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भारत की सेवा में विज्ञान के 12 वर्ष : डॉ. जितेंद्र सिंह

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जब जम्मू के डोडा जिले की एक लैवेंडर किसान मौसम के पहले फूल तोड़ती है, तब वह विज्ञान नीति के बारे में नहीं सोचती। लेकिन सच यह है कि केंद्र शासित प्रदेश की बंजर पहाड़ियों को बैंगनी फूलों की सुगंधित खेती में बदलने के पीछे पिछले एक दशक में किया गया उद्देश्यपूर्ण और दूरदर्शी वैज्ञानिक निवेश ही है। यह ग्रामीण आजीविका में आई ऐसी क्रांति है, जिसकी शुरुआत एक प्रयोगशाला से हुई थी। असल में, भारत में पिछले बारह वर्षों की विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का यही अर्थ है। विज्ञान केवल ज्ञान बढ़ाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह हमारे नागरिकों के दैनिक जीवन को बेहतर बनाने वाली एक जीवंत और प्रभावशाली शक्ति बन गया है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभाला, तब उन्होंने एक ऐसी सोच प्रस्तुत की जिसमें विज्ञान को केवल किसी विभाग का काम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मिशन माना गया। इसके बाद के वर्षों में इस दृष्टि ने ऐसे परिणाम दिए, जो एक पीढ़ी पहले असाधारण माने जाते। आज भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतार चुका है, पहली बार अपनी स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित कर चुका है, पुणे से पटना तक सुपरकंप्यूटर स्थापित कर चुका है और एक ऐसे अंतरिक्ष अर्थतंत्र का निर्माण कर चुका है जिसमें देशी स्टार्टअप्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

लेकिन इन उपलब्धियों की असली कहानी यह नहीं है कि हमने क्या हासिल किया, बल्कि यह है कि इन उपलब्धियों ने आम नागरिकों के जीवन को किस तरह प्रभावित किया। विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विकास और नागरिक सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम बन चुका है।

किसानों का उदाहरण लें। भारतीय कृषि में मौसम हमेशा से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। पिछले एक दशक में पृथ्वी अवलोकन (अर्थ ऑब्जर्वेशन) और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप आज किसानों को सटीक और स्थानीय स्तर पर मौसम की जानकारी मिल रही है। यह केवल संभावनाओं पर आधारित अनुमान नहीं, बल्कि इतनी सटीक जानकारी है कि कोई किसान परिवार यह तय कर सकता है कि फसल आज काटनी है या कल तक इंतजार करना है।

आज यदि बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवात बनता है, तो हमारी आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां तटीय समुदायों को कई घंटे, और कई बार कई दिन पहले ही सचेत कर देती हैं। इसका महत्व केवल आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता; इसका वास्तविक मूल्य उन अनगिनत जानों और आजीविकाओं में दिखाई देता है जो समय रहते बचाई जा रही हैं।

जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों और नदी घाटियों में विज्ञान ने “अरोमा मिशन” के रूप में दस्तक दी। इस कार्यक्रम के तहत किसानों को लैवेंडर की खेती से जोड़ा गया तथा उन्हें तकनीक, बेहतर बीज और बाज़ार तक पहुँच उपलब्ध कराई गई। जो पहल एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई थी, वह आज भारत की “पर्पल रिवोल्यूशन” (बैंगनी क्रांति) के रूप में जानी जाती है। इसके माध्यम से हजारों किसान परिवार सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती से सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं। इस समृद्धि के पीछे विज्ञान ने एक शांत लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई है।

इसी प्रकार के प्रयासों के तहत केसर की खेती का विस्तार, औषधीय जड़ी-बूटियों का उत्पादन और भारत में पहली बार हींग की खेती की शुरुआत की गई। इन पहलों ने साबित किया है कि यदि नवाचार जमीन से जुड़ा हो, तो वह किसी भी औद्योगिक तकनीक जितना परिवर्तनकारी हो सकता है।

