बस्ता उठाया, साइकिल चलाई और पहुंच गए कलेक्टर दरबार, नन्हें फरियादियों की गुहार— ‘स्कूल जाना है सर, सड़क बनवा दीजिए’
बीरगांव के दो छात्रों ने दिखाई मिसाल, 400-500 बच्चों की परेशानी लेकर पहुंचे जनदर्शन
मुंगेली। मंगलवार को कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित जनदर्शन में एक ऐसा भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को कुछ पल के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया। जहां रोजाना बड़ी उम्र के लोग अपनी समस्याएं लेकर प्रशासन के पास पहुंचते हैं, वहीं इस बार दो नन्हें स्कूली बच्चे कंधे पर बस्ता, हाथ में आवेदन पत्र और साइकिल से सफर तय कर सीधे कलेक्टर दरबार पहुंच गए। इन बच्चों की मासूमियत, साहस और अपने गांव के प्रति जिम्मेदारी ने जनदर्शन को खास बना दिया।
ग्राम बिरगांव निवासी मिहुल टंडन और उनके मित्र टीकम पात्रे स्कूल ड्रेस में जनदर्शन पहुंचे। दोनों बच्चों ने गांव की जर्जर सड़क की समस्या को लेकर कलेक्टर कुन्दन कुमार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया। पहले तो लोगों को लगा कि शायद वे किसी बड़े के साथ आए होंगे, लेकिन जब दोनों बच्चे आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने लगे तो सभी का ध्यान उनकी ओर चला गया।

मिहुल टंडन, जो चौथी कक्षा के छात्र हैं, ने अपनी मासूम आवाज में बताया कि बीरगांव से करही जाने वाले मार्ग का एक हिस्सा काफी ऊबड़-खाबड़ और खराब हो चुका है। लगभग 200 से 300 मीटर सड़क इतनी खराब स्थिति में है कि बरसात के दिनों में वहां से गुजरना बेहद मुश्किल हो जाता है। सड़क पर कीचड़ और गड्ढों के कारण साइकिल चलाना तो दूर, पैदल निकलना भी चुनौती बन जाता है।
मिहुल ने कहा, “मेरे जैसे बहुत सारे बच्चे यही परेशानी उठा रहे हैं। बारिश के समय आने-जाने में हमें बहुत तकलीफ होती है, इसलिए मैं आवेदन पत्र लेकर आया हूँ। कलेक्टर साहब ने कहा है कि सड़क पर मुरूम डलवा देंगे।” उनकी बातों में शिकायत से अधिक अपने साथियों के लिए चिंता साफ झलक रही थी।
सबसे भावुक क्षण तब आया जब मिहुल ने बताया कि उन्हें यहां आने के लिए उनके पिता ने प्रेरित किया। उन्होंने कहा, “मेरे पापा ने मुझे यहां भेजा। उन्होंने कहा— जा, तू सबके लिए कर, केवल अपने लिए मत कर। इसलिए मैं सबके लिए यह आवेदन लेकर आया हूँ।” पिता की यह सीख न केवल मिहुल के व्यक्तित्व को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का एक बड़ा संदेश भी देती है।
मिहुल ने बताया कि उनके जैसे करीब 400 से 500 बच्चे रोज इस समस्या से जूझते हैं। खराब सड़क के कारण उन्हें कई बार लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। स्कूल पहुंचने में देर हो जाती है और बरसात में कपड़े तथा किताबें भी खराब हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि यदि सड़क थोड़ी भी दुरुस्त हो जाए तो बच्चों की परेशानी काफी हद तक कम हो सकती है।
दोनों बच्चों ने गांव से करीब दो से तीन किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय कर कलेक्ट्रेट पहुंचने का साहस दिखाया। इतनी छोटी उम्र में समाजहित के लिए उठाया गया यह कदम जनदर्शन में मौजूद अधिकारियों और नागरिकों के लिए प्रेरणा बन गया।
कलेक्टर कुन्दन कुमार ने बच्चों की शिकायत को गंभीरता से सुना और उनकी जागरूकता की सराहना की। उन्होंने कहा कि जनदर्शन में आए इन मासूम बच्चों ने जिस सरलता और ईमानदारी से अपनी समस्या रखी, वह दिल को छू लेने वाला था। बच्चों की संवेदनशीलता और अपने गांव के प्रति चिंता सराहनीय है।
कलेक्टर ने बताया कि संबंधित सड़क प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के अंतर्गत आती है। इस संबंध में संबंधित विभाग की टीम को मौके पर जाकर निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में बारिश का मौसम होने के कारण सड़क पर तत्काल डामरीकरण संभव नहीं है, लेकिन प्राथमिकता के आधार पर सड़क को चलने योग्य बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संबंधित टीम सड़क पर मुरूम डलवाकर उसे दुरुस्त करेगी, ताकि बच्चों और ग्रामीणों को मानसून के दौरान आवागमन में कठिनाई न हो। इससे कम से कम स्कूल जाने वाले बच्चों को राहत मिल सकेगी।
यह घटना केवल सड़क निर्माण की मांग तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा संदेश छोड़ गई। आज की नई पीढ़ी समस्याओं को केवल सहने के बजाय उनके समाधान के लिए आवाज उठाना भी सीख रही है। मिहुल और टीकम ने साबित कर दिया कि बदलाव की शुरुआत करने के लिए उम्र या पद नहीं, बल्कि हिम्मत, जागरूकता और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना जरूरी है।
इन दो मासूम बच्चों ने अपने छोटे-से कदम से बड़ा संदेश दिया है— यदि बड़े चुप रहें, तो छोटे भी बदलाव की पहल कर सकते हैं। उनकी यह पहल न केवल प्रशासन तक समस्या पहुंचाने का माध्यम बनी, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन गई।

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