क्लाइमेट चेंज का चुनावी मुद्दा ‘ग्रीन राजनीति की रणनीति’ – डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)


रिपोर्टर ✒️ रानू बैरागी
भारतीय राजनीति में चुनावी मुद्दे समय के साथ बदलते रहे हैं। कभी विकास, कभी महंगाई, कभी रोजगार तो कभी सुरक्षा जैसे मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहे हैं। लेकिन अब राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे केवल वैश्विक बहस तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे आम नागरिक के जीवन, आजीविका और भविष्य से जुड़ चुके हैं। क्लाइमेट चेंज आज भारत की राजनीति में न केवल एक उभरता हुआ, बल्कि बेहद निर्णायक चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है। क्लाइमेट चेंज को चुनावी मुद्दा बनाकर ग्रीन राजनीति की रणनीति अपनाना केवल पर्यावरण संरक्षण की बात नहीं है, बल्कि यह आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के हितों से जुड़ा एक दूरदर्शी राजनीतिक निर्णय भी है। भारत जैसे युवा देश में, जहां एक बड़ी आबादी रोजगार, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य की तलाश में है, वहीं ग्रामीण भारत जल संकट, फसल नुकसान और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। ऐसे में ग्रीन राजनीति इन दोनों वर्गों यानी युवा और ग्रामीण को एक साझा भविष्य के एजेंडे से जोड़ने का अवसर प्रदान करती है। आज का युवा वोटर परंपरागत भाषणों, खोखले नारों या भावनात्मक अपीलों से आसानी से प्रभावित नहीं होता। वह सवाल करता है, आंकड़े मांगता है और ठोस कार्ययोजना देखना चाहता है। रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, तकनीक का नैतिक उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की सुरक्षा उसके प्रमुख मुद्दे हैं। यही कारण है कि क्लाइमेट चेंज जैसे विषय, जब ग्रीन जॉब्स, स्टार्टअप्स, टेक्नोलॉजी इनोवेशन और नई इकॉनमी से जोड़े जाते हैं, तो वे युवाओं के लिए आशा और अवसर का प्रतीक बन जाते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण भारत के लिए क्लाइमेट चेंज कोई सैद्धांतिक या वैज्ञानिक बहस नहीं है। यह सूखे, बाढ़, गिरती कृषि उत्पादकता, जल संकट और बढ़ती अनिश्चितता के बीच रोजमर्रा का अनुभव है। किसानों की आय पर इसका सीधा असर पड़ रहा है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। ग्रीन राजनीति की रणनीति इन समस्याओं का सौर पंप, जल संरक्षण, बायोगैस, पराली से ऊर्जा उत्पादन और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन जैसे व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती है। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, क्लाइमेट चेंज का प्रभाव भारत में बहुआयामी और दीर्घकालिक है। प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं गंभीर हो रही हैं और जैव विविधता तेजी से घट रही है। हालिया चुनावों में भी यह देखा गया कि किसान असंतोष, महंगाई और युवा बेरोजगारी जैसे मुद्दों के पीछे पर्यावरणीय कारण अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद थे। यह संकेत है कि आने वाले समय में क्लाइमेट चेंज भारतीय राजनीति के केंद्र में और मजबूती से उभरेगा। ग्रीन राजनीति की रणनीति का मूल उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को विकास विरोधी नहीं, बल्कि विकास का आधार बनाना है। रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सोलर, विंड और बायोएनर्जी, भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं और इससे लाखों रोजगार सृजित हो चुके हैं। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में ग्रीन सेक्टर करोड़ों नई नौकरियों का स्रोत बन सकता है। यह न केवल युवाओं को रोजगार देगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आय के नए साधन भी पैदा करेगा। राजनीतिक दृष्टि से यह आवश्यक है कि क्लाइमेट चेंज को जटिल शब्दों और भारी-भरकम अवधारणाओं में न प्रस्तुत किया जाए। इसे स्थानीय मुद्दों, रोजमर्रा की समस्याओं और ठोस लाभों से जोड़ा जाना चाहिए। जब किसान को बताया जाए कि सोलर पंप से उसकी सिंचाई सस्ती होगी या पराली से उसे अतिरिक्त आय मिल सकती है, तब क्लाइमेट चेंज एक दूर की समस्या नहीं, बल्कि उसके जीवन का समाधान बन जाता है। भविष्य में उन्ही राजनीतिक दलों की राजनीति चलेगी जो पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने में सक्षम होंगे। ग्रीन राजनीति केवल चुनाव जीतने की रणनीति नहीं, बल्कि देश को स्थायी और सुरक्षित विकास की राह पर ले जाने का माध्यम है। यदि राजनीतिक दल इसे ईमानदारी, स्पष्टता और निरंतरता के साथ अपनाते हैं, तो यह न केवल एक मजबूत और दीर्घकालिक वोट बैंक तैयार करेगी, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और दूरदर्शी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।

The News Related To The News Engaged In The https://apnachhattisgarh.com Web Portal Is Related To The News Correspondents The Editor Does Not Necessarily Agree With These Reports The Correspondent Himself Will Be Responsible For The News.