विज्ञान के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा है। किफायती ग्रामीण आवास के लिए विकसित 3डी-प्रिंटेड घरों के मॉडल से लेकर खाद्य पदार्थों में मिलावट की पहचान करने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों तक, तकनीक को उन समस्याओं के समाधान के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सामना समाज के सबसे कमजोर वर्ग करते हैं।

कंप्यूटिंग, सेंसर तकनीक और इंजीनियरिंग को एक साथ जोड़ने वाले “राष्ट्रीय अंतःविषय साइबर-फिजिकल सिस्टम मिशन” के तहत देशभर में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों ने एक हजार से अधिक स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया है, जो सटीक कृषि, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान पर काम कर रहे हैं।

भारत को स्वस्थ बनाना: जैव प्रौद्योगिकी की नई क्रांति

यदि कोई क्षेत्र भारतीय विज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति को सबसे प्रभावशाली ढंग से दिखाता है, तो वह जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र है। दशकों तक भारत की फार्मास्युटिकल ताकत मुख्य रूप से विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) तक सीमित रही। हम उन दवाओं के जेनेरिक संस्करण बनाते थे, जिनकी खोज दूसरे देशों में होती थी। अब यह कहानी बदल रही है।

दशकों में पहली बार भारत में खोजी गई स्वदेशी एंटीबायोटिक “नैफिथ्रोमाइसिन” का विकास केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की घोषणा भी है। सरकार के सहयोग से शोधकर्ताओं और उद्योग जगत की साझेदारी से विकसित यह दवा इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्रयोगशालाएँ अब केवल दवाएँ बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई दवाओं की खोज और विकास के वैश्विक अग्रिम मोर्चे पर भी काम कर सकती हैं। यह वह क्षमता है जो दुनिया के केवल कुछ देशों के पास ही है।

इसी तरह एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि देश में हीमोफीलिया के लिए पहली सफल स्वदेशी जीन थेरेपी क्लीनिकल ट्रायल रही, जिसे वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में सम्पन्न किया गया। हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है जिसके उपचार के लिए मरीजों को जीवनभर महंगे इलाज की आवश्यकता होती है।

जीन थेरेपी की विशेषता यह है कि यह बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय उसके मूल आनुवंशिक दोष को ठीक करने का प्रयास करती है। आनुवंशिक रोगों के बड़े बोझ वाले भारत जैसे देश के लिए यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण है और भविष्य की चिकित्सा प्रणाली को बदलने की क्षमता रखती है।

इसके साथ-साथ “जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट” के तहत भारत की विविध आबादी से जुड़े 10,000 से अधिक मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। इससे देश में ऐसी वैज्ञानिक नींव तैयार हो रही है, जिसके आधार पर भविष्य में प्रत्येक व्यक्ति की जैविक संरचना के अनुसार व्यक्तिगत और अधिक प्रभावी उपचार उपलब्ध कराए जा सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत केवल बीमारियों का इलाज करने की दिशा में ही नहीं, बल्कि “व्यक्तिगत चिकित्सा” के उस युग की ओर बढ़ रहा है, जहां उपचार हर मरीज की आनुवंशिक विशेषताओं के अनुरूप होगा।

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घरेलू जैव-चिकित्सा (बायोमेडिकल) क्षमता कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत की प्रतिक्रिया, अपने स्वयं के टीकों का विकास करना, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और 1.4 अरब लोगों तक उन्हें पहुंचाना, हमारे जैव प्रौद्योगिकी तंत्र में वर्षों से किए गए निवेश का परिणाम थी।

इस सफलता के पीछे बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल(बीआईआरएसी) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस संस्था ने बायोटेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, शैक्षणिक शोध और व्यावसायिक उत्पादन के बीच की दूरी कम करने तथा वैज्ञानिक नवाचारों को आम लोगों तक पहुँचाने में अहम योगदान दिया है।

आज भारत में जैव-उद्यमियों की एक नई पीढ़ी उभर रही है, जो प्रिसिजन मेडिसिन, टिकाऊ जैव-आधारित सामग्री और अगली पीढ़ी की डायग्नोस्टिक तकनीकों पर काम कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नवाचार केवल अमेरिका की सिलिकॉन वैली तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से भी उभर रहा है।

