धान घोटाले में ‘डिजिटल डाका’! कंप्यूटर ऑपरेटर ने किसानों के नाम पर डकारे लाख, अफसरों की चुप्पी से ‘सिस्टम’ पर सवाल – FIR कौन दबा रहा?
रिपोर्टर ✒️ रूपचंद रॉय
बिलासपुर से ‘साइबर सेंधमारी’ की सनसनीखेज खबर
सहकारिता विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें अब डिजिटल हो गई हैं। मस्तुरी ब्लॉक की सेवा सहकारी समिति ओखर में धान खरीदी के नाम पर हुए ‘कंप्यूटर घोटाले’ ने सबको हिला दिया है। लाखों का गबन, फर्जी एंट्री और पैसा सीधे अपने खाते में… और इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड निकला समिति का कंप्यूटर ऑपरेटर नरेन्द्र कुमार पटेल।
लेकिन असली खेल तो अब शुरू हुआ है — उच्च अफसरों के लिखित आदेश के 1 महीने बाद भी FIR क्यों नहीं? आखिर किस ‘ऊपर वाले’ का हाथ है दागी ऑपरेटर के सिर पर?
क्या है पूरा ‘धान डाका’ का काला चिट्ठा?
उप आयुक्त सहकारिता बिलासपुर के आदेश क्रमांक 505, दिनांक 09/04/2026 ने पूरी पोल खोल दी। जांच में सामने आया कि:
1. तारीख के बाद भी ‘खेल’ जारी:
05 फरवरी 2026 को धान खरीदी बंद हो चुकी थी। रिकॉर्ड में कुल खरीदी 40,135 क्विंटल दर्ज थी। लेकिन ऑपरेटर नरेन्द्र ने 07 मार्च को सिस्टम में सेंध लगाकर आंकड़ा 40,454 क्विंटल कर दिया। यानी बंद दुकान में भी 319 क्विंटल धान ‘खरीद’ लिया!
2. किसानों के नाम पर ‘फर्जीवाड़ा’:
कृषक हरिराम और लखेश्वर रजक के नाम पर फर्जी धान खरीदी की एंट्री ठोक दी। धान आया नहीं, लेकिन कागजों में आ गया।
3. पैसा सीधा अपनी जेब में:
सबसे शातिर चाल – फर्जी एंट्री का पूरा भुगतान ऑपरेटर ने सीधे अपने बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिया और निकाल भी लिया। किसानों का हक, ऑपरेटर की तिजोरी में।
अफसरों का आदेश हवा, ‘दागी’ पर मेहरबानी क्यों?
उप आयुक्त सहकारिता ने साफ-साफ 3 निर्देश दिए थे:
तत्काल बर्खास्त करो – नरेन्द्र कुमार पटेल को पद से हटाओ
पैसा वसूलो – गबन की पूरी राशि की भरपाई कराओ
जेल भेजो – थाने में FIR दर्ज कराओ
लेकिन आदेश निकले 1 महीने से ज्यादा हो गया, न बर्खास्तगी, न वसूली, न FIR। प्राधिकृत अधिकारी आखिर किसके इशारे पर कुंडली मारकर बैठा है?
सबसे बड़ा सवाल – ‘संरक्षक’ कौन?
जब ऊपर से कार्रवाई का आदेश आ चुका है, तो नीचे क्यों दबाया जा रहा है?
क्या ऑपरेटर अकेला था या पीछे कोई ‘बड़ा मगरमच्छ’ है?
क्या गबन का पैसा ऊपर तक बंटा है?
क्या प्राधिकृत अधिकारी की जेब भी गर्म की गई है?
क्या पूरे रैकेट का पर्दाफाश हो जाएगा, इस डर से FIR रोकी गई है?
विभागीय सूत्रों की मानें तो इस ‘डिजिटल डाके’ में कई सफेदपोश शामिल हो सकते हैं। अगर निष्पक्ष जांच हुई तो कई कुर्सियां खाली हो जाएंगी।
जनता पूछ रही है – कब जागेगा प्रशासन?
किसानों की खून-पसीने की कमाई पर डाका डालने वाला खुला घूम रहा है और सिस्टम आंख मूंदे बैठा है। क्या बिलासपुर कलेक्टर इस मामले में दखल देंगे? क्या दागी ऑपरेटर और उसे बचाने वाले ‘संरक्षक’ पर गाज गिरेगी?
फिलहाल ओखर समिति का यह ‘धान घोटाला’ सहकारिता विभाग के मुंह पर कालिख पोत रहा है। अब देखना है कि FIR की स्याही कब सूखती है, या फिर फाइल ही दबा दी जाती है।


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