मदकू के केदार द्वीप में शिव आराधना का महोत्सव संपन्न, यज्ञ पूर्णाहुति व भंडारे में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

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रिपोर्टर ✒️ मनीष अग्रवाल
सरगांव। माण्डूक्य ऋषि की तपःस्थली में आयोजित त्रिदिवसीय शिव आराधना महोत्सव महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर श्रद्धा, भक्ति और वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। महोत्सव का समापन यज्ञ की पूर्णाहुति एवं भव्य भंडारे के साथ किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता निभाई।

महोत्सव के तृतीय एवं अंतिम दिवस प्रातःकाल से ही पूजा-अर्चना का क्रम आरंभ हो गया। निर्धारित समयानुसार दो आवृत्ति रुद्राभिषेक संपन्न कराया गया, जिसमें विद्वान आचार्यों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान शिव का अभिषेक किया गया। इसके पश्चात हवन-यज्ञ का आयोजन हुआ, जिसमें क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति और जनकल्याण की कामना की गई। वैदिक परंपरा के अनुसार हवन के उपरांत पूर्णाहुति प्रदान की गई, जिसके साथ ही त्रिदिवसीय महोत्सव का विधिवत समापन हुआ।

तीनों दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन में आसपास के 40 से अधिक गांवों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे। महिलाओं, युवाओं एवं वरिष्ठजनों ने बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाई। भक्ति गीतों, भजन-कीर्तन और सत्संग से पूरा क्षेत्र शिवभक्ति की अलौकिक छटा से सराबोर रहा। समापन अवसर पर आयोजित भंडारे में हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

आयोजन को सफल बनाने में आयोजन समिति के पदाधिकारी जीवन लाल कौशिक, राममनोहर दुबे, प्रदीप शुक्ला, प्रदीप चतुर्वेदी, मनीष मिश्रा, भगवती प्रसाद मिश्र, मनीष अग्रवाल, मनीष साहू, परस साहू, प्रमोद दुबे, संतोष तिवारी, विमला सुनील साहू, नेतराम सोनवानी सहित अनेक जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामवासियों का सराहनीय योगदान रहा। समिति के सदस्यों ने पूजा-पाठ, यज्ञ, भंडारा एवं श्रद्धालुओं की सुविधाओं का सुव्यवस्थित संचालन किया।

महोत्सव के समापन पर श्रद्धालुओं ने आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इसे क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा को सुदृढ़ करने वाला बताया। पूरे परिसर में “हर-हर महादेव” के जयघोष गूंजते रहे और वातावरण शिवभक्ति की आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो उठा।

उल्लेखनीय है कि सामाजिक कार्यकर्ता स्व. शांताराम जी द्वारा श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू के प्राचीन वैभव को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की शुरुआत की गई थी। उनके प्रयासों से मदकू सहित चंदरपुर, चंद्रखुरी, दरुवनकांपा, ठेलकी, बासिन जैसे गांवों में चिकित्सा, शिक्षा एवं धार्मिक प्रकल्पों के माध्यम से सामाजिक समरसता, मेल-जोल और कुटुंब प्रबोधन का कार्य सशक्त रूप से आगे बढ़ा, जिसका प्रभाव आज भी क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

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