रिफॉर्म एक्सप्रेस के अंतर्गत बढ़ रही न्यायिक सुगमता : अर्जुन राम मेघवाल
न्याय सदा से ही मानव सभ्यता का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण और अभिन्न स्तंभ रहा है। हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की समृद्ध परंपरा तथा उसके स्थायी प्रतीक सामूहिक रूप से उन संस्थागत व्यवस्थाओं को दर्शाते हैं जिन्होंने मानव सभ्यता की विकास यात्रा को सही मार्ग पर आगे बढ़ाया, मार्गदर्शन किया और निरंतर आगे बढ़ने में सहायता की। मानव सभ्यता के अनवरत विकास के फलस्वरूप ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से समृद्ध आधुनिक समाज में एक-दूसरे से जुड़े व्यक्तियों और समुदायों के आपसी संबंधों में भी विभिन्न विचारों और मतों के कारण परिवर्तन आया है, तथापि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी उन्नति ने देश की सीमाओं से आगे जाकर विचारों के निर्बाध आदान-प्रदान को और अधिक सुगम बनाया है। अनादि काल से, एक विचार की दूसरे विचार पर श्रेष्ठता स्थापित करने की होड़ न्यायशास्त्र के विकास की एक मजबूत नींव रही है। युगों से विचारों और मूल्यों के इस अंतर्संघर्ष के बीच न्यायिक संस्थानों ने सत्य, निष्पक्षता और विधि के शासन में लोगों के विश्वास को पुन: स्थापित करने की जिम्मेदारी निभाई है। इन्होंने एक सेतु का काम किया है जो प्रत्येक संबंधित पक्ष को, यहाँ तक कि उन लोगों को भी जो स्वयं को अलग-थलग महसूस करते हैं, न्याय और सामूहिक कल्याण की एक व्यापक प्रक्रिया से जुड़ाव, विश्वास और सहभागिता का अनुभव कराता है।
इसी स्थायी संस्थागत प्रतिबद्धता के कारण एक ऐसी सशक्त व्यवस्था निर्मित होती है जो न केवल न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करती है बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन को सरल और सुगम बनाने के लिए अनिवार्य है। वर्तमान संदर्भ में विकसित भारतीय न्यायशास्त्र ने स्वयं को आधुनिक चुनौतियों और उपलब्ध अवसरों के अनुरूप ढाल लिया है। हमारी संवैधानिक विरासत हमें स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं का स्वप्न साकार करते हुए एक समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में सतत मार्गदर्शन प्रदान करती है। संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय की त्रिवेणी अर्थात राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श संस्थाओं और व्यक्तियों दोनों के लिए एक नैतिक दिशासूचक के रूप में कार्य करते हैं।
स्वतंत्र भारत को संविधान के रूप में एक आदर्श मार्गदर्शक प्राप्त हुआ जिसने हमारे राष्ट्र की प्रगति की दिशा निर्धारित की। देश की आजादी के बाद यद्यपि हमने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, फिर भी गहरी जड़ें जमा चुकी औपनिवेशिक मानसिकता भारतीय चिंतन और मूल्यों के लिए एक बौद्धिक अवरोध बनी रही। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति, उसके बाद भारत के नागरिकों के लिए बनाए गए दंडात्मक कानून तथा विभिन्न नीतियों ने नियमों का एक जटिल जाल बुन दिया, जिसने देश की जनता की स्वतंत्रता को सीमित किया। 19वीं सदी की मानसिकता और 20वीं सदी के कानून 21वीं सदी की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते।
हमें अपनी राष्ट्रीय उपलब्धियों पर अपार गर्व है। फिर भी, जब हम मोदी सरकार की बारह वर्षों की विकास यात्रा पर नजर डालते हैं तो शासन व्यवस्था में एक स्पष्ट और सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है जिसने नागरिकों के जीवन को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। वर्ष 2014 को हमारे देश की लोकतांत्रिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में याद किया जाएगा। यह वह वर्ष था जबकि देश में युवाओं की विशाल आबादी (Demographic Dividend) को देश के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण (Development Dividend) मानने वाले तीव्र गति से विकसित हो रहे भारत की पूर्ण क्षमता को साकार करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेपों को और अधिक प्रभावी और सक्षम बनाया गया।
देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व में संपूर्ण शासन व्यवस्था ने रिफॉर्म एक्सप्रेस से प्रेरित विकास की प्रक्रिया को तेजी से अपनाते हुए सशक्तिकरण की शक्ति का परिचय दिया है। इसकी यात्रा को संक्षेप में इस प्रकार बताया जा सकता है कि यह जमीनी स्तर से ‘ईज ऑफ लिविंग’ को बढ़ावा देने का प्रयास है। साथ ही, ‘राष्ट्र प्रथम’ के दृष्टिकोण को शीर्ष स्तर से लागू करना भी इसका उद्देश्य है।
इसी प्रकार, भारत की न्यायिक सुधारों की यात्रा भी व्यापकता, नवाचार और गहन सामाजिक एवं सभ्यतागत प्रतिबद्धता की एक प्रेरक गाथा रही है। यह एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसमें विधायी आधुनिकीकरण, संस्थागत सुदृढ़ीकरण और डिजिटल नवाचार शामिल हैं।
‘ईज ऑफ जस्टिस’ हमारे लिए मात्र एक कथन नहीं है बल्कि यह एक सुधार का मंत्र है जिसमें न्याय के लिए अदालत की शरण में जाने वालों के लिए ‘ईज ऑफ इंगेजमेंट’, अधिवक्ताओं और न्यायाधिशों के लिए ‘ईज ऑफ वर्किंग’ तथा नागरिकों के लिए ‘ईज ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ शाामिल है।
न्याय हेतु अदालतों की शरण में जाने वाले नागरिकों की सुविधा के लिए DISHA योजना के तहत टेली-लॉ, न्याय बंधु और प्रो बोनो सेवाओं के विस्तार ने न्याय प्राप्ति को अत्यंत सुलभ और किफायती बना दिया है। कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के व्यापक नेटवर्क के माध्यम से संचालित टेली-लॉ कार्यक्रम के तहत ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के 112 लाख से अधिक लाभार्थियों को अदालतों में मुकदमे दायर करने से पहले मुफ्त कानूनी सलाह प्राप्त करने का लाभ मिला है। ई-फाइलिंग और ई-सेवा केंद्र की सेवाओं ने अदालत में मुकदमा दायर करने वाले व्यक्तियों और न्यायिक व्यवस्था के बीच नियमित संवाद एवं संपर्क को और अधिक सरल बनाया है। आधुनिक प्रौद्योगिकी और सामुदायिक सहभागिता के समन्वय का भारत का यह अनूठा मॉडल वैश्विक स्तर पर एक मानक के रूप में उभरा है।
अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों के लिए ‘ईज ऑफ वर्किंग’ को डिजिटल और भौतिक अवसंरचना दोनों में व्यापक विस्तार द्वारा उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया गया है। चूंकि जिला एवं अधीनस्थ न्यायपालिका देश के अधिकांश नागरिकों के लिए न्यायिक व्यवस्था का पहला संपर्क बिंदु है, अत: इसे सुदृढ़ करना एक अनिवार्य और व्यावहारिक प्राथमिकता बनी हुई है। इसी दृष्टि से, केंद्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत न्यायालय भवन, अधिवक्ता कक्षों, आवासीय इकाइयों तथा डिजिटल अवसंरचना के निर्माण पर विशेष बल दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, देश में न्यायालय भवनों की संख्या वर्ष 2014 के 15,818 से बढ़कर 22,712 हो गई है तथा अत्याधुनिक एकीकृत न्यायालय परिसरों के विकास हेतु वर्ष 2014 के बाद से अब तक 9,400.40 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 7200 करोड़ रुपए के बजटीय परिव्यय से शुरू की गई ई-कोर्ट चरण-III परियोजना का उद्देश्य न्यायालयों को पूर्णत: डिजिटल, पेपरलेस और एआई-सक्षम न्याय वितरण संस्थानों में परिवर्तित करना है। विडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाएं, वर्चुअल कोर्ट और अदालती कार्यवाही की लाईव स्ट्रीमिंग जैसी पहलों ने न्यायपालिका को लोगों के और करीब ला दिया है तथा न्याय वितरण को अधिक सुलभ, पारदर्शी और कुशल बनाया है।
भारत जैसे भाषाई विविधता वाले देश में नागरिकों के लिए ‘ईज ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ का होना ‘ईज ऑफ जस्टिस’ के व्यापक ढांचे का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर (SUVAS) और भाषिणी (Bhashini) जैसे एआई- संचालित नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग उपकरण उच्चतम न्यायालय के निर्णयों एवं आदेशों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं, जिससे आम जनता के लिए कानूनी जानकारी अधिक सुलभ हो रही है। इस प्रयास को और अधिक सशक्त बनाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) जो एक सांख्किीय एवं विश्लेषणात्मक मंच है, 340 मिलियन से अधिक अदालती आदेशों एवं उनसे संबंधित जानकारियों के विशलेषण तक एक क्लिक में पहुंच प्रदान करता है। साथ ही, सरकार शिक्षाविदों के सहयोग से सरल और सहज विधायी प्रारूपण (ड्राफ्टिंग) को बढ़ावा दे रही है ताकि कानूनों को अधिक सरल और आम नागरिकों के अनुकूल बनाया जा सके।
