सड़कों पर आवारा मवेशियों से बढ़ रहे हादसे, जिम्मेदार कौन—मवेशी मालिक या वाहन चालक?
गौधाम बनने के बावजूद सड़कों पर नहीं थम रही मवेशियों की मौजूदगी, प्रशासन के सामने चुनौती; कलेक्टर के निर्देश पर कार्रवाई जारी
मुंगेली। जिले में सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशी लगातार सड़क दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। दिन और रात के समय मुख्य मार्गों एवं राष्ट्रीय राजमार्गों पर बैठे मवेशियों के कारण आए दिन हादसे हो रहे हैं, जिनमें कई लोगों की जान जा चुकी है और अनेक लोग घायल हुए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इन दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी आखिर किसकी है—अपने मवेशियों को खुला छोड़ने वाले पशु मालिकों की या फिर वाहन चालकों की?

जिले में आवारा मवेशियों की बढ़ती संख्या प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। उच्च न्यायालय भी पूर्व में इस गंभीर समस्या पर संज्ञान ले चुका है। इसके बावजूद सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी कम नहीं हो पा रही है। नगर पालिका और ग्राम पंचायतों द्वारा समय-समय पर काउ कैचर के माध्यम से मवेशियों को पकड़कर हटाने की कार्रवाई की जाती है, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी समाधान साबित नहीं हो रही है। कई स्थानों पर मवेशी दोबारा सड़कों पर पहुंच जाते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बना रहता है।

विशेष रूप से रात के समय सड़क किनारे या बीच सड़क पर बैठे मवेशी वाहन चालकों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं। तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आने से न केवल मवेशियों की मौत होती है, बल्कि कई बार वाहन सवार भी गंभीर हादसों का शिकार हो जाते हैं।
गौवंश संरक्षण एवं संवर्धन को ध्यान में रखते हुए राज्य शासन ने जिले में नौ गौधामों को प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की है। इनमें विकासखंड मुंगेली के संबलपुर, धरमपुरा, लिम्हा, छतौना, लोहड़िया, भूसुंडी और पंडरभट्ठा, विकासखंड पथरिया के नगर पंचायत सरगांव तथा विकासखंड लोरमी के झझपुरीकला स्थित गौधाम शामिल हैं। शासन का उद्देश्य निराश्रित एवं गोवंशीय पशुओं के संरक्षण के लिए स्थायी व्यवस्था विकसित करना है, ताकि सड़कों पर घूमने वाले मवेशियों की संख्या कम हो सके।
छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग ने सभी गौधाम संचालन समितियों को पंजीयन की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं। शासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि गौवंश को गौधामों में स्थानांतरित करने से पहले पशु शेड, पेयजल, विद्युत, फेंसिंग और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। संचालन समितियों को ग्राम पंचायत का अनापत्ति प्रमाण-पत्र, डिमांड ड्राफ्ट, अनुबंध पत्र, पंजीयन शुल्क तथा स्थानीय पशु चिकित्सा अधिकारी द्वारा प्रमाणित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
नगर पालिका अधिकारी एवं मुख्य नगर पालिका अधिकारी होरी सिंह ठाकुर ने बताया कि कलेक्टर के निर्देश पर आवारा पशुओं के संबंध में लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि पशुओं के कानों में लगे टैग से कई बार सही जानकारी नहीं मिल पाती, जिससे उनके वास्तविक मालिक तक पहुंचने में कठिनाई होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं और जल्द ही प्रभावी व्यवस्था लागू की जाएगी।
सवाल अब भी बरकरार है कि जब तक पशु मालिक अपने मवेशियों की जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे और उन्हें खुले में छोड़ते रहेंगे, तब तक सड़क दुर्घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाना आसान नहीं होगा। ऐसे में प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ पशु मालिकों की जवाबदेही तय करना भी समय की बड़ी आवश्यकता बन गई है।

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