शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल: मुंगेली के ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी

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आरटीई मानकों की अनदेखी, एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे विद्यालय; पढ़ाई के साथ प्रशासनिक कार्यों का भी बढ़ा बोझ

मुंगेली। जिले के ग्रामीण एवं वनांचल क्षेत्रों में संचालित शासकीय प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत निर्धारित शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात का पालन नहीं होने से कई स्कूलों में शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। कहीं एक ही शिक्षक पूरे विद्यालय का संचालन कर रहा है, तो कहीं प्रधानपाठक के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई, सीखने की गुणवत्ता और विद्यालयों की नियमित गतिविधियों पर पड़ रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रही स्थिति यह संकेत देती है कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के एक माह बाद भी कई विद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर नहीं हो सकी है। इसके साथ ही बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने समस्या को और गंभीर बना दिया है।

आरटीई के मानकों का नहीं हो रहा पालन

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है। नियमों के तहत 30 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक, 60 विद्यार्थियों पर दो, 90 विद्यार्थियों पर तीन, 120 विद्यार्थियों पर चार तथा 150 से 200 विद्यार्थियों पर पांच शिक्षकों की व्यवस्था होनी चाहिए।

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लेकिन जिले के कई ग्रामीण विद्यालयों में इन मानकों का पालन नहीं हो रहा है। कई स्कूलों में 30 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, फिर भी केवल एक शिक्षक पदस्थ है। ऐसे में एक ही शिक्षक को पहली से पांचवीं तक की अलग-अलग कक्षाओं का संचालन करना पड़ रहा है, जिससे प्रत्येक कक्षा को पर्याप्त समय देना संभव नहीं हो पाता।

एक शिक्षक पर पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी

एकल शिक्षकीय विद्यालयों में पदस्थ शिक्षकों को केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि विद्यालय संचालन से जुड़े सभी प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते हैं। इनमें विद्यार्थियों की उपस्थिति दर्ज करना, विभिन्न रजिस्टरों का संधारण, मध्यान्ह भोजन योजना की निगरानी, विभागीय पत्राचार, ऑनलाइन जानकारी अपलोड करना तथा अन्य शासकीय कार्य शामिल हैं।

ऐसी स्थिति में शिक्षक का अधिकांश समय प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यतीत हो जाता है, जिससे बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होती है।

अन्य सरकारी ड्यूटी से और बढ़ रही समस्या

ग्रामीण शिक्षकों का कहना है कि उन्हें समय-समय पर बीएलओ (मतदाता सूची पुनरीक्षण), पल्स पोलियो अभियान, जनगणना, सामाजिक एवं आर्थिक सर्वेक्षण सहित विभिन्न शासकीय कार्यों में भी लगाया जाता है।

यदि विद्यालय में केवल एक शिक्षक पदस्थ हो और उसे इन कार्यों में भेज दिया जाए तो उस दौरान विद्यालय में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक उपलब्ध नहीं रहता। इससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो जाती है।

मानपुर (चुचरूंगपुर) विद्यालय बना उदाहरण

संकुल तरवरपुर अंतर्गत संचालित शासकीय प्राथमिक शाला मानपुर (चुचरूंगपुर) जिले की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है।

सत्र 2026-27 में विद्यालय में 30 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, लेकिन पूरे विद्यालय के संचालन की जिम्मेदारी केवल एक शिक्षक पर है।

विद्यालय में पदस्थ प्रधानपाठक देवी लाल साहू का 30 मार्च 2026 को स्थानांतरण हो गया था। इसके बाद से प्रधानपाठक का पद रिक्त है। वर्तमान में पदस्थ एकमात्र शिक्षक ही अध्यापन के साथ-साथ मध्यान्ह भोजन, कार्यालयीन अभिलेख, विभागीय पत्राचार तथा अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव

शिक्षकों की कमी के साथ-साथ विद्यालय में आधारभूत सुविधाओं का अभाव भी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।

स्थानीय लोगों के अनुसार विद्यालय में—

  • शौचालय की समुचित व्यवस्था नहीं है।
  • बाउंड्रीवाल का अभाव है।
  • किचन शेड पर्याप्त नहीं है।
  • बच्चों के बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं है।
  • आवश्यक शैक्षणिक संसाधनों की भी कमी बनी हुई है।

इन कमियों का असर विद्यार्थियों की सुरक्षा, स्वच्छता और शिक्षण वातावरण पर पड़ रहा है।

नए सत्र के बाद भी नहीं बदली तस्वीर

16 जून से प्रदेशभर में नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हो चुका है, लेकिन मुंगेली जिले के कई ग्रामीण एवं वनांचल क्षेत्रों के प्राथमिक तथा पूर्व माध्यमिक विद्यालय अब भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं।

कहीं शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो कहीं प्रधानपाठक नहीं हैं। कई विद्यालयों में भवन, फर्नीचर, खेल सामग्री, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं की कमी बनी हुई है।

ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पर्याप्त शिक्षक और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।

निरीक्षण व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल

स्थानीय नागरिकों और पालकों का कहना है कि समस्याग्रस्त विद्यालयों का नियमित निरीक्षण नहीं हो रहा है। जिन स्कूलों में लंबे समय से शिक्षक और आधारभूत सुविधाओं की कमी बनी हुई है, वहां समाधान की दिशा में अपेक्षित गति दिखाई नहीं दे रही है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि शिक्षा विभाग ऐसे विद्यालयों का विशेष सर्वे कर शीघ्र शिक्षकों की पदस्थापना सुनिश्चित करे।

क्या कहता है शिक्षा विभाग?

विकासखंड शिक्षा अधिकारी विमित्रा धृतलहरे ने बताया कि मानपुर क्षेत्र के विद्यालय में मूलभूत सुविधाओं एवं अधोसंरचना से संबंधित आवश्यक जानकारी तैयार कर जिला स्तर पर भेज दी गई है। विद्यालय की आवश्यकताओं के निराकरण के लिए उच्च कार्यालय को प्रस्ताव भी प्रेषित किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि एकल शिक्षकीय विद्यालयों तथा शिक्षकों के रिक्त पदों की पूरी जानकारी शासन को भेजी जा चुकी है। शासन स्तर से पदस्थापना के आदेश प्राप्त होते ही संबंधित विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी।

ग्रामीणों की मांग

अभिभावकों और ग्रामीणों ने मांग की है कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप सभी विद्यालयों में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। साथ ही शौचालय, बाउंड्रीवाल, किचन शेड, फर्नीचर, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराकर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जाए।

शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर ही बच्चों को पर्याप्त शिक्षक और बेहतर शैक्षणिक वातावरण नहीं मिलेगा तो इसका असर उनके भविष्य पर पड़ेगा। ऐसे में जिले के एकल शिक्षकीय विद्यालयों की समस्या का शीघ्र समाधान किया जाना समय की आवश्यकता है।

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