मध्य वर्ग का सफरः नीतियों से मिलती प्रगति 12 साल विश्वास के, विकास के, जन कल्याण के
भारत का सामाजिक-आर्थिक चेहरा बदल रहा है। इस बदलाव के केंद्र में आगे बढ़ता और आत्मविश्वास से लबरेज मध्य वर्ग है। इस तबके को एक समय में सतर्क खर्च और सीमित विकल्पों के लिए जाना जाता था। लेकिन आज मध्य वर्ग के परिवार ज्यादा सुरक्षा, अवसर और आकांक्षा की अनुभूति कर रहे हैं। पिछले 12 वर्षों में कराधान, स्वास्थ्यसेवा, आवासन, डिजिटल सेवाओं, अवसंरचना, शिक्षा और उद्यमिता में सुधारों से रोजमर्रा का जीवन ज्यादा किफायती और सुविधाजनक हो गया है। बेहतर कनेक्टिविटी, सेवाओं तक आसान पहुंच, किफायती आवास, सामाजिक सुरक्षा में वृद्धि और डिजिटल सशक्तीकरण से सुख-साधनों और आत्मविश्वास में इजाफा हुआ है। आय में वृद्धि और अवसरों के विस्तार के साथ भारत का मध्य वर्ग अब खुद को सिर्फ बदलाव के अनुरूप ढाल ही नहीं रहा बल्कि राष्ट्र के विकास, महत्वाकांक्षा और भविष्य की संपन्नता में सक्रिय योगदान कर रहा है।

सशक्त और विकासमानः भारत का नया मध्य वर्ग
एक समय भारत के मध्य वर्ग को उसके सतर्क खर्चों, सीमित विकल्पों और छोटी महत्वाकांक्षाओं से पहचाना जाता था। आज यह वास्तविकता बदल चुकी है। बढ़ती आय, डिजिटल पहुंच और फैलते अवसरों के साथ ही आकांक्षाएं उपलब्धियों में बदल रही हैं। भारतीय समाज का यह तबका सरकार के समर्थन से लगातार सशक्त हो रहा है। वर्ष 2014 से आयकर छूट सीमाओं में रिकॉर्ड वृद्धि से लेकर जीएसटी सुधारों तक से उसकी बचत और खर्च करने योग्य आय बढ़ी है। अब यह मध्य वर्ग ज्यादा आत्मविश्वास के साथ सशक्त होकर भारत की विकास गाथा के केंद्र में खड़ा है।
किसे कहते हैं मध्य वर्ग?
मध्य वर्ग की परिभाषा क्रय शक्ति, शिक्षा के स्तर, सामाजिक सेवाओं और धन की अवधारणा के हिसाब से विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग है। इस संबंध में विश्व बैंक के पैमाने को व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। विश्व बैंक प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) के आधार पर हर वर्ष अर्थव्यवस्थाओं का वर्गीकरण करता है। वित्त वर्ष 2026 के लिए देशों की आय का वर्गीकरण इस प्रकार है-
निम्न आयः 1135 डॉलर या इससे कम
निम्न मध्य आयः 1136 डॉलर से 4495 डॉलर तक
उच्च मध्य आयः 4496 डॉलर से 13935 डॉलर तक
उच्च आयः 13935 डॉलर से अधिक
यह वर्गीकरण वैश्विक अर्थव्यवस्था के अंदर मध्य वर्ग समेत आय समूहों के निर्धारण के लिए फ्रेमवर्क मुहैया कराता है।
भारतीय मध्य वर्ग का बदलता चेहरा
2010 में विश्व में मध्य वर्ग की आबादी का ज्यादातर हिस्सा आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की अर्थव्यवस्थाओं में रहता था मगर इसमें तेजी से बदलाव आया है। वर्ष 2009 और 2017 के बीच मध्य वर्ग की आबादी 1.8 अरब से बढ़ कर 3.5 अरब हो गई है। इसका लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा मुख्यतः भारत और चीन समेत एशिया में है। वर्ष 2011 और 2019 के बीच भारत के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 53 प्रतिशत का इजाफा हुआ। इस दौरान (1995 और 2021 के बीच) भारत के मध्य वर्ग का प्रति वर्ष 6.3 प्रतिशत की दर से विस्तार हुआ। वर्तमान में देश में मध्य वर्ग कुल आबादी का लगभग 31 प्रतिशत है।
इस रुझान के बढ़ते जाने की उम्मीद है। ओईसीडी के अनुमानों के अनुसार 2030 और 2035 के बीच मध्य वर्ग की आबादी के लिहाज से चीन को भारत पीछे छोड़ देगा। यह स्थिति करोड़ों भारतीयों की बढ़ती आय, विस्तृत होते आर्थिक अवसरों और जीवन स्तर में सुधार को प्रतिबिंबित करती है। यह मजबूत उपभोक्ता मांग, खर्च करने की बढ़ती शक्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत के बढ़ते रसूख का संकेत भी है।
यह बढ़ता मध्य वर्ग वैश्विक मांग को नया आकार दे रहा है। यह शहरीकरण और उदीयमान शहरों के उभार से नजदीक से जुड़ा है जो वैश्विक जीडीपी विकास को संचालित करते हैं। स्वस्थ अर्थव्यवस्था और सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए मजबूत मध्य वर्ग महत्वपूर्ण है। यह उपभोग को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और आवासन में निवेश करता है। यह टैक्स में योगदान और बेहतर सेवाओं की मांग के जरिए सार्वजनिक प्रणालियों को मजबूत करता है। मध्य वर्ग शिक्षा को प्राथमिकता देकर मानव पूंजी का निर्माण करने के साथ ही दीर्घकालिक उत्पादकता और आय में वृद्धि में मददगार है। यह उद्यमिता, नवोन्मेष और छोटे व्यवसायों के विकास को भी प्रेरित करता है।
इस सिलसिले में, विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) ने भारत के मध्य वर्ग के उपभोग के स्वरूप में बदलाव की ओर संकेत किया है। शहरी उपभोक्ता विकास का 93 प्रतिशत हिस्सा चोटी के पांच शहरों (नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बेंगलूरू और चेन्नई) के बाहर होने की उम्मीद है। इसके परिणामस्वरूप लगभग 500 ‘उपभोक्ता शहरों’ के उभरने की संभावना है जो बढ़ती आय और मध्य वर्ग के विस्तार में रूपांतरित होगी। डब्ल्यूईएफ की राय में 2036 तक भारत के कुल व्यय का 93 प्रतिशत हिस्सा मध्य वर्ग (और संपन्न उपभोक्ता) करेगा। वर्ष 2026 में यह हिस्सा 80 प्रतिशत है। इसके अलावा 2035 तक विभिन्न प्रमुख पीढ़ियों (बेबी बूमर्स, जेन एक्स, मिलेनियल और जेन जेड) का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रोजाना 45 डॉलर या इससे ज्यादा खर्च करेगा। यह व्यवसायों के लिए उत्पादों और सेवाओं के विकास तथा विभिन्न उम्र वर्गों को प्रभावित करने का अवसर प्रदान करता है।
अर्थशास्त्र से आगे देखें तो मध्य वर्ग विश्वास को बढ़ावा देता, असमानता घटाता और एक स्थिर और सुशासित समाज की स्थापना में मदद करता है। कुल मिला कर, मजबूत मध्य वर्ग वाले देश ज्यादा समावेशी और निरंतर आर्थिक विकास हासिल करते हैं।
मध्य वर्ग का सुदृढ़ीकरणः परिवर्तनकारी शासन के 12 वर्ष
सरकार ने पिछले 12 वर्षों में व्यापक सुधारों के माध्यम से भारत के मध्य वर्ग का सशक्तीकरण किया है। सरल कराधान तथा ज्यादा मजबूत बैंकिंग, बीमा और पेंशन प्रणालियों से वित्तीय सुरक्षा में वृद्धि हुई है। विस्तार लेते शहरी विकास, बेहतर कनेक्टिविटी और अवसंरचना में सुधार से नए अवसर पैदा हुए हैं। बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच में सुधार, सुगम स्वास्थ्यसेवा, सुदृढ़ शिक्षा और कौशल विकास तथा बेजोड़ डिजिटल शासन से रोजमर्रा की सुविधाएं बेहतर हुई हैं। ये सभी कदम मिल कर संपत्ति सृजन और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए सुरक्षित मार्ग प्रदान करते हैं।
कराधान में कमी, बैंकिंग और बीमा में सुधार तथा पेंशन का विस्तार
