डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय में लोक कला महोत्सव 2026 की धूम, संस्कृति–सृजन और संघर्ष कथाओं से सजा चौथा दिन

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रिपोर्टर ✒️ सूचित कुमार मरावी

करगीकला। डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय में आयोजित लोक कला महोत्सव 2026 के चौथे दिन वार्षिक उत्सव पूरे शबाब पर नजर आया। विश्वविद्यालय परिसर सुबह से ही उत्साह, उमंग और रंग-बिरंगी लोक संस्कृतियों से सराबोर रहा। पारंपरिक परिधानों में सजे छात्र-छात्राओं ने मंच संभालते ही दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत देशभक्ति गीतों और समूह नृत्य से हुई, जिसने वातावरण में राष्ट्रप्रेम का संचार किया।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में एकल व सामूहिक नृत्य, गायन और लोक नाट्य ने विशेष आकर्षण बटोरी। छत्तीसगढ़ी, ओड़िया, बंगाली, राजस्थानी सहित विभिन्न राज्यों की लोक संस्कृतियों पर आधारित प्रस्तुतियों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को जीवंत कर दिया। नृत्यों में भाव-भंगिमा, ताल और लय का अद्भुत समन्वय देखने को मिला, वहीं गायन में सुरों की मधुरता ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। देर रात तक चले कार्यक्रमों में तालियों की गूंज और दर्शकों की निरंतर सहभागिता उत्सवमय माहौल बनाए रही।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि ब्रह्म लोक कला की परिकल्पना छत्तीसगढ़ से शुरू हुई थी और आज यह महोत्सव राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुका है। आने वाले वर्षों में इसे वैश्विक पहचान दिलाने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी का लोक कला, संस्कृति और भाषा से जुड़ाव अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित बिलासपुर के पूर्व विधायक शैलेश पांडे ने कहा कि डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय शिक्षा, संस्कृति, भाषा और तकनीक सहित विविध क्षेत्रों में कार्य करने वाला विशिष्ट संस्थान है। किसी भी शैक्षणिक संस्था का विकास उसकी समग्रता और विविधता से ही सुनिश्चित होता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की प्रगति की कामना की। इस दौरान कुलपति प्रो. प्रदीप कुमार घोष, वैशाली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. समित तिवारी, कुलसचिव डॉ. अरविंद कुमार तिवारी एवं संकुलपति डॉ. जयंती चटर्जी सहित अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।


रेखा देवार को शारदा चौबे लोक कला सम्मान

महोत्सव के दौरान प्रति वर्ष प्रदान किए जाने वाले रेखा देवार–शारदा चौबे लोक कला सम्मान से प्रसिद्ध त्योहार गायिका रेखा देवार को सम्मानित किया गया। उन्हें सम्मान पत्र के साथ नगद पुरस्कार प्रदान किया गया।


पद्म संवाद में संघर्ष और साधना की प्रेरक कथाएँ

महोत्सव के समानांतर आयोजित पद्म संवाद सत्र में छत्तीसगढ़ की पद्म सम्मानित विभूतियों ने अपने जीवन संघर्ष और अनुभव साझा किए।
लोक कला संरक्षण में विशिष्ट योगदान के लिए पद्मश्री रामलाल बैरेट ने कहा कि उनकी उपलब्धियां गुरु कृपा का परिणाम हैं और सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
आदिवासी लोक कला संरक्षण के लिए पद्मश्री अजय मांडवी ने बताया कि वे कला के माध्यम से नक्सल प्रभावित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
बिरहोर और पहाड़ी कोरबा जनजातियों के उत्थान के लिए समर्पित जागेश्वर यादव ने शिक्षा और रोजगार को भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बताया। पद्मश्री राधेश्याम बारले ने भी लोक कला के प्रति अपनी साधना साझा की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. ब्रह्मेश श्रीवास्तव ने किया।


वैचारिक सत्र: छत्तीसगढ़ी फिल्मों का संसार

वैचारिक सत्र में “छत्तीसगढ़ी फिल्मों का संसार” विषय पर सिनेमा और समाज के रिश्ते पर मंथन हुआ। वरिष्ठ फिल्म निर्माता संतोष जैन ने कहा कि फिल्म और साहित्य समाज को समझने का सशक्त माध्यम हैं। निर्देशक मनोज वर्मा और ज्ञानेश तिवारी ने सिनेमा की बदलती विषयवस्तु पर विचार रखे। भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट के संयोजक अरविंद मिश्रा ने कहा कि मनोरंजन और लोक कला के बिना समाज की समझ अधूरी है। कार्यक्रम का संचालन श्वेता पांडे ने किया।

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