अजोला से संवरी आजीविका धमतरी की बिहान दीदियों ने प्राकृतिक खेती और आत्मनिर्भरता का रचा नया इतिहास

0
IMG-20260727-WA0911

तालाबों में उगने वाली साधारण जलीय वनस्पति बनी आय और सशक्तिकरण का जरिया

अमाली पंचायत की महिलाओं ने पेश की प्रेरक मिसाल

NTPC World Environment Day

रायपुर तालाबों और जलाशयों के शांत पानी पर तैरने वाली हरी-भरी अजोला (Azolla) को अमूमन लोग एक साधारण जलीय घास समझकर अनदेखा कर देते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले (नगरी विकासखंड) की ग्राम पंचायत अमाली की आदिवासी बिहान स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने इसी अजोला को अपनी आजीविका, आर्थिक स्वावलंबन और प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार बना दिया है। वैज्ञानिक सोच, उचित प्रशिक्षण और अटूट सामूहिक प्रयास के बल पर इन महिलाओं द्वारा शुरू की गई यह पहल आज पूरे राज्य के लिए एक अनुकरणीय और प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रही है।


प्रशिक्षण से मिली नवाचार की राह ​अमाली पंचायत की कृषि सखी और 'बिहान' समूह की सक्रिय सदस्य श्रीमती अनिता बाई मरकाम बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें अजोला के व्यावसायिक और कृषि उपयोग की जानकारी नहीं थी।पशुपालन विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उन्हें अजोला का बीज (कल्चर) प्राप्त हुआ। ​अनुकूल मार्गदर्शन और वैज्ञानिक विधि अपनाते हुए उन्होंने अपने घर के छोटे-छोटे टैंकों में अजोला का उत्पादन शुरू किया। नियमित देखभाल और स्वच्छता के बल पर वे अब तक 25 किलोग्राम से अधिक अजोला का सफल उत्पादन कर चुकी हैं और अब बड़े पैमाने पर इसका विस्तार करने की दिशा में अग्रसर हैं।

खेती में वरदान: रासायनिक उर्वरकों का बेहतर विकल्प ​ समूह द्वारा उत्पादित अजोला का मुख्य उपयोग धान की फसल में जैविक पूरक के रूप में किया जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अजोला के प्रयोग से ​मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होता है।खेत में नाइट्रोजन की मात्रा प्राकृतिक रूप से बढ़ती है। यह मिट्टी में नमी बनाए रखने में मददगार है। रासायनिक खाद और उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता काफी कम हुई है, जिससे खेती की लागत घट रही है।


पशुपालन और कुक्कुट पालन के लिए सुपरफूड ​अजोला का उपयोग केवल फसलों तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीणों के लिए कम लागत वाला पोषक पूरक आहार (Nutritional Feed) सिद्ध हो रहा है। ​दुधारू पशुओं के दूध के उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार। मत्स्य पालन के लिए मछलियों की त्वरित वृद्धि में सहायक है। इसी तरह मुर्गियों के बेहतर स्वास्थ्य और वजन बढ़ाने के लिए अनुकूल है।

सामूहिक प्रयास और महिला सशक्तिकरण

​ श्रीमती अनिता बाई मरकाम कहती है कि जो अजोला पहले केवल एक नई जानकारी थी, वह आज हमारे परिवार, समूह की बहनों और क्षेत्र के किसानों के लिए समृद्धि का आधार बन चुकी है। ​स्थानीय सहयोगी चेतन कुमार नेताम और तुषार यादव के निरंतर सहयोग से बिहान समूह की दीदियों में प्राकृतिक खेती को लेकर एक नया आत्मविश्वास जागा है। भविष्य में यह समूह अजोला के साथ-साथ वर्मी कम्पोस्ट, जैविक खाद और अन्य मूल्यवर्धित (Value-added) उत्पाद तैयार करने की योजना बना रहा है।
​अमाली की आदिवासी महिलाओं का यह नवाचार साबित करता है कि यदि स्थानीय संसाधनों का उपयोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प संभव है। पर्यावरण संरक्षण, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, किसानों की लागत में कमी और आत्मनिर्भरता जैसे बहुआयामी उद्देश्यों को पूरा करती यह पहल ‘सशक्त महिला, समृद्ध गांव’ का वास्तविक संदेश दे रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Advertisement Carousel

Latest News

error: Content is protected !!