सरकार ने पिछले 12 वर्षों में भारतीय मध्य वर्ग की वित्तीय सुरक्षा को मजबूत किया है। कराधान में कमी, बैंकिंग तक पहुंच में सुधार, व्यापक बीमा कवरेज और पेंशन के विस्तार से वित्तीय तनाव में कमी आई है। रियायती ब्याज दरों और डिजिटल सुधारों से बचत, ऋण और वित्तीय योजना निर्माण ज्यादा सुगम और सुविधाजनक हो गया है।
कराधान का सरलीकरण- सरकार ने जुलाई, 2024 में आयकर अधिनियम, 1961 की विस्तृत समीक्षा की घोषणा की। इस समीक्षा को रिकॉर्ड समय में पूरा कर लिया गया। आयकर अधिनियम, 2025 अप्रैल 2026 में लागू हो गया। इन कर सुधारों से मध्य वर्ग पर वित्तीय बोझ में उल्लेखनीय कमी आई है। वर्ष 2014 में 2.5 लाख रुपए तक वार्षिक आमदनी वाले व्यक्तियों को कर नहीं देना पड़ता था। वर्ष 2023 में शुरू की गई नई कर व्यवस्था के अंतर्गत अब 12 लाख रुपए वार्षिक आमदनी (वेतनभोगी व्यक्तियों के लिए मानक कटौती के साथ 12.75 लाख रुपए) तक कोई कर नहीं देना होता है। इससे व्यक्तियों की बचत, खर्च योग्य आमदनी और वित्तीय विकल्पों में बढ़ोतरी हुई है।
माल और सेवा कर (जीएसटी)– जुलाई 2017 में लागू किया गया जीएसटी भारत का स्वतंत्रता के बाद का सबसे महत्वपूर्ण परोक्ष कर सुधार है। इसने विभिन्न केंद्रीय और राज्यीय करों को एक प्रणाली में समेट कर साझा राष्ट्रीय बाजार को जन्म दिया है। जीएसटी ने करों का सरलीकरण कर और रोजमर्रा के खर्चों में कमी लाकर खास तौर से मध्य वर्ग को कई स्पष्ट लाभ प्रदान किए हैं। अनिवार्य वस्तुओं के लिए कम दर और युक्तिसंगत स्लैब से रोजमर्रा का उपभोग ज्यादा किफायती हो गया है। लगभग 9 वर्षों में दरों को युक्तिसंगत बनाए जाने और डिजिटलीकरण से जीएसटी बेहतर होकर परोक्ष कराधान की रीढ़ बन गया है। जीएसटी करदाताओं का आधार 2017 में 66.5 लाख से बढ़ कर अप्रैल 2026 तक 1.64 करोड़ हो चुका है।
एकीकृत पेंशन योजना (यूपीएस)– अप्रैल 2025 से प्रभावी यूपीएस से केद्र सरकार के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद सुरक्षा मजबूत हुई है। ये कर्मचारी भारत में मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा हैं। यूपीएस एक अंशदायी ढांचे के अंतर्गत कर्मचारी और सरकार के योगदानों को जोड़ कर सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित और महंगाई संबद्ध पेंशन लाभ मुहैया कराती है। यूपीएस कम-से-कम 10 वर्ष की सेवा के बाद अवकाश ग्रहण की स्थिति में न्यूनतम 10000 रुपए मासिक पेंशन की गारंटी करती है। यह सेवानिवृत्ति के बाद आय और वित्तीय स्थिरता के बारे में अनिश्चितता को घटाती है। यह कम वेतन और छोटे सेवा काल वाले कर्मचारियों के लिए खास तौर से मददगार है। यह योजना पेंशनभोगी व्यक्तियों को महंगाई से भी राहत मुहैया कराती है। इससे सेवानिवृत्त व्यक्तियों को जीवन यापन के बढ़ते खर्चों और महंगाई का सामना करने में सहायता मिलती है। इसके अलावा पारिवारिक पेंशन लाभों से पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद उसके जीवन साथी को मदद मिलती है। इससे पेंशनभोगी के निधन के बाद उसके आश्रित परिवारजनों को वित्तीय सुरक्षा का जारी रहना सुनिश्चित होता है।
बीमा– भारत प्रीमियम के पैमाने के हिसाब से विश्व के 10वें सबसे बड़े बीमा बाजार के रूप में उभरा है। इससे देश में विस्तृत होती वित्तीय सुरक्षा का पता चलता है। बीमा में मोटे तौर पर जीवन बीमा और गैर-जीवन बीमा शामिल हैं। जीवन बीमा के दायरे में मृत्यु, दिव्यांगता और सेवानिवृत्ति जोखिम शामिल हैं। इसी तरह, गैर-जीवन बीमा के दायरे में आकस्मिक स्थितियों में स्वास्थ्य और संपत्ति की सुरक्षा आती है।
बीमा का बढ़ता महत्व पारिवारिक वित्त में दिखाई देता है। बीमा और पेंशन कोषों का हिस्सा वित्त वर्ष 2018-19 में 28.6 प्रतिशत से बढ़ कर वित्त वर्ष 2024-25 में 29.6 प्रतिशत हो गया। इससे बढ़ती वित्तीय जागरूकता और परिवारों में दीर्घकालिक सुरक्षा की ओर झुकाव का संकेत मिलता है।
मध्य वर्ग के नजरिए से, भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) 2047 तक सबके लिए बीमा के दृष्टिकोण के प्रति संकल्पबद्ध है। उसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक के पास पर्याप्त जीवन, स्वास्थ्य और संपत्ति बीमा हो तथा प्रत्येक उद्यम को समुचित जोखिम सुरक्षा मिले।
सरकार की सहायता से चलने वाली अनेक योजनाओं ने इस विस्तार को आधार दिया है। 2015 में शुरू की गई प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के सदस्यों की संख्या 26.88 करोड़ है और इसके अंतर्गत 10 लाख से ज्यादा दावे निपटाए जा चुके हैं। किफायती दुर्घटना कवरेज मुहैया कराने वाली प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के सदस्यों की संख्या 57.11 करोड़ है। इस बीच, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत स्वास्थ्यसेवा तक पहुंच का विस्तार करते हुए 43.52 करोड़ स्वास्थ्य कार्ड जारी किए गए हैं।
कर्मचारी राज्य बीमा योजना सामाजिक सुरक्षा को और मजबूत करती है। इसके दायरे में 3.24 करोड़ कामगार आते हैं और इसका लाभ परिवारों समेत 14.91 करोड़ व्यक्तियों को मिलता है।
2025 में सबका बीमा, सबकी रक्षा संशोधनों जैसे सुधारों ने नियमन को बेहतर बनाया, उपभोक्ता संरक्षण को मजबूती दी और विदेशी निवेश की सीमाओं में वृद्धि की है। इन कोशिशों ने मिल कर बीमा की पहुंच का विस्तार किया, वित्तीय सुदृढ़ता को सुधारा और जोखिम संरक्षण को मध्य वर्ग के लिए ज्यादा सुलभ बनाया है।
ऋण की कम ब्याज़ दर– वर्ष 2015 और 2025 के बीच, भारत में घर के लिए ऋण की ब्याज दरों में उल्लेखनीय गिरावट आई। 2015 में, ये दरें 9.5% से 10.5% प्रति वर्ष के बीच थीं। 2025 तक, ये कम होकर लगभग 7.35% से 8.75% पर आ गईं, जिससे वहन करने में सुधार हुआ और घर का मालिक बनना अधिक सुलभ हो गया। इस गिरावट के मुख्य कारण नियमों में सुधार और व्यापक आर्थिक बदलाव थे। इसमें एक महत्वपूर्ण कारक भारतीय रिजर्व बैंक का नीतिगत रुख था। रेपो रेट में भारी कटौती देखी गई है—जो 2015 में 8% से घटकर 2026 में 5.25% हो गई। बैंकों ने धीरे-धीरे इन लाभों को ऋण धारकों तक पहुँचाया, जिससे ऋण दरों में कमी आई।
गृह ऋण की ही तरह, व्यक्तिगत ऋण की दरें भी 2014 के 14.25% से घटकर 2026 में 12.5% पर आ गईं। इसके साथ ही, शिक्षा ऋण की दरें 14.25% से कम होकर 9.4% रह गईं। इन कम दरों की वजह से मध्यम वर्ग के लिए ऋण लेना ज़्यादा किफ़ायती हो गया है। इनसे इएमआई (ऋण की किश्तें) कम होती है और आर्थिक दबाव भी कम होता है। साथ ही, ये घर, शिक्षा और निजी ज़रूरतों पर खर्च करने में भी मदद करती हैं।