इसी दिशा में जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। इस परियोजना के तहत 10,000 से अधिक भारतीयों के मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। भारत जैसी अत्यंत विविध आबादी वाले देश के लिए यह उपलब्धि भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था की मजबूत वैज्ञानिक नींव तैयार कर रही है।

इससे आने वाले समय में ऐसी स्वास्थ्य सेवाओं का मार्ग प्रशस्त होगा, जहाँ उपचार केवल बीमारी के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की विशिष्ट आनुवंशिक संरचना के अनुसार तय किया जाएगा। अर्थात भारत व्यक्तिगत चिकित्सा के नए युग की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ हर मरीज को उसकी जैविक आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सटीक और प्रभावी इलाज मिल सकेगा।

सितारों तक पहुंच, नागरिकों से जुड़ाव

23 अगस्त 2023 को जब चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर अपने अंतिम चरण में उतर रहा था, एक ऐसा क्षेत्र जहां इससे पहले कोई देश नहीं पहुँच पाया था, तब करोड़ों भारतीयों की निगाहें उस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं। लैंडिंग का वह पल केवल तकनीकी सफलता नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामर्थ्य का प्रतीक भी था। भारत ने वह कर दिखाया था जो दुनिया का कोई अन्य देश नहीं कर सका था।

इसके बाद चंद्रमा की सतह से प्राप्त जानकारियाँ और लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर से पृथ्वी पर भेजा गया वैज्ञानिक डेटा निस्संदेह अंतरिक्ष विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण वह प्रभाव भी था, जो इस उपलब्धि ने देश की नई पीढ़ी की कल्पनाओं, आकांक्षाओं और आत्मविश्वास पर डाला।

पिछले बारह वर्षों में भारत की अंतरिक्ष यात्रा महत्वाकांक्षा और जनहित के अनूठे संगम की कहानी रही है। जहाँ चंद्रयान-3 ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया, वहीं आदित्य-एल1 ने चुपचाप सूर्य का अध्ययन करने का अपना मिशन शुरू किया। यह मिशन अंतरिक्ष मौसम को समझने में मदद कर रहा है, जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी पर मौजूद उपग्रहों, बिजली ग्रिडों और संचार प्रणालियों पर पड़ता है।

इसी क्रम में स्पेडेक्स मिशन ने भारत को उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल कर दिया, जिन्होंने अंतरिक्ष में दो यानों को सफलतापूर्वक जोड़ने की क्षमता प्रदर्शित की है। यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशनों और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

वहीं शुभांशु शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिनों का ऐतिहासिक प्रवास भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन के सपनों को वास्तविकता के और करीब ले आया। यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी थी कि भारत अब मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है।

इन उपलब्धियों का महत्व केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। इन्होंने देश के युवाओं में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के प्रति नई रुचि पैदा की है तथा यह विश्वास मजबूत किया है कि भारत न केवल वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति का हिस्सा है, बल्कि उसका नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आया परिवर्तन केवल अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं है, चाहे वे कितने भी महत्वपूर्ण क्यों न हों। वर्ष 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण और ग्राउंड सिस्टम सहित पूरे अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया।

इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे, वहीं आज उनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप्स रॉकेट बना रहे हैं, उपग्रह डिजाइन कर रहे हैं और कृषि निगरानी से लेकर आपदा प्रबंधन तक अनेक क्षेत्रों के लिए तकनीकी समाधान विकसित कर रहे हैं।

भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के बाद से भारतीय प्रक्षेपण यानों ने 399 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसके चलते भारत दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों और देशों के लिए एक विश्वसनीय एवं पसंदीदा साझेदार बनकर उभरा है।

आज भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रही। यह हजारों युवा इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के प्रयासों से निर्मित एक राष्ट्रीय संपत्ति बन चुकी है। निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी ने नवाचार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।