भारत में औपनिवेशिक दंड संहिता के स्थान पर नई आपराधिक न्याय प्रणाली को लागू करने से दाण्डिक व्यवस्था के स्थान पर न्यायिक व्यवस्था स्थापित हुई है। ई-कोर्ट, ई-प्रोसीक्यूशन, ई-प्रिजन और ई-फोरेंसिक को अपराध तथा आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम (CCTNS) के साथ जोड़ना भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी कदम है। ‘न्याय श्रुति’ प्लेटफॉर्म ने वर्चुअल उपस्थिति और गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया को इतनी कुशलता से सुगम बनाया है कि जब कोई अदालत किसी नागरिक को जमानत देती है, तो डिजिटल जमानत आदेश तुरंत जेल पोर्टल पर पहुंच जाता है जिससे कागजी कार्रवाई और प्रशासनिक देरी समाप्त हो जाती है, जो पारंपरिक रूप से समय पर रिहाई में बाधा डालती थी। यह वास्तविक समय में केस डेटा के आदान-प्रदान को सक्षम बनाता है और एक अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) का मार्ग प्रशस्त करता है।
उच्च न्यायपालिका की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भी सार्थक उपाय किए गए हैं। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या वर्ष 2014 के 906 से बढ़कर 1122 हो गई है। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या भी 31 थी जिसे वर्ष 2019 में बढ़ाकर 34 कर दिया गया है तथा उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 के माध्यम से इसे बढ़ाकर 38 कर दिया गया है। पिछले 12 वर्षों में देश के उच्च न्यायालयों में सामाजिक रूप से विविध पृष्ठभूमि वाले 1175 न्यायाधीशों की तथा उच्चतम न्यायालय में 77 न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका के समन्वित प्रयासों को दर्शाती है।
यह स्पष्ट है कि अनावश्यक कानूनों की जटिलता संबंधित पक्षों पर अनावश्यक बोझ डालती है। 40,000 से अधिक अनावश्यक अनुपालनों (Compliances) को समाप्त करने तथा औपनिवेशिक युग के 1725 निरर्थक और अप्रचलित कानूनों को निरस्त करने से विभिन्न क्षेत्रों में ईज ऑफ डुइंग बिजनेस में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। साथ ही, आर्बिट्रेशन संबंधी कानूनों को सुदृढ़ करना, इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर जैसी संस्थाओं की स्थापना तथा मेडिएशन एक्ट 2023 के माध्यम से वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को बढ़ावा देना तथा इस क्षेत्र में भारत के वैश्विक नेतृत्व को दर्शाता है।
वर्तमान में जबकि विश्व जटिल भू-राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक अनिश्चितताओं से गुजर रहा है, भारत के विधिक और राजनयिक नेतृत्व ने BRICS देशों के न्यायमंत्रियों की बैठक, 2026 के दौरान मेडिएशन और आर्बिट्रेशन को विवाद समाधान के लिए अधिक प्रभावी और सुलभ माध्यम के रूप में स्थापित करने हेतु एक सामूहिक प्रतिबद्धता के रूप में गांधीनगर घोषणा पत्र को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे वैश्विक सहयोगों का उद्देश्य न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या को कम करना, व्यापार और निवेश के लिए स्थिर एवं सुविचारित परिवेश को सृजित करने पर अत्यधिक बल देना तथा अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचना है।
ये सभी पहलें एक साझा दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि न्याय प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक जवाबदेह, सुलभ और सहयोगी शासन व्यवस्था प्राप्त हो। जैसे-जैसे हमारा देश माननीय प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित विकसित भारत @2047 की यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, हम एक ऐसे भावी न्याय प्रणाली के निर्माण के प्रति दृढ़ संकल्पित हैं जो लचीली, नवोन्मेषी, समावेशी और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक आकांक्षाओं से प्रेरित हो

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