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई)– अप्रैल 2015 में शुरू की गई प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई), मैन्युफैक्चरिंग, व्यापार, सेवाओं और कृषि संबद्ध गतिविधियों के लिए 20 लाख रुपये तक का बिना गारंटी का ऋण प्रदान करती है। यह योजना सशक्तिकरण का एक मज़बूत ज़रिया बन गई है, जिसके तहत मार्च 2026 तक 40.07 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 57 करोड़ से अधिक ऋण वितरित किए जा चुके हैं। इस योजना ने जमीनी स्तर पर उद्यमिता को मजबूत किया है, वित्तीय समावेशन को गहरा किया है और भारत की स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के निरंतर विकास को गति दी है। मध्यम वर्ग के लिए, पीएमएमवाई छोटे व्यवसायों को शुरू करने में मदद करती है, स्व-रोजगार में सहायता करती है और अनौपचारिक ऋण पर निर्भरता को कम करके वित्तीय स्थिरता में सुधार लाती है।
जब भोपाल के लवकुश मेहरा ने 2021 में 5 लाख रुपये का अपना पहला ‘मुद्रा’ ऋण लिया था, तो उन्होंने ऐसा कुछ हिचकिचाहट के साथ किया था। लेकिन कुछ ही वर्षों में, उनका वह एक कदम एक शानदार सफर की शुरुआत साबित हुआ—उनका फार्मास्युटिकल का कारोबार 12 लाख रुपये के टर्नओवर से बढ़कर 50 लाख रुपये से अधिक का हो गया, उनकी आय दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई और वे अपने घर के मालिक बन गए। उनकी यह कहानी ठीक उसी उद्देश्य को दर्शाती है जिसे हासिल करने के लिए पीएमएमवाई को बनाया गया था—यानी युवा उद्यमियों को एक ऐसा वित्तीय आधार प्रदान करना जिससे वे अपनी शर्तों पर अपनी आजीविका खड़ी कर सकें।
शहरी विकास और कनेक्टिविटी का विस्तार
पिछले 12 वर्षों में, सरकार ने पूरे भारत में शहरी अवसंरचना और कनेक्टिविटी का विस्तार किया है। बेहतर आवास, तेज़ परिवहन और आधुनिक सार्वजनिक अवसंरचना ने रोज़मर्रा के शहरी जीवन को बेहतर बनाया है। मेट्रो नेटवर्क के विस्तार, रेलवे के आधुनिकीकरण और बढ़ती हवाई कनेक्टिविटी ने मध्यम वर्ग के लिए यात्रा को ज़्यादा सुरक्षित, तेज़ और किफ़ायती बना दिया है।
प्रधानमंत्री आवास योजना- शहरी (पीएमएवाई-यू)- आवास के लिए 2015 में शुरू की गई इस योजना ने करोड़ों लोगों को सुरक्षित आवास देकर उनकी ज़िंदगी बदल दी है। पीएमएवाई-यू 2.0 योजना इस काम को और आगे बढ़ाती है। इसे ‘सभी के लिए आवास’ मिशन के तहत (सितंबर 2024 से प्रभावी) शुरू किया गया था। इसका लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में शहरी क्षेत्रों में 1 करोड़ और पात्र लाभार्थियों को सहायता देना है। मध्यम वर्ग के लिए घर सुनिश्चित करने के लिए 8.76 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
कुल 125.31 लाख स्वीकृत घरों में से, 98.1 लाख घर पूरे हो चुके हैं या देश भर में लाभार्थियों को सौंप दिए गए हैं (मई 2026)। यह (2005-14) के दौरान बनाए गए 8.04 लाख घरों की तुलना में 1,120% की महत्वपूर्ण वृद्धि है। यह योजना, अन्य लोगों के साथ-साथ, मध्यम-आय वर्ग के शहरी परिवारों के लिए गरिमापूर्ण और किफायती आवास सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
इसके अलावा, एसडब्ल्यूएएमआईएच (किफायती और मध्यम-आय वाले आवास के लिए विशेष विंडो) फंड खास तौर पर मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए बनाया गया है, जिसका मकसद रुकी हुई आवासीय परियोजनाओं को पूरा करना है। 2019 में शुरू होने के बाद से, 146 परियोजनाओं में 58,000 से ज़्यादा घर पूरे किए जा चुके हैं। इस फंड ने देश भर में इन परियोजनाओं में 49,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा की पूंजी जुटाई है, जिसमें 90 मिलियन वर्ग फुट से ज़्यादा का विकास क्षेत्र शामिल है। इसमें से 44% हिस्सा निम्न-आय वर्ग और मध्यम-आय वर्ग के आवास के लिए समर्पित है।
चेन्नई के ‘एलीट एकर्स’ में निवेश करने वाले परिवारों ने अपने सपनों के घर के लिए सालों तक इंतजार किया। 2017 में शुरू की गई इस परियोजना को मंजूरी मिलने में देरी और वित्तीय चुनौतियों के कारण बार-बार रुकावटों का सामना करना पड़ा। कई खरीदारों के लिए, अनिश्चितता लगातार बढ़ती जा रही थी क्योंकि कब्जा मिलने की तारीखें आगे खिसकती जा रही थीं।
एसडब्ल्यूएएमआईएच ने 2020 में हस्तक्षेप किया और रुके हुए प्रोजेक्ट को फिर से शुरू किया। दो साल के भीतर, निर्माण कार्य पूरा हो गया और बकाया राशि का भुगतान कर दिया गया। 250 से अधिक परिवारों को आखिरकार उनके घर मिल गए, जिससे घर खरीदने वालों को राहत, स्थिरता और नया आत्मविश्वास मिला।
मेट्रो रेल का विस्तार- भारत के पास अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क है, जिसने लाखों लोगों के रोज़ाना के सफ़र को पूरी तरह बदल दिया है। मेट्रो के विस्तार की गति 2014 से पहले के 0.68 किमी प्रति माह से बढ़कर आज लगभग 6 किमी प्रति माह हो गई है। पिछले 12 वर्षों में, पूरे देश में मेट्रो कनेक्टिविटी के विस्तार के लिए लगभग 3.7 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। जिन शहरों में मेट्रो सेवा उपलब्ध है, उनकी संख्या 2014 के सिर्फ़ 5 शहरों से बढ़कर 2025 में 26 हो गई है, जबकि रोज़ाना यात्रा करने वालों की संख्या 2013-14 के 28 लाख से बढ़कर आज 1.15 करोड़ से भी ज़्यादा हो गई है। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत, दिल्ली, जयपुर, कोलकाता, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों के लिए मार्च 2026 तक बीईएमएल द्वारा घरेलू स्तर पर 2,100 से अधिक मेट्रो कोच देश में ही बनाए हैं। मध्यम वर्ग के लिए, मेट्रो के इस विस्तार के परिणामस्वरूप यात्रा में कम समय लगता है, यात्रा का खर्च कम हुआ है और एक विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित हुई है— जिससे शहरी जीवन ज़्यादा किफायती हो गया है।
रेलवे का विस्तार- पिछले 12 सालों में, भारत में ट्रेन से सफ़र करना ज़्यादा सुरक्षित, तेज़, पर्यावरण के अनुकूल और आरामदायक हो गया है। भारतीय रेलवे के लिए बजट में मिलने वाली मदद 2014-15 के 32,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 2.78 लाख करोड़ रुपये हो गई है। ‘कवच’ नाम के एक स्वदेशी सिस्टम से सुरक्षा में सुधार हुआ है; यह सिस्टम ऑटोमैटिक ब्रेकिंग के ज़रिए ट्रेनों की टक्कर को रोकता है। 130 किमी प्रति घंटे से अधिक की गति से चलने वाली हाई-स्पीड रेल पटरियों का विस्तार 2014 के 5,036 किमी से बढ़कर 2026 में 23,713 किमी हो गया है। भारत ने जनवरी 2026 में अपनी भविष्योन्मुखी ‘वंदे भारत’ स्लीपर सेवा की भी शुरुआत की, जबकि अब देश भर में 60 ‘अमृत भारत’ ट्रेनें चल रही हैं।
