट का बंधन कमजोर पड़ता है, जिससे संरचना की मजबूती घट जाती है और निर्माण जल्दी क्षतिग्रस्त हो जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि लागत बचाने के नाम पर गुणवत्ता से समझौता किया गया।
- लॉकिंग एवं PCC कार्य में लापरवाही
पेवर ब्लॉक की मजबूती केवल ब्लॉक बिछाने तक सीमित नहीं होती। उसकी साइड लॉकिंग और PCC (प्लेन सीमेंट कंक्रीट) परत भी समान रूप से महत्वपूर्ण होती है।
निरीक्षण में पाया गया कि कई स्थानों पर किनारों की लॉकिंग कमजोर है। इससे भविष्य में ब्लॉक खिसकने या उखड़ने की आशंका बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकेत देता है कि निर्माण केवल “ऊपरी दिखावे” के लिए किया गया, संरचनात्मक मजबूती को प्राथमिकता नहीं दी गई।
तकनीकी प्राक्कलन में करोड़ों जैसा खर्च, जमीन पर कमजोर निर्माण
इस परियोजना के स्वीकृत डिटेल एस्टिमेट ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। निर्माण मदों पर स्वीकृत राशि इस प्रकार बताई जा रही है—
भूमि समतलीकरण एवं सफाई — ₹31,341
खुदाई कार्य — ₹1.61 लाख
प्लिंथ फिलिंग — ₹1.61 लाख
PCC कार्य — ₹12.92 लाख
RCC कार्य — ₹6.81 लाख
स्टील सुदृढ़ीकरण — ₹5.35 लाख
सिर्फ PCC कार्य पर लगभग 12.92 लाख रुपये खर्च का प्रावधान है। ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि जब बेस मजबूती के लिए इतनी राशि स्वीकृत हुई, तो निर्माण की हालत इतनी खराब कैसे हो गई?
जनता का सीधा सवाल है—
यदि मानक सामग्री लगी, तो फुटपाथ धंसा क्यों?
और यदि सामग्री घटिया थी, तो भुगतान किस आधार पर हुआ?
सीएमओ का कड़ा रुख, नोटिस जारी
लगातार शिकायतों और निरीक्षण रिपोर्ट के बाद मुख्य नगर पालिका अधिकारी ने निर्माण एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सख्त निर्देश दिए हैं।
निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है—
धंसे हुए पेवर ब्लॉक तत्काल हटाए जाएं
पूरी बेस लेयर पुनः मानक अनुसार तैयार की जाए
घटिया रेत हटाई जाए
केवल स्वीकृत गुणवत्ता वाली सामग्री उपयोग हो
तीन दिन में फोटो सहित सुधार रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए
सूत्रों के अनुसार सीएमओ ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि निर्देशों का पालन नहीं हुआ तो रनिंग बिल और फाइनल बिल दोनों रोक दिए जाएंगे।
‘श्री ग्रुप’ पर ब्लैकलिस्ट की तलवार
नगर पालिका प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि यदि निर्माण गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तो अनुबंध की शर्तों के अनुसार मेसर्स श्री ग्रुप को ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है।
किसी भी निर्माण एजेंसी के लिए ब्लैकलिस्ट होना गंभीर कार्रवाई मानी जाती है, क्योंकि इसके बाद सरकारी टेंडरों में भाग लेना लगभग असंभव हो जाता है।
स्थानीय ठेकेदारों का कहना है कि यदि यह कार्रवाई निष्पक्ष तरीके से हुई तो यह निर्माण कार्यों में जवाबदेही तय करने की बड़ी मिसाल बन सकती है।
क्या केवल ठेकेदार दोषी?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिम्मेदारी केवल ठेकेदार की है या तकनीकी अमले की भी।
विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में साइट इंजीनियर, उप अभियंता और निरीक्षण अधिकारियों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
यदि लंबे समय तक निर्माण में खामियां बनी रहीं, तो यह सवाल स्वाभाविक है—
क्या निगरानी में लापरवाही हुई?
क्या समय रहते कार्रवाई नहीं की गई?
या फिर कहीं प्रशासनिक मिलीभगत थी?
इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएंगे।
उच्च स्तरीय जांच की तैयारी
सूत्र बताते हैं कि नोटिस की प्रतिलिपि कलेक्टर, संयुक्त संचालक नगरीय प्रशासन बिलासपुर, अधीक्षण अभियंता सहित अन्य अधिकारियों को भेजी गई है।
संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही उच्च स्तरीय तकनीकी जांच समिति गठित की जा सकती है। यदि अनियमितता सिद्ध होती है तो कार्रवाई केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं रहेगी; संबंधित इंजीनियरों पर भी गाज गिर सकती है।
जनता पूछ रही— 51 लाख आखिर गए कहां?
मुंगेली की जनता अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर बनाए हुए है। लोगों का कहना है कि यदि 51 लाख रुपये के बड़े प्रोजेक्ट में भी गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं हो सकती, तो छोटे विकास कार्यों की स्थिति समझना मुश्किल नहीं।
यह मामला अब केवल फुटपाथ निर्माण तक सीमित नहीं रहा। यह सरकारी धन की जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की बड़ी परीक्षा बन चुका है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या नगर पालिका अपने नोटिस पर गंभीरता से कार्रवाई करती है या मामला कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है।
एक बात स्पष्ट है— यदि निष्पक्ष जांच हुई तो यह मामला केवल एक ठेकेदार की कहानी नहीं रहेगा, बल्कि नगर निकायों में विकास कार्यों के नाम पर चल रहे बड़े खेल की कई परतें खोल सकता है।

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