साहित्य अकादमी की चुप्पी,अधिक शर्मनाक गंभीरऔर दुर्भाग्य जनक है- गणेश कछवाहा

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कई दिनों से संत गुरु घासी दास विश्व विद्यालय बिलासपुर छत्तीसगढ़ के कुलपति आदरणीय आलोक चक्रवाल के, दंभपूर्ण , पद की गरिमा के विपरीत,असभ्य आचरण की निंदा चारों तरफ हो रही है। हर सभ्य व्यक्ति अन्याय व गलत व्यवहार की कड़ी निंदा करेगा ही। व्यक्ति पद से बड़ा नहीं होता, चरित्र,सभ्यआचरण, व सद विचारों से महान होता।

साहित्य अकादमी का संयुक्त आयोजन था। सुप्रसिद्ध कहानी कर श्री मनोज रूपड़ा आमंत्रित अतिथि वक्ता थे,मैं सोच रहा था कि अकादमी का कुछ अधिकृत बयान आएगा। साहित्यकार के सम्मान की रक्षा के लिए उचित हस्तक्षेप होगा। लेकिन मेरे संज्ञान में अभी तक साहित्य अकादमी का कोई बयान नहीं आया है। साहित्य अकादमी चुप्पी अधिक शर्मनाक ,गंभीर और दुर्भाग्य जनक है।

लगता है बाजारवाद हिस्सा हो गया है,जहां कला, संगीत,साहित्य,सभ्यता,आदर्श, नैतिक मूल्य सब कुछ बाजार में बेची जाने वाली वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।सब कुछ पैसे से तौला ,बेचा व खरीदा जाता है।

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साहित्य अकादमी का उसी क्षण तात्कालिक हस्तक्षेप बहुत जरूरी था।अभी भी साहित्य अकादमी के आत्मसम्मान के लिए एक आवश्यक बयान व हस्तक्षेप जरूरी प्रतीत होता है।

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