रेलवे का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, जिसमें यात्रियों की संख्या वर्ष 2024-25 के 716 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 741 करोड़ हो गई है। भारतीय रेलवे हर दिन देश भर में दो करोड़ से अधिक यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाती है। इस बीच, अप्रैल 2026 तक 208 रेलवे स्टेशनों को आधुनिक यात्री सुविधाओं के साथ अपग्रेड किया जा चुका है। मध्यम वर्ग के लिए, इसका मतलब है—तेज़ ट्रेनें, बेहतर सुरक्षा और उत्कृष्ट स्टेशन, जिसने लंबी दूरी की यात्रा को अधिक आरामदायक और भरोसेमंद बना दिया है।
हवाई अड्डों का विस्तार- भारत में हवाई यात्रा मध्यम-वर्गीय परिवारों के लिए ज़्यादा सुलभ और सुविधाजनक हो गई है। चालू हवाई अड्डों की संख्या 2014 में 74 से बढ़कर 2026 में 165 हो गई है। पूरे देश में आधुनिक हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे में 1.4 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का निवेश किया गया है। मोपा, कन्नूर, होलोंगी, नवी मुंबई और नोएडा (जेवर) जैसे नए हवाई अड्डों ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया है।
तेज़ शिकायत निवारण और किफायती हवाई अड्डा सुविधाओं के माध्यम से यात्रियों के अनुभव में भी सुधार हुआ है। ‘उड़ान यात्री कैफे’ अब यात्रियों के लिए बजट अनुकूल भोजन के विकल्प प्रदान करते हैं। ‘डिजी यात्रा’ 38 हवाई अड्डों पर निर्बाध, कागज रहित और संपर्क रहित यात्रा को सक्षम बनाती है। दिसंबर 2022 से अब तक 9.3 करोड़ से अधिक यात्री इस डिजिटल सुविधा का उपयोग कर चुके हैं। इसके अलावा, ई-बीसीएएस प्लेटफॉर्म ने डिजिटल निगरानी और प्रशिक्षण प्रणालियों के माध्यम से विमानन सुरक्षा को और मजबूत किया है।
‘उड़ान’ योजना ने छोटे शहरों और पहली बार हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए हवाई जहाज की यात्रा को किफायती बना दिया है। 2016 से अब तक, 665 रूटों ने 95 हवाई अड्डों, हेलीपोर्टों और वॉटर एयरोड्रोमों को आपस में जोड़ा है। इस योजना के तहत 3.45 लाख से अधिक उड़ानों ने 164 लाख से अधिक यात्रियों को सेवाएं प्रदान की हैं। देश भर में छोटे हवाई अड्डों को पुनर्निर्माण में 4,800 करोड़ से अधिक का निवेश किया गया है। 2026 में स्वीकृत संशोधित उड़ान योजना के तहत अगले दशक में 120 नए गंतव्यों को जोड़ा जाएगा। कुल मिलाकर, किफायती उड़ानें, बेहतर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और आधुनिक हवाई अड्डे मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए हवाई यात्रा को आसान और अधिक सुविधाजनक बना रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में ज़बरदस्त बढ़ोतरी
स्वच्छता, बिजली, नल के पानी और खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन तक बढ़ी हुई पहुँच ने भारत के मध्यम वर्ग के लिए सुविधा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया है। इसके अतिरिक्त, पिछले 12 वर्षों में, मज़बूत सार्वजनिक अवसंरचना ने शहरी और ग्रामीण, दोनों भारत में जीवन स्तर को बेहतर बनाया है।
नल के पानी के कनेक्शन- भारत में नल के पानी के कनेक्शन 2019 में 3.23 करोड़ से बढ़कर मई 2026 में 15.85 करोड़ हो गए, जो 390% से ज़्यादा की बढ़ोतरी दिखाता है। यह तेज़ी से हुआ विस्तार बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने और घरों तक ज़रूरी सेवाओं की पहुँच को और व्यापक बनाने पर सरकार के ध्यान को दर्शाता है।
कचरा, अपशिष्ट और सीवेज का प्रबंधन- तीव्र शहरीकरण ने प्रभावी अपशिष्ट, कचरा और सीवेज प्रबंधन की मांग को बढ़ा दिया है। इस समस्या से निपटने के लिए, सरकार ने अक्टूबर 2014 में ‘स्वच्छ भारत मिशन-शहरी’ की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य शहरी भारत को खुले में शौच से मुक्त करना और नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट का 100% वैज्ञानिक प्रबंधन हासिल करना था। ‘स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0’ के माध्यम से इस प्रयास को और अधिक बढ़ावा दिया गया। कचरा प्रसंस्करण, जो 2014 में लगभग नगण्य स्तर पर था, वह 2026 में बढ़कर लगभग 97% हो गया है, जो शहरी स्वच्छता में एक क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी सुधार को दर्शाता है।
इस प्रयास को पूरक बनाते हुए, सरकार ने जल और सीवेज प्रणालियों को मजबूत करने के लिए 2015 में ‘अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन’ (अमृत) की शुरुआत की। यह शहरों को आत्मनिर्भर और जल-सुरक्षित बनाने पर केंद्रित है। 2021 में शुरू किए गए अमृत 2.0 के तहत, 583 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिससे 6,649 मिलियन लीटर प्रतिदिन की सीवेज निपटाने की क्षमता जुड़ी है। पिछले दशक में, अमृत और अमृत 2.0 के तहत 2.53 करोड़ नल कनेक्शन और 1.50 करोड़ से अधिक सीवर कनेक्शन प्रदान किए गए हैं।
बिजली की कवरेज और ऊर्जा की कमी- बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन में हुए बड़े विस्तार से पूरे देश में बिजली की उपलब्धता मज़बूत हुई है। इसके परिणामस्वरूप, ऊर्जा की कमी वित्त वर्ष 2013-14 के 4.2% से तेज़ी से घटकर वित्त वर्ष 2025-26 में सिर्फ़ 0.03% रह गई है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। इस प्रगति से घरों में रोज़ाना मिलने वाली बिजली की आपूर्ति बेहतर हुई है। ग्रामीण इलाकों में अब लगभग 22.6 घंटे बिजली मिलती है, जबकि 2014 में 12.5 घंटे ही बिजली मिलती थी। शहरी इलाकों में अब 23.4 घंटे तक बिजली मिलती है, जबकि पहले यह 22.1 घंटे थी। कुल मिलाकर, ये उपलब्धियाँ बिजली की ज़्यादा भरोसेमंद और व्यापक पहुँच को दर्शाती हैं।
दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और एकीकृत विद्युत विकास योजना— दोनों ही दिसंबर 2014 में शुरू की गई थीं, इन योजनाओं के तहत, ऊर्जा वितरण बुनियादी ढांचे को मजबूत और आधुनिक बनाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। इन प्रयासों को ‘प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना’ (सौभाग्य) से और भी बल मिला, जो दुनिया की सबसे बड़ी सार्वभौमिक विद्युतीकरण पहलों में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के उन सभी घरों तक बिजली पहुंचाना और उन्हें बिजली के कनेक्शन देना था, जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुंची थी।
कुल मिलाकर, इन पहलों में लगभग 1.85 लाख करोड़ रुपये का निवेश शामिल था। इसके परिणामस्वरूप, मध्यम वर्ग को बिजली की विश्वसनीय आपूर्ति मिली है, रोज़मर्रा के जीवन में रुकावटें कम हुई हैं और घरों, शिक्षा तथा काम-काज के मामलों में अधिक सुविधा प्राप्त हुई है।
