भारत के अंतिम छोर पर स्थित स्वास्थ्य एवं कल्याण इकोसिस्टम को मजबूत बनाना : श्री प्रतापराव जाधव
अब जबकि भारत सभी के लिए न्यायसंगत, समावेशी और समग्र स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमें एक मौलिक प्रश्न पूछना होगा: हम अंतिम गांव के अंतिम व्यक्ति तक सही समय पर गुणवत्तापूर्ण देखभाल पहुंचना कैसे सुनिश्चित करें? इसका जवाब केवल बुनियादी ढांचे के विस्तार या उन्नत प्रौद्योगिकियों के उपयोग में ही नहीं, बल्कि उन प्रणालियों को मजबूत करने में भी निहित है जो स्वाभाविक रूप से सुलभ, सस्ती और समुदायों के भरोसे पर खरे उतरते हों। इस संदर्भ में, होम्योपैथी भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ-साथ एक मौन लेकिन शक्तिशाली ताकत के रूप में उभर रही है और जमीनी स्तर पर समग्र स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी ढांचे को बदल रही है। हम यह दिखाई दे रहा है कि होम्योपैथी कैसे जनजातीय क्षेत्रों, ग्रामीण इलाकों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी वाले शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति से जुड़ी महत्वपूर्ण कमियों को दूर कर रही है। इसके प्रभाव का पता केवल व्यापकता से ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक जरूरत वाले स्थानों – यानी अंतिम छोर – तक पहुंचने की क्षमता से भी चल रहा है। अब जबकि हर वर्ष 10 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘विश्व होम्योपैथी दिवस’ करीब है, यह इस बात पर विचार करने का एक सही मौका है कि यह प्रणाली केवल व्यक्तिगत कल्याण ही नहीं बल्कि समग्र कल्याण का एक ऐसा मॉडल बनाने में भी योगदान दे रही है जो किफायती, पर्यावरण के अनुकूल और सामाजिक रूप से समावेशी हो। इस वर्ष विश्व होम्योपैथी दिवस की थीम “सतत स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी” है। 18वीं शताब्दी में सैमुअल हैनिमैन द्वारा विकसित और 19वीं शताब्दी में भारत लाई गई, होम्योपैथी “सिमिलिया सिमिलिबस क्यूरेंचर” यानी “समान से समान का उपचार” के सिद्धांत पर आधारित है। दशकों से एक समग्र और रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए, यह भारत की बहुआयामी स्वास्थ्य एवं कल्याण प्रणाली का एक अभिन्न अंग बन गई है। जमीनी स्तर पर होम्योपैथी की सबसे बड़ी खूबी इसकी निरंतर देखभाल सुनिश्चित करने की क्षमता है। कई पिछड़े इलाकों में स्वास्थ्य सेवा टुकड़ों में बिखरी हुई नहीं होती, बल्कि निरंतर और रिश्तों से सचालित होती है। होम्योपैथी का व्यक्ति-केन्द्रित उपचार का दृष्टिकोण, खासतौर पर पुरानी बीमारियों, बार-बार होने वाले संक्रमणों और जीवनशैली संबंधी विकारों के प्रबंधन के क्रम में चिकित्सक और रोगी के बीच दीर्घकालिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। यह निरंतरता उपचार के प्रति रोगी के समर्पण और समग्र स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों में उल्लेखनीय सुधार करती है। आज भारत में 290 से अधिक होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल हैं। साथ ही, देशभर में चिकित्सकों का एक विशाल नेटवर्क भी उपलब्ध है। फिर भी, होम्योपैथी के असली प्रभावों को संस्थानों में नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर – झारखंड के जनजातीय जिलों, छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में और हिमाचल प्रदेश की दूरदराज की बस्तियों में – बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। वहां एक अकेला चिकित्सक भी सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों में बदलाव ला सकता है। होम्योपैथी की प्रमुख खूबियों में से एक इसकी सरलता भी है। दवाइयां किफायती होती हैं, इन्हें लाना-ले जाना आसान होता है और इनके भंडारण के लिए किसी जटिल भंडारण संरचना की जरूरत ही नहीं होती है। कमजोर आपूर्ति श्रृंखलाओं और सीमित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों वाले इलाकों में, होम्योपैथी की ये विशेषताएं अनमोल हो जाती हैं। जनजातीय समुदायों, जो हमारी आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अक्सर बीमारियों का बेमेल बोझ झेलते हैं, के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सांस्कृतिक रूप से भी अनुकूल होना चाहिए। होम्योपैथी का सौम्य और गैर-आक्रामक रवैया पारंपरिक उपचार पद्धतियों के अनुरूप है, जिससे यह अपेक्षाकृत अधिक स्वीकार्य और सुलभ हो जाता है।