आने वाले वर्षों के लिए भारत की योजनाएँ और भी महत्वाकांक्षी हैं। वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की परिकल्पना की गई है, जबकि वर्ष 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन भेजने का लक्ष्य रखा गया है। यह दर्शाता है कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल वर्तमान उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। इसकी महत्वाकांक्षा दीर्घकालिक है, दृष्टि स्पष्ट है और दिशा लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रही है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत का भविष्य केवल आशाजनक नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की संभावनाओं से भी परिपूर्ण दिखाई देता है।

नवाचार के माध्यम से आत्मनिर्भरता

“आत्मनिर्भर भारत” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह एक मार्गदर्शक दर्शन बन चुका है। 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ शुरू किया गया राष्ट्रीय क्वांटम मिशन केवल एक नई तकनीक में निवेश नहीं है, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास है।

क्वांटम कंप्यूटिंग ऐसी जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखती है जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटर हल नहीं कर सकते। क्वांटम संचार लगभग अभेद्य साइबर सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जबकि क्वांटम सेंसिंग नेविगेशन, चिकित्सा इमेजिंग और भू-वैज्ञानिक खोजों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। भारत अब इन सभी क्षमताओं का विकास अपने देश में ही कर रहा है। इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और उद्योगों को जोड़ने वाले विशेष थीमैटिक हब स्थापित किए गए हैं।

इसी तरह राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत पुणे, चेन्नई, खड़गपुर और अन्य शहरों में उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंगकी सुविधाएं विकसित की गई हैं। इससे भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और स्टार्टअप्स को वह कंप्यूटिंग शक्ति उपलब्ध हो रही है, जो पहले केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित थी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। “भारतजेन”, देश का पहला सरकारी वित्तपोषित बहुभाषी जनरेटिव एआई कार्यक्रम, ऐसे बड़े भाषा मॉडल विकसित कर रहा है जो भारतीय भाषाओं में सोच और संवाद कर सकें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लाभ केवल अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के हर नागरिक तक पहुँचें।

इस आत्मनिर्भरता की दृष्टि को साकार करने में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च(सीएसआईआर) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारतीय इंजीनियरों द्वारा पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित हंसा-एन.जी. प्रशिक्षण विमान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार किया गया है। यह भारत की विमानन तकनीक में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

इसी प्रकार भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संचालित पोत स्वच्छ समुद्री परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वहीं टिकाऊ विमानन ईंधन पर चल रहा शोध विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम करते हुए पर्यावरण-अनुकूल हवाई यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

सीएसआईआर इनोवेशन कॉम्प्लेक्स, देश की अपनी तरह की पहली सुविधा, ऐसी प्रयोगशाला के रूप में विकसित की गई है जहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान और उद्यमशीलता का संगम होता है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक खोजों को तेजी से बाजार में उपयोगी उत्पादों में बदलना है। इन प्रयासों के परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2014 में भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे, जबकि आज उनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि जब दूरदर्शी नीतियाँ, सार्वजनिक निवेश और उद्यमशीलता की ऊर्जा एक साथ काम करती हैं, तो असाधारण परिवर्तन संभव हो जाते हैं। आत्मनिर्भर भारत की यह यात्रा केवल तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की कहानी है जो अपने ज्ञान, नवाचार और प्रतिभा के बल पर वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की तकनीकें

भारत के वैज्ञानिक परिवर्तन की कहानी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में हुए रणनीतिक विकास का उल्लेख किए बिना अधूरी है। अप्रैल 2026 में कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की पहली क्रिटिकलिटी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह रिएक्टर पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया है। इसका विकास इंदिरा गांधी सेंटर फॉर अटॉमिक रिसर्च ने किया है, जबकि इसका निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने है।

यह रिएक्टर भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की ओर बढ़ने में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम भंडार का ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग करना है। ऐसे समय में जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, घरेलू ईंधन संसाधनों से स्वच्छ और निरंतर ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का भी प्रश्न है।

परमाणु विज्ञान का प्रभाव अब केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में भी इसका बड़ा योगदान दिखाई दे रहा है।

