अमरकंटक से प्रारंभ हुआ था 108 दंडवत नर्मदा परिक्रमा
दंडवत महाराज ने मां नर्मदा परिक्रमा 85 दिनों में तय की मात्र साढ़े तीन किलोमीटर ,
कठिन हठयोग साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र
संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय
अमरकंटक – मां नर्मदा की उद्गम स्थली / पवित्र नगरी अमरकंटक इन दिनों एक विलक्षण साधना की साक्षी बन रही है । नर्मदा परिक्रमा के संकल्प के साथ निकले दंडवत महाराज अपनी कठिन तपस्या , अटूट श्रद्धा और हठयोग साधना के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं ।

दंडवत महाराज परिक्रमा के दौरान एक स्थान पर 108 दंडवत प्रणाम करते हैं और प्रत्येक दंडवत के साथ लगभग साढ़े सात फुट आगे बढ़ते हैं । इसके बाद पुनः 108 दंडवत का क्रम प्रारंभ होता है । उनकी यह साधना प्रतिदिन प्रातः 5 बजे से सायं 6 बजे तक निरंतर चलती है ।
यात्रा के दौरान वे पूर्ण मौन व्रत का पालन करते हैं । श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित फलाहार एवं प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं किंतु स्वयं किसी से कुछ नहीं मांगते । उनकी तपस्या अनुशासन , त्याग और पूर्ण समर्पण का अनुपम उदाहरण बन गई है ।
दंडवत महाराज रायसेन जिले के उदयपुरा क्षेत्र के समीप स्थित एक आश्रम से जुड़े हैं तथा वैष्णव संप्रदाय से दीक्षित हैं । उन्होंने 05 मार्च 2026 को अमरकंटक स्थित माई की बगिया से दंडवत नर्मदा परिक्रमा का शुभारंभ किया था । आश्चर्यजनक रूप से 85 दिनों की कठिन साधना के बाद भी वे मात्र लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी ही तय कर सके हैं ।
जब उनकी परिक्रमा पूर्ण होने में लगने वाले समय के बारे में पूछा गया तो उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिया— “यह तो मां ही जाने।”
धार्मिक जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की दंडवत नर्मदा परिक्रमा पूर्ण करने में कई वर्षों का समय लग सकता है । वनमार्ग से गुजरते हुए उनकी कठिन तपस्या को देखने के लिए राहगीर रुक जाते हैं । अनेक श्रद्धालु उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं जबकि कई लोग इस दुर्लभ साधना को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आते हैं ।
नर्मदा परिक्रमा सनातन धर्म की अत्यंत कठिन एवं पुण्यदायी साधनाओं में गिनी जाती है किंतु दंडवत प्रणाम करते हुए परिक्रमा करना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है । दंडवत महाराज का यह संकल्प केवल शारीरिक सहनशक्ति ही नहीं बल्कि मानसिक दृढ़ता और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भी परिचायक है ।
विशेष बात यह है कि इस कठिन यात्रा में वे पूर्णतः अकेले हैं । उनके पास केवल एक बैग , एक डंडा तथा मां नर्मदा के पवित्र जल से भरा कमंडल है । यही उनकी समस्त सामग्री है । अभी वे अमरकंटक के कपिलासंगम वार्ड क्रमांक 08 में चल रहे है । मां नर्मदा के प्रति अटूट आस्था और विश्वास ही उनकी साधना का सबसे बड़ा आधार है ।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि आधुनिक युग में जहां भौतिक सुविधाओं की चाहत बढ़ती जा रही है वहीं दंडवत महाराज की यह तपस्या समाज को त्याग , आत्मसंयम , धैर्य और भक्ति का संदेश दे रही है ।
अमरकंटक की तपोभूमि में साधु-संतों की ऐसी साधनाएं आज भी प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए हैं । श्रद्धालुओं का मानना है कि दंडवत महाराज की यह अनन्य भक्ति समाज में आध्यात्मिक चेतना का संचार कर रही है ।

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