इसी क्षमता को पहचानते हुए, भारत सरकार ने होम्योपैथी को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं साथ जोड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत, 12,500 से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (आयुष) स्थापित किए गए हैं, जो सामुदायिक स्तर पर होम्योपैथी सहित व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि होम्योपैथी भारत में गैर-संक्रामक रोगों से निपटने में भी योगदान दे रही है। केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) ने मधुमेह, हृदय रोग और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से निपटने से संबंधित राष्ट्रीय कार्यक्रमों में होम्योपैथी को जोड़ा है। यह प्राथमिक देखभाल से परे इसकी प्रासंगिकता को दर्शाता है।
आपूर्ति के नए-नए मॉडल भी उतने ही उत्साहजनक हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के अंतर्गत सेवाओं के एक ही स्थान पर उपलब्ध होने की सुविधा ने पहुंच और विश्वास दोनों को बेहतर बनाया है। चलंत चिकित्सा इकाइयां जहां दूरदराज के इलाकों तक पहुंच रही हैं, वहीं सामुदायिक सहायता से जुड़ी पहलों और महामारी से निपटने से संबंधित कार्यक्रमों ने विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य परिदृश्यों में होम्योपैथी की अनुकूलता को प्रदर्शित किया है।
शायद सबसे कारगर मॉडल बुनियादी होम्योपैथी में प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का है। सही ज्ञान और रेफरल सिस्टम के सहयोग से, ये कार्यकर्ता न्यूनतम लागत पर स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार कर सकते हैं। स्वास्थ्य रक्षा जैसे कार्यक्रम और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीसीआरएच) द्वारा संचालित संपर्क संबंधी पहलों ने पहले ही दिखा दिया है कि समुदाय-आधारित दृष्टिकोण सार्थक नतीजे दे सकते हैं। भविष्य को देखते हुए, सतत स्वास्थ्य एवं कल्याण के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत, पुरानी बीमारियों का बढ़ता बोझ और रोगाणुरोधी प्रतिरोध जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने हेतु ऐसे समाधानों की जरूरत है जो न केवल कारगर हों बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से व्यवहारिक भी हों। होम्योपैथी इस दृष्टिकोण के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाती है। इसके कम लागत वाले उपचार परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर वित्तीय बोझ को कम करते हैं। जबकि इसका न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार स्वास्थ्य और कल्याण संबंधी कार्यप्रणालियों का समर्थन करता है। अब हमारा ध्यान इन प्रयासों को व्यापक स्तर पर कार्यान्वित करने पर होना चाहिए। इन प्रयासों में कम सुविधा वाले क्षेत्रों में प्रशिक्षण को मजबूत करना, दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना, गहन अनुसंधान एवं दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देना और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना शामिल है।
विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भौगोलिक स्थिति या सामाजिक-आर्थिक हैसियत की परवाह किए बिना गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रत्येक नागरिक तक पहुंचेगी। होम्योपैथी, अपने गहरे सामुदायिक जुड़ाव और टिकाऊ दृष्टिकोण के साथ, इस लक्ष्य को हासिल करने का मार्ग प्रशस्त करती है। हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की असली पहचान उसकी अत्याधुनिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि हाशिए पर रहने वाले लोगों की सेवा करने की उसकी क्षमता में निहित है। जब एक सरल और किफायती उपाय किसी दूरदराज के गांव में एक परिवार को राहत पहुंचाता है, तो यह इस सशक्त विचार को पुष्ट करता है – कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं अधिक समावेशी, अधिक मानवीय और वास्तव में सार्वभौमिक होती जा रही हैं।

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