सुशासन तिहार में कथित राशि गबन का मामला फिर सुर्खियों में, रिकवरी के नाम पर नई हेराफेरी की चर्चा

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पथरिया । जनपद पंचायत पथरिया में करीब आठ महीने पहले आयोजित सुशासन तिहार की आड़ में हुए कथित राशि गबन का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। उस समय यह मामला पूरे जिले में सुर्खियों में रहा था, लेकिन अब सामने आ रही नई जानकारियों ने पूरे प्रकरण को फिर विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है। आरोप है कि गबन की गई राशि की रिकवरी दिखाने के लिए अब पंचायतों के मूलभूत विकास मद की राशि का उपयोग किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण विकास योजनाओं पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

मिली जानकारी के अनुसार सुशासन तिहार के आयोजन के दौरान पंचायतों के 15वें वित्त आयोग की राशि से विभिन्न खर्च दिखाकर कई वेंडरों के खातों में भुगतान किया गया था। बाद में जब इस खर्च पर सवाल उठे और शिकायतें जिला प्रशासन तक पहुंचीं, तब मामले की जांच शुरू की गई। जांच के बाद कथित गबन की राशि की रिकवरी करने के निर्देश दिए गए थे।

लेकिन अब आरोप लग रहे हैं कि रिकवरी की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से नहीं की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक संबंधित पंचायतों के सचिवों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे अपने पंचायत के मूलभूत मद से राशि निकालकर नकद रूप में उन वेंडरों को दें, जिनके खातों में पहले भुगतान किया गया था। इसके बाद वही वेंडर संबंधित पंचायत के नाम से चेक जारी कर रहे हैं, जिससे कागजों में यह दर्शाया जा सके कि गबन की गई राशि की रिकवरी कर ली गई है।

इस पूरी प्रक्रिया को लेकर पंचायत स्तर पर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कहा जा रहा है कि कागजी कार्रवाई के जरिए पूरे मामले को निपटाने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविकता में पंचायतों की दूसरी विकास निधियों पर बोझ डाला जा रहा है।

चौंकाने वाली बात यह भी सामने आ रही है कि कथित तौर पर कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने संबंधित सचिवों को इस मामले पर किसी से भी चर्चा नहीं करने के निर्देश दिए हैं। यहां तक कि कई मामलों में सरपंचों को भी पूरी जानकारी नहीं देने की बात कही जा रही है। इससे पंचायत प्रतिनिधियों में असंतोष की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।

पंचायत स्तर पर काम कर रहे कई सचिवों का कहना है कि उन्होंने न तो किसी प्रकार का गबन किया है और न ही वित्तीय अनियमितता में उनकी भूमिका रही है, लेकिन परिस्थितियों के चलते उन्हें इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनना पड़ रहा है। अधिकारियों के निर्देशों के चलते वे खुलकर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हैं।

दूसरी ओर कई पंचायतों के सरपंचों को इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी तक नहीं है। चुनाव के दौरान गांव के विकास का संकल्प लेकर चुने गए सरपंचों का कहना है कि पहले बिना उनकी जानकारी के 15वें वित्त आयोग की राशि से खर्च दिखाया गया और अब कथित गड़बड़ी को छिपाने के लिए पंचायतों की मूलभूत विकास निधि को ही दांव पर लगाया जा रहा है। इससे पंचायतों को दोहरी आर्थिक मार झेलनी पड़ सकती है।

यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो इसका सीधा असर गांवों में चल रही विकास योजनाओं पर पड़ सकता है। पंचायतों के मूलभूत मद से होने वाले छोटे‑छोटे निर्माण और आवश्यक कार्य प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।

अब तक की कार्रवाई

इस मामले में शिकायत मिलने के बाद जिला प्रशासन द्वारा एक जांच दल गठित किया गया था। जांच दल ने अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंप दी थी। रिपोर्ट के आधार पर जनपद पंचायत कार्यालय में पदस्थ कम्प्यूटर ऑपरेटर अनिल अमाध्या को निलंबित किया गया था, वहीं 15वें वित्त आयोग के प्रभारी शिव चंद्राकर का स्थानांतरण कर दिया गया था।

इसके बाद जिला पंचायत मुंगेली के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रभाकर पांडे ने गबन की राशि की रिकवरी और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की बात कही थी। हालांकि समय बीतने के साथ मामला धीरे‑धीरे ठंडे बस्ते में जाता नजर आया।

बताया जा रहा है कि अब तक इस मामले में थाने में एफआईआर दर्ज कराने के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं। इस कारण कानूनी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई है।

महीनों बाद शिकायतकर्ता दीपक साहू ने एक बार फिर कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर कार्रवाई में ढिलाई की शिकायत की। इसके बाद कथित तौर पर रिकवरी दिखाने की कवायद तेज हुई, लेकिन अब उसी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि 15वें वित्त आयोग की राशि से बने गड्ढे को भरने के लिए अब पंचायतों के मूलभूत विकास मद में नया गड्ढा किया जा रहा है। यदि प्रशासन जल्द पारदर्शी कार्रवाई नहीं करता, तो यह मामला आने वाले दिनों में और बड़ा विवाद बन सकता है।

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