प्रति व्यक्ति बिजली की खपत- भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2013–14 में 957 किलोवाट-प्रति घंटा से बढ़कर 2024–25 में 1,460 किलोवाट-प्रति घंटा हो गई, जो 52.6% की वृद्धि है। यह बढ़ती मांग और भरोसेमंद बिजली तक व्यापक पहुंच को दर्शाता है। मध्यम वर्ग के लिए, इसका मतलब है रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़्यादा सुविधाएँ—घर के उपकरणों और डिजिटल डिवाइस के ज़्यादा इस्तेमाल से लेकर बेहतर कूलिंग, लाइटिंग और कनेक्टिविटी। बिजली की बेहतर उपलब्धता ने ‘वर्क फ्रॉम होम’, ऑनलाइन शिक्षा, छोटे व्यवसायों और पूरे शहरी व अर्ध-शहरी भारत में जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में भी मदद की है।
इसके अलावा, भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए, सरकार ने 2023–2032 के लिए राष्ट्रीय बिजली योजना को अंतिम रूप दे दिया है। इसका लक्ष्य 2032 तक सबसे अधिक बिजली की मांग के समय 458 गीगावाट की मांग को पूरा करना है। यह योजना नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण को भी संभव बनाएगी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी उभरती ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करेगी, जिससे बिजली व्यवस्था मज़बूत होगी।
सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवा
देश भर में लाखों परिवारों के लिए किफायती स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में काफी विस्तार हुआ है। पिछले बारह वर्षों में दवाओं की कम कीमतें, व्यापक बीमा कवरेज और बेहतर उपचार सुविधाओं ने स्वास्थ्य सेवा से जुड़े बोझ को कम किया है। निवारक देखभाल, रोग नियंत्रण और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना ने भी मध्यम वर्ग के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ाया है।
ईट राइट इंडिया (सही खानपान)– मोटापे और खान-पान से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए अस्पतालों से इतर कदम उठाने की आवश्यकता है। भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक—एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) शुरुआत से ही इस पर काम कर रहा है, जिससे भोजन के उत्पादन, बिक्री और उपभोग के तौर-तरीकों को नया रूप दिया जा सके। जुलाई 2018 में शुरू किया गया ‘ईट राइट इंडिया’ आंदोलन सुरक्षित, स्वस्थ और संवहनीय भोजन को बढ़ावा दे रहा है। जुलाई 2025 तक, 17.76 लाख खाद्य संचालकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और 179 ‘क्लीन स्ट्रीट फूड हब’ को प्रमाणित किया गया है। इसके साथ ही, 517 प्रमाणित फल और सब्जी बाजार और रेलवे स्टेशनों पर 406 प्रमाणित ‘ईट राइट स्टेशन’ मौजूद हैं।
यह मध्यम वर्ग को खान-पान से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों और चिकित्सा लागतों को कम करने में मदद करता है। बाजारों, स्ट्रीट फूड हब और स्टेशनों के व्यापक प्रमाणीकरण से दैनिक जीवन में भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता में सुधार होता है।
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना योजना– 2015 के बाद इस योजना में काफी बदलाव किए गए। इसका उद्देश्य जन औषधि केंद्रों के ज़रिए काफी कम कीमतों पर, गुणवत्ता पूर्ण जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराना है। फ़िलहाल, 18,000 से ज़्यादा जन औषधि केंद्र 50-80% कम कीमतों पर अच्छी गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध करा रहे हैं। औसतन, रोज़ाना लगभग 10 से 12 लाख लोग इन केंद्रों पर आते हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारत के मध्यम वर्ग को स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले खर्च में कमी आई है जिसका उन्हें का लाभ मिलता है। 2,110 दवाओं, 315 सर्जिकल उपकरणों आदि का उत्पाद इलाज को बेहतर बनाता है। पिछले 11 वर्षों में, जनऔषधि उत्पादों ने परिवारों के दवाओं पर होने वाले खर्च को कम करके 40,000 करोड़ रुपये बचाने में मदद की है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए)– यह योजना हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं (दूसरी और तीसरी तिमाही में) को एक तय दिन, अच्छी क्वालिटी की प्रसव-पूर्व जाँच की सुविधा उपलब्ध कराती है। पीएमएसएमए के लिए एक राष्ट्रीय पोर्टल और एक मोबाइल एप्लिकेशन, निजी/स्वैच्छिक क्षेत्र के डॉक्टरों को इस अभियान से जुड़ने में मदद करते हैं। 2016 में शुरू होने के बाद से, 7.46 करोड़ से ज़्यादा गर्भवती महिलाओं की जाँच की जा चुकी है और देश भर में 22,000 से ज़्यादा केंद्र (29 मई, 2026 तक के आँकड़ों के अनुसार) पीएमएसएमए सेवाएँ दे रहे हैं।
आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना– सितंबर 2018 में शुरू की गई, यह दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना है। यह योजना सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा प्रदान करती है। इससे पूरे भारत के वरिष्ठ नागरिकों को लाभ मिल रहा है, जिसमें मध्यम-वर्गीय परिवार भी शामिल हैं; 70 वर्ष से अधिक आयु के 86.51 लाख से ज़्यादा वरिष्ठ नागरिकों को ‘आयुष्मान वय वंदना कार्ड’ दिए गए हैं।
आयुष्मान आरोग्य मंदिर– यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण था, जिसने भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) हासिल करने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम को चिह्नित किया (इसकी शुरुआत 2018 में हुई थी)। आयुष्मान आरोग्य मंदिर ग्रामीण, शहरी और जनजातीय क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, जो लोगों को उनके निवास स्थान के करीब व्यापक, सार्वभौमिक और मुफ्त सेवाएं प्रदान करते हैं। यह सरकार की 2018 में शुरू की गई प्रमुख स्वास्थ्य सेवा पहल ‘आयुष्मान भारत’ के चार घटकों में से एक है।
इस कार्यक्रम ने पूरे भारत में लोगों तक किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में काफी सुधार किया है। इसके चारों घटकों का सामूहिक उद्देश्य प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तरों पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना है। इसके अन्य घटकों में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, पीएम -आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन शामिल हैं।
‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ के तहत हुए सुधारों ने सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में प्रगति की है। यूएचसी सूचकांक 2015 के 57 से बढ़कर 2021 में 63 हो गया। स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च 2014-15 के 60.6% से घटकर 2021-22 में 39.4% रह गया। 28 अप्रैल, 2026 तक देश भर में 1,85,555 आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित हैं। जून 2026 तक इन केंद्रों पर आने वाले लोगों की कुल संख्या 540 करोड़ से अधिक दर्ज की गई है। विशेष रूप से, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मुख, स्तन और गर्भाशय के कैंसर के लिए 60 करोड़ से अधिक जांच की जा चुकी हैं।
