उत्तरप्रदेश का देश का सबसे बड़ा मांस निर्यातक राज्य होना चिंतनीय विषय – स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
वाराणसी – स्वयं को ‘असली हिन्दू’ सिद्ध करने हेतु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिये गये चालीस दिनों के अल्टीमेटम के बीस दिन कल ही पूर्ण हो चुके हैं। पर इस समय में आदित्यनाथ ने अभी तक अपने हिन्दू होने के कोई संकेत नहीं दिये हैं अपितु कालनेमि होने के ही संकेत मिले हैं। अतः आज इक्कीसवें दिन ‘परमाराध्य’ परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ‘1008’ ने योगी आदित्यनाथ की गोरक्षा के विषय पर रहस्यमयी चुप्पी और दूसरे विषयों पर मुखरता को रेखांकित करते हुये गोवंश की दुर्दशा पर गंभीर प्रश्न खड़े किये हैं। पूज्य महाराजश्री ने स्पष्ट घोषणा की है कि आज इक्कीसवें दिन से यह संघर्ष एक नये और निर्णायक मोड़ पर प्रवेश कर चुका है। जनमानस का यह स्पष्ट मत है कि किसी भी विरक्त व्यक्ति अथवा महंत को किसी धर्मनिरपेक्ष पद पर पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिये , क्योंकि यह सन्यास की मर्यादा के प्रतिकूल है। विशेष रूप से , गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले किसी भी योगी या सन्यासी के लिये प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मांस व्यापार जैसी गतिविधियों में संलिप्त होना सर्वथा अनुचित और अधार्मिक है। अतः हम समस्त अखाड़ों , महामंडलेश्वरों और महंतों से यह आह्वान करते हैं कि वे आगे आयें और शास्त्र सम्मत तर्कों के साथ इन कृत्यों की व्याख्या करें। यदि ये कृत्य शास्त्र सम्मत सिद्ध नहीं किये जा सकते , तो योगी आदित्यनाथ के इन कार्यों को ढोंग की श्रेणी में क्यों ना रखा जाये ? अब समय आ गया है कि संत समाज इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। महाराजश्री ने कहा कि इन बीस दिनों की प्रतीक्षा में सरकार ने ‘गोदान’ फिल्म को टैक्स-फ्री करने जैसा प्रतीकात्मक कार्य तो किया , लेकिन हमारी मुख्य मांगों— ‘गाय को राज्य माता घोषित करने’ और ‘गो-मांस (बीफ)निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध’— पर मौन साधे रखा। मनोरंजन को कर-मुक्त करने से कत्लखानों में कटती गोमाता की रक्षा नहीं होगी। सरकार का प्रथम कर्तव्य गोमाता को संवैधानिक सम्मान देना था , ना कि पर्दे पर समाधान खोजना। सीएम योगी अपने कुछ लोगों से कहलवा रहे कि शंकराचार्यजी बंगाल क्यों नहीं जा रहे जहां बडे पैमाने पर गोहत्या हो रही है। इस पर परमाराध्य ने भारत सरकार की ’20वीं पशुगणना’ का हवाला देते हुये कहा कि सच्चाई प्रचार के इतर कुछ और ही है। सच्चाई यह है कि पश्चिम बंगाल में गोवंश की संख्या में 15.18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है , वहीं स्वयं को गो-संरक्षक बताने वाली उत्तरप्रदेश सरकार के शासन में गोवंश 3.93 प्रतिशत घट गया है। उत्तरप्रदेश की ‘गंगातीरी’, ‘केनकथा’, ‘खैरगढ़’ और ‘मेवाती’ जैसी शुद्ध देशी नस्लें आज विलुप्ति की कगार पर हैं। आंकड़े चिल्ला रहे हैं कि जहाँ ‘धर्म’ का दिखावा है , वहां ‘धर्म का प्रतीक’ (गोमाता) कम हो रही है जो कि योगी के ढोंगी हिन्दू या कालनेमि होने के संकेत हैं। महाराजश्री ने तीखा प्रहार करते हुये कहा कि आदित्यनाथ जी ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की आड़ में उत्तरप्रदेश को देश का सबसे बड़ा मांस निर्यातक राज्य बना चुके है। भारत के कुल मांस निर्यात में प्रदेश की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत से अधिक है। साफ है कि योगी बाबा गोमाता के सम्मान से ऊपर मांस व्यापार से मिलने वाले ‘राजस्व’ को रखते हैं। मुख्यमंत्री के आचरण पर क्षोभ व्यक्त करते हुये महाराजश्री ने कहा— “यह आश्चर्यजनक है कि मुख्यमंत्री गोरक्षा पर तो ‘मौन’ हैं , लेकिन हमारे ‘शंकराचार्य’ होने के शास्त्रसम्मत सत्य पर ‘मुखर’ होकर सदन में पद की गरिमा को गिरा रहे हैं। धर्मपीठ की प्रामाणिकता किसी राजकीय प्रमाण-पत्र की मोहताज नहीं है। हम मुख्यमंत्री योगी से कहना चाहेंगे कि सदन में दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाने के बजाए स्वयं के हिन्दू होने पर बोलने के शब्द जुटाना शुरू करें।
अब आह्वान: 11 मार्च को ‘लखनऊ चलो’
बीस दिनों का मौन संवाद अब समाप्त हो चुका है , मतलब आधा समय बीत चुका है। आज इक्कीसवें दिन महाराजश्री ने देश भर के गोभक्तों से आह्वान किया है कि वे 11 मार्च 2026 को लखनऊ पहुंचने की तैयारी शुरू करें। इस समयावधि के तीस दिन पूरे होने पर एक मार्च को वे लखनऊ प्रस्थान का विवरण सार्वजनिक करेंगे। अब गोमाता को उसका अधिकार दिलाकर ही यह आंदोलन थमना चाहिये।

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