अबूझमाड़ की वादियों में मछली पालन की क्रांति

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नाव-जाल योजना ने संवारी सोमारू राम की जिंदगी

रायपुर । छत्तीसगढ़ के पूर्व के नक्सल प्रभावित और दूरस्थ अंचल अबूझमाड़ के आदिवासी जीवन में अब पारंपरिक तौर-तरीकों के साथ मछली पालन जैसी आजीविका की नई पहल देखने को मिल रही है। यह बदलाव स्थानीय आदिवासियों के सामूहिक सहयोग और आर्थिक उत्थान की एक नई कहानी लिख रहा है।

आर्थिक समृद्धि का नया द्वार खुला मछली पालन से ​छत्तीसगढ़ के सुदूर एवं दुर्गम क्षेत्र अबूझमाड़ की फिज़ाओं में अब आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की नई बयार बह रही है। नारायणपुर जिले के विकासखंड ओरछा स्थित ग्राम ओरछा के किसान सोमारू राम उसेंडी पिता स्व. श्री गिलू राम ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर मेहनत को सही मार्गदर्शन और शासकीय योजनाओं का साथ मिल जाए, तो दुर्गम अंचलों में भी आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खुल सकते हैं।

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मत्स्य बीज पर विभाग की ओर से 50 प्रतिशत का अनुदान प्राप्त ​मत्स्य पालन से लंबे समय से जुड़े सोमारू राम की किस्मत वर्ष 2023-24 में तब बदली, जब उन्हें छत्तीसगढ़ शासन के मत्स्य पालन विभाग द्वारा संचालित नाव-जाल योजना और मत्स्य पालन प्रसार योजना का लाभ मिला। विभागीय मार्गदर्शन में सोमारू ने अपनी भूमि पर 0.500 हेक्टेयर का तालाब विकसित किया। मत्स्य बीज पर विभाग की ओर से 50 प्रतिशत का अनुदान प्राप्त हुआ, जिससे उन्होंने उन्नत किस्म के मत्स्य बीज का संचयन किया। इसी तरह विभाग से प्राप्त आधुनिक जाल की मदद से मछली पकड़ने और उनकी देखभाल का काम अधिक सुलभ और व्यवस्थित हो गया।

उत्पादन और रिकॉर्ड आय ​कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक मार्गदर्शन का नतीजा यह रहा कि उनके तालाब से लगभग 1,000 किलोग्राम (1 टन) मत्स्य उत्पादन का अनुमान लगाया गया। स्थानीय हाट-बाजारों में मछलियों को बेचकर सोमारू ने कुल 1.25 लाख रुपये की सकल आय अर्जित की। सभी लागतों को घटाने के बाद उन्हें करीब 1 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।

आजीविका को मिली नई दिशा ​मछली पालन से मिली इस अतिरिक्त आय ने न केवल सोमारू राम उसेंडी के परिवार को आर्थिक स्थिरता दी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित किए। अनुसूचित जनजाति वर्ग के पात्र मछुआरों के लिए संचालित यह योजना अबूझमाड़ जैसे सुदूर अंचलों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुकी है। सोमारू राम की यह सफलता आज क्षेत्र के अन्य ग्रामीणों और किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

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