तपेदिक (टीबी), मलेरिया और कैंसर जैसी बीमारियों के लिए योजनाएँ- राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के माध्यम से, 2015-2024 के बीच टीबी के मामलों में 21% की गिरावट आई है; यह प्रति लाख आबादी पर 237 मामलों से घटकर 187 मामले रह गए हैं। उपचार कवरेज में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है—यह 53% से बढ़कर 92% हो गया है, जो कि 78% के वैश्विक औसत से काफी अधिक है।
2016 में, सरकार ने ‘मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय फ्रेमवर्क’ शुरू किया, जो 2027 तक मलेरिया को खत्म करने का एक मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसी फ्रेमवर्क को आगे बढ़ाते हुए, ‘मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना (2023-2027)’ के तहत बेहतर निगरानी और मामलों के प्रबंधन के लिए “जांच, उपचार और ट्रैकिंग” दृष्टिकोण पेश किया गया। इसके साथ ही, वास्तविक समय में डेटा ट्रैकिंग की व्यवस्था भी विकसित की गई। इसके परिणामस्वरूप, 2015 से 2023 के बीच मलेरिया के मामलों और इससे होने वाली मौतों में लगभग 80% की कमी आई है। भारत 2024 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मलेरिया के लिए ‘हाई बर्डन टू हाई इम्पैक्ट’ समूह से भी बाहर निकल गया है।
‘सेंटिनल सर्विलांस अस्पतालों’ की संख्या 2007 के 110 से बढ़कर 2025 में 869 होने के साथ ही डेंगू जांच क्षमता में सुधार हुआ है। 2018 में शुरू किया गया राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम, 1,140 केंद्रों के माध्यम से मुफ्त जांच और उपचार प्रदान करता है। इसके तहत 2018 से सितंबर 2025 तक कुल मिलाकर 18.23 करोड़ लोगों की जांच की जा चुकी है।
भारत विस्तारित निगरानी, तृतीयक (टर्शियरी) बुनियादी ढांचे और जिला स्तर पर उपचार सुविधाओं के माध्यम से कैंसर देखभाल को मजबूत कर रहा है। सरकार ने तृतीयक स्तर पर कैंसर देखभाल की सुविधाओं को बढ़ाने के लिए वर्ष 2014-15 से तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्र सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण की योजना को लागू किया। इस योजना के तहत, 19 राज्य कैंसर संस्थानों (एससीआई) और 20 तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्रों (टीसीसीसी) को मंजूरी दी गई है। योजना के अंतर्गत, राज्य के हिस्से सहित एससीआई के लिए 120 करोड़ रुपये तक और टीसीसीसी के लिए 45 करोड़ रुपये तक का एकमुश्त अनुदान प्रदान करने का प्रावधान है। वर्तमान में, 20एससीआई, 19 टीसीसीसी और 439 डीसीसीसी (जिला कैंसर देखभाल केंद्र) पूरी तरह कार्यरत हैं और मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।
शिक्षा, उद्यमिता और कौशल विकास को सुदृढ़ीकरण
पिछले बारह वर्षों में, पूरे देश में शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता के अवसर काफ़ी बढ़े हैं। मज़बूत संस्थानों, ऋणों तक व्यापक पहुँच और उद्योग-केंद्रित प्रशिक्षण ने करियर के अवसरों को बेहतर बनाया है। इन प्रयासों ने नवाचार को बढ़ावा दिया है, स्वरोज़गार को प्रोत्साहित किया है और भारत के मध्यम वर्ग के लिए सामाजिक-आर्थिक उन्नति को मज़बूत किया है।
स्कूली शिक्षा- 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए, भारत के लिए सामाजिक और आर्थिक प्रगति के केंद्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है। वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के 14.71 लाख स्कूल 24.69 करोड़ से अधिक छात्रों और 1.01 करोड़ शिक्षकों को सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
इसके अलावा, 2018 में ‘समग्र शिक्षा’ की शुरुआत ने स्कूल शिक्षा के सभी स्तरों पर एक एकीकृत दृष्टिकोण तैयार किया। इसने एक एकीकृत ढांचे के माध्यम से योजना, संसाधनों के आवंटन और सीखने के परिणामों में सुधार किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) ने समग्र, कौशल-उन्मुख और भविष्य के लिए तैयार शिक्षा को बढ़ावा देकर इस दृष्टिकोण को और मज़बूत किया। मध्यम-वर्गीय परिवारों के लिए, ये सुधार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर करियर के अवसरों तक पहुँच का विस्तार करते हैं। ये शैक्षिक अंतर को भी कम करते हैं और आगे बढ़ने के रास्तों को सुदृढ़ बनाते हैं।
आईआईटी का विस्तार- वर्ष 2014 में भारत में 16 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) थे। बाद के वर्षों में 7 नए आईआईटी जोड़े जाने के साथ, इनकी कुल संख्या बढ़कर 23 (2025) हो गई। पिछले एक दशक में (2025-26 तक) छात्रों की संख्या भी दोगुनी होकर 65,000 से 1.35 लाख हो गई है।
इसके अलावा, सरकार ने नए आईआईटी में 6,500 अतिरिक्त छात्रों को सहयोग देने के लिए बुनियादी ढांचे के विस्तार को मंजूरी दी है। तिरुपति, भिलाई, जम्मू, धारवाड़ और पलक्कड़ में यह नई क्षमता तैयार की जाएगी। वरिष्ठ फैक्ल्टी के 130 पदों को जोड़े जाने से शैक्षणिक गुणवत्ता और अधिक मजबूत होगी। मध्यम वर्ग के लिए, यह विस्तार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शीर्ष संस्थानों तक पहुँच को बेहतर बनाता है। यह बेहतर नौकरियों, उच्च आय और सामाजिक-आर्थिक उत्थान के रास्ते खोलता है। साथ ही, यह शैक्षिक असमानता को कम करता है और एक अधिक कुशल, नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है।
विद्या लक्ष्मी योजना- 2024 में शुरू की गई यह पहल, मेधावी छात्रों को सहायता प्रदान करने के लिए बनाई गई है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि पैसों की कमी उच्च शिक्षा तक पहुँच में बाधा न बने। यह एक सरल, पारदर्शी और डिजिटल प्रक्रिया के माध्यम से बिना किसी गारंटी या ज़मानत के शिक्षा ऋण प्रदान करती है। जिन परिवारों की वार्षिक आय 8 लाख रुपये तक है, उनके छात्रों को 3% की ब्याज सब्सिडी मिलती है। योग्यता के आधार पर, 860 निर्धारित गुणवत्तापूर्ण संस्थानों में से किसी एक में प्रवेश प्राप्त किया जा सकता है। मध्यम-वर्गीय परिवारों के लिए, यह योजना आर्थिक बोझ को कम करती है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच का विस्तार करती है। यह छात्रों को बिना किसी भारी शुरुआती खर्च या कर्ज़ लेकर, अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम बनाता है। फरवरी 2025 से फरवरी 2026 के दौरान, 60,600 से ज़्यादा ऋण मंज़ूर किए गए हैं, जिनकी कुल राशि 7,750 करोड़ रुपये से ज़्यादा है; इनमें से पहले सेमेस्टर/वर्ष के लिए 1,400 करोड़ रुपये वितरित किए गए हैं।
