पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि , भक्ति और धर्म साधना का दिव्य अवसर
एक माह तक मांगलिक कार्यों पर रहेगा विराम , भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व
संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय
अमरकंटक – मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली/पवित्र नगरी अमरकंटक जो मध्य प्रदेश के प्रमुख पर्यटन एवं धार्मिक – आध्यात्मिक तीर्थ स्थलो में है । सनातन धर्म में समय-समय पर आने वाले पर्व , व्रत और विशेष मास मानव जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं । इन्हीं पावन अवधियों में एक अत्यंत पुण्यदायी और दिव्य मास है । पुरुषोत्तम मास जिसे अधिक मास अथवा मलमास भी कहा जाता है । यह विशेष मास भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित माना जाता है । धर्मशास्त्रों के अनुसार इस अवधि में विवाह , सगाई , गृह प्रवेश , यज्ञोपवीत , मुंडन संस्कार एवं अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं ।
धर्माचार्यों के अनुसार यह समय सांसारिक भोग-विलास के लिए नहीं बल्कि आत्मचिंतन , प्रभु भक्ति , जप , तप , दान और साधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है । मान्यता है कि इस पवित्र मास में किया गया छोटा-सा पुण्य कर्म भी अक्षय फल प्रदान करता है ।
क्यों आता है अधिक मास
हिंदू पंचांग चंद्र गणना पर आधारित है जबकि सूर्य वर्ष उससे कुछ दिनों अधिक होता है । इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग प्रत्येक तीन वर्ष में एक अतिरिक्त माह जोड़ा जाता है जिसे अधिक मास कहा जाता है । इस मास में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती इसलिए इसे “संक्रांति-विहीन मास” भी कहा जाता है ।
प्रारंभ में लोग इसे “मलमास” कहकर सामान्य कार्यों के लिए अनुपयुक्त मानते थे परंतु भगवान विष्णु की कृपा से यही मास “पुरुषोत्तम मास” के रूप में पूजनीय बन गया ।

कैसे मिला “पुरुषोत्तम” नाम
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब सभी महीनों के अधिष्ठाता देवता निर्धारित हो गए तब यह अतिरिक्त मास स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगा । दुःखी होकर यह मास भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में पहुंचा । तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और कहा कि इसमें की गई भक्ति , दान , जप और तप का फल अनेक गुना बढ़कर प्राप्त होगा तभी से यह मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय माना जाता है ।
भगवान विष्णु की आराधना का श्रेष्ठ समय
पुरुषोत्तम मास में भगवान श्रीहरि विष्णु , श्रीकृष्ण एवं माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना का विधान है । इस अवधि में श्रीमद्भागवत कथा श्रवण , गीता पाठ , विष्णु सहस्रनाम , रामचरितमानस एवं हरिनाम संकीर्तन अत्यंत फलदायी माने गए हैं ।
धर्माचार्यों के अनुसार प्रातःकाल स्नान कर पीले वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु को तुलसी दल , पीले पुष्प एवं पंचामृत अर्पित करने से जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है ।
अमरकंटक निवासी कल्याण सेवा आश्रम के पंडित मुकेश कुमार पाठक ने बताते हुए कहा कि इस मास में निम्न मंत्र का जाप विशेष कल्याणकारी माना गया है —
“ॐ नमो भगवते पुरुषोत्तमाय नमः”
दान-पुण्य का विशेष महत्व
शास्त्रों में पुरुषोत्तम मास को दया , सेवा और दान का माह भी कहा गया है । इस अवधि में अन्नदान , गौसेवा , वस्त्रदान , जलसेवा , सत्संग एवं जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है ।
विशेष रूप से गरीबों , संतों एवं ब्राह्मणों को भोजन कराने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं । कहा गया है कि इस मास में किया गया पुण्य अक्षय बन जाता है और जन्म-जन्मांतर तक शुभ फल प्रदान करता है ।
धर्म पालन का संदेश
शास्त्रों में कहा गया है—
“ॐ ना जातु कामान्न भयान्न लोभात् ।
धर्म त्यजेञ्जीवितस्यापि हेतोः॥”
अर्थात मनुष्य को कभी भी काम , भय अथवा लोभ के कारण अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए , चाहे जीवन पर ही संकट क्यों न आ जाए ।
धर्मविदों के अनुसार पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि और ईश्वर प्राप्ति का पावन अवसर है । यह मास मनुष्य को अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह त्यागकर धर्म, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ।

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