छत्तीसगढ़ की लोककला का युग हुआ समाप्त, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन पंडवानी को विश्व पटल पर दिलाई पहचान, कला जगत में शोक की लहर

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रिपोर्टर ✒️ बसंत कुमार

रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की अमर स्वर साधिका, प्रख्यात पंडवानी गायिका और डॉ. तीजन बाई का रविवार, 5 जुलाई 2026 को लंबी बीमारी के बाद रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला, संस्कृति और संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थीं और उपचाराधीन थीं।

डॉ. तीजन बाई ने अपनी बुलंद आवाज, सशक्त अभिनय और अनूठी कपालिक शैली के माध्यम से महाभारत की कथाओं को जीवंत कर पंडवानी लोककला को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाई। उस दौर में जब महिलाएं मुख्यतः वेदमती शैली में बैठकर पंडवानी गाती थीं, उन्होंने परंपराओं को चुनौती देते हुए खड़े होकर कपालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली पहली महिला कलाकार के रूप में इतिहास रचा।

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उनका जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं में गहरी रुचि थी। अपने नाना से प्रेरणा लेकर उन्होंने पंडवानी की साधना शुरू की और किशोरावस्था से ही मंच पर अपनी अलग पहचान बना ली। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोककला को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया और भारत की सांस्कृतिक विरासत का गौरव बढ़ाया।

लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें देश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। इनमें पद्म श्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1992), पद्म भूषण (2003), छत्तीसगढ़ रत्न (2018), पद्म विभूषण (2019) तथा कबीर सम्मान (2022) प्रमुख हैं। इन सम्मानों ने भारतीय लोक परंपरा को समृद्ध करने में उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई।

उनके निधन पर देश के शीर्ष नेताओं और अनेक सांस्कृतिक हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया। नरेंद्र मोदी ने कहा कि डॉ. तीजन बाई ने अपनी विलक्षण कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाई और उनका निधन कला एवं संस्कृति जगत की अपूरणीय क्षति है। वहीं विष्णु देव साय ने उन्हें छत्तीसगढ़ का गौरव बताते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

डॉ. तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय लोक परंपरा की जीवंत पहचान थीं। उनकी आवाज, उनकी प्रस्तुति और महाभारत के पात्रों को मंच पर सजीव कर देने की उनकी कला हमेशा याद की जाएगी। उनके जाने से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है।

छत्तीसगढ़ सहित पूरा देश इस महान लोक कलाकार को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। उनकी कला, सादगी और लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। **ॐ शांति।**

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