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल को इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी से “रेज ऑफ होप एंकर सेंटर ” के रूप में मान्यता मिलना भारत की कैंसर चिकित्सा क्षमता का वैश्विक सम्मान है। इसके साथ ही होमी भाभा कैंसर अस्पताल नेटवर्क के विस्तार और उन्नत रेडियोफार्मास्यूटिकल दवाओं के उपयोग से देशभर में कैंसर रोगियों को बेहतर और आधुनिक उपचार उपलब्ध हो रहा है। रेडियोफार्मास्यूटिकल्स ऐसी विशेष दवाएँ होती हैं जिनमें रेडियोधर्मी कणों का उपयोग कैंसर की पहचान और उपचार के लिए किया जाता है। इससे मरीजों को अधिक सटीक और प्रभावी चिकित्सा मिल पाती है।

वर्ष 2025 का शांति अधिनियम भी परमाणु क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। इस कानून ने भारत के परमाणु क्षेत्र के नियामक और कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया है तथा इस क्षेत्र में अधिक निवेश और भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया है। आने वाले वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में परमाणु ऊर्जा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

दूसरी ओर, भारत का “डीप ओशन मिशन”पृथ्वी के अंतिम बड़े अनछुए क्षेत्र-गहरे समुद्र तक देश की वैज्ञानिक पहुँच का विस्तार कर रहा है। समुद्र की गहराइयों में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स और कोबाल्ट-समृद्ध परतों जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, बैटरियों और उन्नत औद्योगिक उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। इन संसाधनों का दोहन भारत की आयातित महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता को कम कर सकता है।

इसके साथ ही यह मिशन उन्नत पनडुब्बी वाहनों, सेंसर प्रणालियों और समुद्री अनुसंधान तकनीकों का भी विकास कर रहा है। इससे भारत को अपने समुद्री क्षेत्र में वैज्ञानिक, आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु तकनीक और समुद्री विज्ञान में हो रहे ये निवेश केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि आने वाले दशकों में भारत को तकनीकी रूप से सक्षम, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

विकसित भारत की ओर: विज्ञान ही भविष्य की दिशा

जब भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी केवल इस यात्रा का सहायक साधन नहीं होंगे, बल्कि वे इसकी गति और स्वरूप दोनों निर्धारित करेंगे। पिछले बारह वर्षों में किए गए निवेशों ने केवल संस्थान और आधारभूत संरचनाएँ ही नहीं बनाई हैं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक ऐसी संस्कृति विकसित की है जो वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास से परिपूर्ण है।

अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन भारत के शोध एवं नवाचार तंत्र को नई दिशा देने के लिए किया गया है। इसका उद्देश्य मिशन-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग को मजबूत करना तथा युवा शोधकर्ताओं को सशक्त बनाना है। इसके साथ ही एक लाख करोड़ रुपये की पूंजी वाले नए “रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड” की स्थापना भारत द्वारा अपनी बौद्धिक क्षमता पर लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि देश की सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान भारत की अपनी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और समुदायों के भीतर मौजूद है।

जम्मू-कश्मीर के डोडा का लैवेंडर किसान, वेल्लोर का जीनोमिक्स शोधकर्ता, बेंगलुरु का स्पेस स्टार्टअप उद्यमी और कलपक्कम का परमाणु इंजीनियर- ये सभी एक ही कहानी के पात्र हैं। यह उस भारत की कहानी है जिसने सोच-समझकर और दृढ़ निश्चय के साथ विज्ञान को अपने विकास के केंद्र में रखा। यह कहानी केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि उस मजबूत नींव की कहानी है जो पिछले बारह वर्षों में तैयार हुई है। यह नींव व्यापक, गहरी और स्थायी है- ऐसी नींव जिस पर एक विकसित, आत्मनिर्भर और वैज्ञानिक दृष्टि से आत्मविश्वासी भारत का निर्माण होगा। विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक प्रगति का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जो ज्ञान, नवाचार, अनुसंधान और वैज्ञानिक सोच के आधार पर विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाए। पिछले वर्षों की उपलब्धियाँ इसी भविष्य की आधारशिला हैं, और आने वाले दशकों में यही विज्ञान भारत की नियति को आकार देगा।


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