एक नन्ही चिड़िया का साहस

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✍️ लेखक : पुरुषोत्तम दास घृतलहरे

एक विशाल, घना, छायादार और फल-फूलों से भरपूर जंगल था, जिसमें अनेक प्रकार के पशु-पक्षी सुख-शांति से निवास करते थे।
एक दिन अचानक उस जंगल में भीषण आग लग गई। आग इतनी भयंकर थी कि उसके शांत होने की कोई आशा दिखाई नहीं दे रही थी। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई और सभी जीव अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे।

उसी समय एक नन्ही चिड़िया, जो जंगल के पास स्थित सरोवर से अपनी छोटी-सी चोंच में पानी भरकर लाती और आग में डाल देती। वह बार-बार यही कार्य कर रही थी—उड़कर पानी लाना और आग पर डालना।

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जंगल के बड़े-बड़े जानवर उसके इस प्रयास को देखकर हँसते और उसे तुच्छ समझते हुए अपनी जान बचाने में लगे रहते। तभी एक बंदर से रहा नहीं गया। उसने चिड़िया से कहा—
“यह क्या मूर्खता है? तेरी चोंच भर पानी से इस भयानक आग पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जब बड़े-बड़े जीव अपनी जान बचाने में लगे हैं, तो तू क्यों अपनी जान जोखिम में डाल रही है?”

चिड़िया ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“मरना तो एक दिन सभी को है, लेकिन जब इस जंगल की आग का इतिहास लिखा जाएगा, तब मेरा नाम आग बुझाने वालों में लिखा जाएगा, न कि तमाशा देखने या केवल अपनी जान बचाने वालों में।”

संदेश:
मानव समाज को इस नन्ही चिड़िया से कर्तव्यनिष्ठा, साहस और वफादारी का पाठ सीखना चाहिए। सच्चा प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो।

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