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का आगमन– डीकिन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ वोलोंगोंग जैसे दुनिया के जाने-माने विश्वविद्यालयों ने गुजरात के ‘गिफ्ट सिटी’ में अपने कैंपस खोले हैं, जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथैम्प्टन ने गुरुग्राम में अपना कैंपस स्थापित किया है। ये कैंपस भारतीय छात्रों के लिए वैश्विक पाठ्यक्रम, फैकल्टी और शिक्षण पद्धतियों को और भी सुलभ बनाते हैं। मध्यम वर्ग के लिए, इससे विदेश में पढ़ाई करने का भारी खर्च कम हो जाता है और विदेशी मुद्रा का बाहर जाना भी सीमित होता है। साथ ही, इससे देश के भीतर ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त डिग्रियाँ हासिल करने के अवसर भी बढ़ते हैं। कुल मिलाकर, इससे शिक्षा की पहुँच आसान होती है, विकल्पों का दायरा बढ़ता है और एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में भारत की स्थिति मज़बूत होती है। 2025 में, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने ऑस्ट्रेलिया, इटली, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका के 8 विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को ‘लेटर ऑफ़ इंटेंट’ (आशय पत्र) जारी किया है। यूजीसी ने इन संस्थानों को बेंगलुरु, मुंबई और चेन्नई में अपने परिसर खोलने के लिए आमंत्रित किया है।
मेडिकल शिक्षा– चिकित्सा के बुनियादी ढांचे के विस्तार से मध्यम वर्ग के लिए अच्छी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा को अधिक सुलभ और किफायती बना दिया है। 31 मार्च 2026 तक 2,045 से अधिक मेडिकल कॉलेज खोले जा चुके हैं—जिनमें 818 एलोपैथी, 323 डेंटल (दंत चिकित्सा) और 942 आयुष कॉलेज शामिल हैं। ‘एम्स’ की संख्या भी तीन गुनी हो गई है—देश भर में 23 एम्स चल रहे हैं। इससे यात्रा की लागत, प्रतीक्षा समय और महंगी निजी स्वास्थ्य सेवा पर निर्भरता कम होती है।
नर्सिंग पर भी उतना ही ध्यान दिया गया है। नए मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ 157 नए नर्सिंग कॉलेज भी स्थापित किए जा रहे हैं—जिनसे हर साल लगभग 15,700 नर्सिंग ग्रेजुएट तैयार होंगे। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में, उत्तरी भारत में ‘निम्हांस’ -2′ (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान) स्थापित किया जाएगा, जिससे टर्शियरी मनोरोग देखभाल में लंबे समय से चली आ रही कमी पूरी होगी। रांची और तेजपुर के संस्थानों को क्षेत्रीय शीर्ष संस्थानों के रूप में अपग्रेड किया जाएगा। ज़िला अस्पतालों में आपातकालीन और ट्रॉमा (दुर्घटना होने पर) देखभाल की क्षमता को 50% तक बढ़ाया जाएगा। बजट 2026-27 में, 17 नई दवाओं पर कस्टम ड्यूटी से छूट दी गई है, और 7 अतिरिक्त दुर्लभ बीमारियों को शुल्क-मुक्त व्यक्तिगत आयात सूची में जोड़ा गया है। इसके अलावा, पाँच क्षेत्रीय मेडिकल वैल्यू टूरिज़्म हब चिकित्सा, शैक्षिक, आयुष और पुनर्वास सेवाओं को एक जगह लाएंगे —जिससे भारत समग्र देखभाल के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित होगा।
इसके अलावा, बजट 2026-27 में ‘लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम’ (एलआरएस – उदारीकृत प्रेषण योजना) के तहत पढ़ाई करने और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए टीसीएस की दर को 5% से घटाकर 2% करने का प्रस्ताव भी किया गया है। विदेशों में शिक्षा और चिकित्सा खर्चों पर टीसीएस में इस कटौती से मध्यम वर्ग पर वित्तीय बोझ कम होगा।
औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई)- आईटीआई भारत में दीर्घकालिक व्यावसायिक शिक्षा की रीढ़ हैं। इनकी स्थापना इस उद्देश्य के साथ की गई है कि उद्योगों को कुशल कर्मियों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
इस तंत्र को और मजबूत करने के लिए, अक्टूबर 2025 में 60,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ एक केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में ‘पीएम-सेतु’: प्रधानमंत्री स्किलिंग एंड एम्प्लॉयबिलिटी ट्रांसफॉर्मेशन थ्रू अपग्रेडेड आईटीआई) की शुरुआत की गई थी। मध्यम वर्ग के लिए, यह गुणवत्तापूर्ण व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगार क्षमता तक पहुंच में सुधार करता है। यह महंगी डिग्रियों की आवश्यकता के बिना स्थिर नौकरियों, बेहतर आय और करियर में विकास के रास्ते खोलता है।
स्किल इंडिया मिशन– 2015 में शुरू किया गया यह मिशन भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाने के सरकार के दृष्टिकोण के अनुरूप है। यह पहल शिक्षुता प्रशिक्षण (अपेंटिसशिप ट्रेनिंग), तकनीकी इंटर्न प्रशिक्षण कार्यक्रम , ऑनलाइन कौशल विकास आदि प्रदान करती है। इसकी प्रमुख योजनाओं में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, जन शिक्षण संस्थान, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय शिक्षुता प्रोत्साहन योजना और शिल्पकार प्रशिक्षण योजना शामिल हैं। 2022–2026 के लिए पुनर्गठित की गई यह पहल, मध्यम वर्ग के लिए कई ऐसे अवसर उपलब्ध कराती है जो उनके लिए उपयुक्त हैं। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजें, ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ और हाई-एंड सर्विसेज (उच्च स्तरीय सेवाओं) जैसे क्षेत्रों में रोजगार क्षमता बढ़ाने के लिए उद्योग-अनुकूल, अल्पकालिक और डिजिटल-फ्रेंडली कौशल उन्नयन पर ध्यान केंद्रित करती है। यह कार्यक्रम मुख्य रूप से ‘स्किल इंडिया डिजिटल हब’ पर आधारित है, जो विभिन्न पाठ्यक्रमों, नौकरी के अवसरों और अपेंटिसशिप कार्यक्रमों तक पहुंच प्रदान करता है।
मार्च 2026 तक, पीएमकेवीवाई 4.0 के तहत 27.74 लाख उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया है, जेएसएस के तहत 36.48 लाख लाभार्थियों को लाभ मिला है, और नैप्स (राष्ट्रीय अप्रेंटिस प्रोत्साहन योजना) के माध्यम से 54.41 लाख प्रशिक्षुओं को जोड़ा गया है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार क्षमता बढ़ी है।
स्टार्टअप इंडिया– स्टार्टअप इंडिया पहल के तहत, सरकार तीन प्रमुख योजनाएं लागू कर रही है—स्टार्टअप्स के लिए ‘फंड ऑफ फंड्स’, ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड’ योजना और स्टार्टअप्स के लिए ‘क्रेडिट गारंटी योजना’। ये योजनाएं विभिन्न क्षेत्रों के स्टार्टअप्स को उनके व्यवसाय चक्र के अलग-अलग चरणों में वित्तीय सहायता के अवसर प्रदान करती हैं।
2016 में, सिर्फ़ 502 स्टार्टअप को मान्यता मिली थी, जिनसे 308 सीधी नौकरियाँ पैदा हुईं। मार्च 2026 तक, 2.23 लाख से ज़्यादा स्टार्टअप को मान्यता मिल चुकी है, जिनसे 23.3 लाख नौकरियाँ बढ़ी हैं। इस तेज़ बढ़ोतरी ने मध्यम वर्ग के लिए रोज़गार और उद्यमिता के मौकों का विस्तार किया है। इसके अलावा, इन स्टार्टअप में से लगभग 48% में कम से कम एक महिला निदेशक या पार्टनर है, जो बढ़ती समावेशिता को दिखाता है।
अधिक सुविधा के लिए निर्बाध डिजिटल शासन
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) पहचान, बैंकिंग और कनेक्टिविटी के सोच-समझकर किए गए एकीकरण के ज़रिए विकसित हुआ। इसने ‘जैम ट्रिनिटी’ का रूप लिया, जन धन खाते, आधार और मोबाइल की व्यापक पहुँच संभव हुई। इन तीनों ने मिलकर भारत के डिजिटल बदलाव की नींव रखी, जिससे नागरिकों और सरकार के बीच सीधे और सत्यापित किए जा सकने वाले संपर्क स्थापित हो सके।
‘जैम ट्रिनिटी’– प्रधानमंत्री जन धन योजना को 2014 में ‘वित्तीय समावेशन के लिए राष्ट्रीय मिशन’ के रूप में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य भारत के हर ऐसे वयस्क को, जिसके पास बैंक खाता नहीं है, एक बैंक खाता, एक वित्तीय पहचान और क्रेडिट, बीमा तथा पेंशन जैसी ज़रूरी सेवाओं तक पहुँच उपलब्ध कराना है। पिछले 12 वर्षों में, यह दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहलों में से एक बन गई है। खातों की संख्या 2015 के 14.72 करोड़ से बढ़कर मई 2026 तक 58.26 करोड़ हो गई है। इसी तरह, जमा राशि मार्च 2015 के 15,670 करोड़ रुपये से बढ़कर मई 2026 तक 3.01 लाख करोड़ रुपये हो गई है। इससे मध्यम वर्गीय परिवारों को लाभ होता है क्योंकि वे सुरक्षित रूप से बचत कर सकते हैं, सरकारी लाभ प्राप्त कर सकते हैं, और ऋण, बीमा तथा पेंशन जैसी सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं।
लगभग एक दशक पहले, गोवा की रेबेका मैथ्यू को पेंशन के भुगतान में देरी की समस्या का सामना करना पड़ता था। जब पैसे आते भी थे, तो यह अनिश्चित होता था और बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता था। जन धन योजना ने इस अनुभव को पूरी तरह से बदल दिया। आज, उनकी पेंशन हर महीने सीधे उनके बैंक खाते में पहुँच जाती है। अब न कोई कमीशन लगता है, न कोई देरी होती है, और न ही बार-बार दफ़्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। अब बैंक से आने वाला एक साधारण-सा मैसेज उन्हें गरिमा, आत्मविश्वास और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। जैसा कि रेबेका कहती हैं, “मैं कभी-कभी इसके बारे में भूल जाती हूँ, लेकिन पेंशन आना नहीं भूलती।”
आधार ने पूरे देश के निवासियों के लिए बायोमेट्रिक पर आधारित एक डिजिटल पहचान प्लेटफ़ॉर्म पेश किया। इसने सेवाओं की कुशल डिलीवरी के लिए विशिष्ट पहचान और सुरक्षित प्रमाणीकरण को संभव बनाया। मई 2026 तक, 144 करोड़ से ज़्यादा आधार नंबर जारी किए जा चुके थे। इसका इस्तेमाल यह दिखाता है कि यह रोज़मर्रा के सिस्टम में कितनी गहराई से जुड़ चुका है। अकेले 2024-25 में ही, 2,707 करोड़ से ज़्यादा प्रमाणीकरण लेन-देन किए गए। किसी भी जगह से पहचान करना आसान हो गया है। सत्यापन लगभग तुरंत होने लगा। सेवाओं तक पहुँच ज़्यादा भरोसेमंद और पारदर्शी हो गई।
भारत के 85.5% घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन होने के कारण, मोबाइल फ़ोन अब बैंक, क्लासरूम और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँचने का ज़रिया बन गए हैं। खास बात यह है कि नवंबर 2014 में 93.7 करोड़ तार रहित टेलीफ़ोन ग्राहकों की संख्या दिसंबर 2025 के आखिर तक बढ़कर 125.87 करोड़ हो गई। इसके अलावा, मोबाइल फ़ोन का उत्पादन भी 28 गुना बढ़ गया है (2014-15 में लगभग 0.18 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है)।
मध्यम वर्ग के लिए, ‘जैम ट्रिनिटी’ का सामूहिक अर्थ है—कम बिचौलिए, तेज़ सेवा वितरण, कम लीकेज और अपने वित्त पर अधिक नियंत्रण। यह जीवन की सुगमता को बढ़ाता है, वित्तीय सुरक्षा में सुधार करता है और डिजिटल अर्थव्यवस्था में भागीदारी को बढ़ावा देता है।
डिजिलॉकर- 2015 में शुरू किए गए ‘डिजिलॉकर’ का उद्देश्य नागरिकों के डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट में प्रामाणिक डिजिटल दस्तावेज़ों तक पहुँच प्रदान करके उनका ‘डिजिटल सशक्तिकरण’ करना है। यह मध्यम वर्ग को अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को डिजिटल रूप से, कभी भी और कहीं भी सुरक्षित रखने और उन तक पहुँचने में मदद करता है। यह कागजी कार्रवाई को कम करता है, भौतिक दस्तावेज़ों के खोने के जोखिम को समाप्त करता है और प्रवेश, बैंकिंग तथा नौकरी के आवेदनों जैसी प्रक्रियाओं को तेज करता है। इससे सुविधा बढ़ती है, समय की बचत होती है और रोजमर्रा के जीवन की सुगमता में सुधार होता है। 2 जून 2026 तक इसके कुल उपयोगकर्ताओं की संख्या 69.9 करोड़ हो चुकी है, जो कि 2015 के केवल 9.98 लाख उपयोगकर्ताओं से काफी ज़्यादा है। मई 2026 तक इसके माध्यम से 950 करोड़ से अधिक दस्तावेज़ जारी किए जा चुके हैं।
‘उमंग’ ऐप- 2017 में शुरू किया गया ‘उमंग’ (यूनिफाइड मोबाइल एप्लीकेशन फॉर न्यू-एज गवर्नेंस) ऐप भारत में मोबाइल शासन को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया था। यह केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारी निकायों की सेवाओं का लाभ उठाने के लिए एक सिंगल-विंडो मोबाइल और वेब प्लेटफॉर्म प्रदान करता है। नागरिक ‘उमंग’ ऐप का उपयोग कई प्रकार की सेवाओं के लिए करते हैं, जिनमें ईपीएफओ बैलेंस और क्लेम, पैन-आधार सेवाएं, डिजिलॉकर तक पहुंच, बिलों का भुगतान, पेंशन सेवाएं, पासपोर्ट सेवाएं, ड्राइविंग लाइसेंस सेवाएं, परीक्षा परिणाम आदि शामिल हैं। ‘उमंग’ ऐप पर पंजीकरण लगातार बढ़े हैं, जो 2017 के 0.24 करोड़ से बढ़कर 2 जून 2026 तक 11.39 करोड़ हो चुके हैं।
विकास का आधार: मध्यम वर्ग का सशक्तिकरण
पिछले बारह वर्षों में, सरकार मध्यम वर्ग के उत्थान के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध रही है। इसकी नीतियों और सुधारों ने लाखों परिवारों के लिए रोज़मर्रा की चुनौतियों को आसान बनाया है। इन्होंने वित्तीय सुरक्षा, आवास की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवा और कौशल विकास के अवसरों को मज़बूत किया है। ये प्रयास भारत की विकास गाथा में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाते हैं। निष्पक्षता और सुलभता को बढ़ावा देकर, सरकार ने मध्यम-आय वाले परिवारों के बीच अधिक विश्वास जगाया है। इस निरंतर दृष्टिकोण ने लोगों के जीवन को बेहतर बनाया है और भविष्य की प्रगति के लिए एक मज़बूत नींव रखी है।

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