संघर्ष भरे जीवन से सफलता तक पहुँचीं लखपति दीदी ललिता साहू
• फ्लाई ऐश ब्रिक्स व्यवसाय से नई पहचान बना रहीं ललिता साहू
• मेहनत और समूह के सहयोग से बदली तकदीर, बनीं आत्मनिर्भर
रिपोर्टर✒️कमलेश सिंह । कवर्धा । यह कहानी है छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले की रहने वाली ललिता साहू की, जिन्होंने अपनी मेहनत और जय मां महामाया स्व-सहायता समूह के सहयोग से अभावों के जीवन को पीछे छोड़कर “लखपति दीदी” बनने का गौरव हासिल किया। समूह से जुड़कर उन्होंने न केवल अपने जीवन की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाया, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम भी उठाया। आज वे फ्लाई ऐश ब्रिक्स के कार्य से अच्छी आय अर्जित कर अपने परिवार का जीवन स्तर सुधार रही हैं।

समूह से जुड़ने से पहले ललिता साहू का जीवन काफी संघर्षपूर्ण था। परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें मजदूरी का सहारा लेना पड़ता था। आय का कोई स्थायी साधन नहीं होने के कारण घर की आवश्यकताओं को पूरा करना और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाना उनके लिए काफी कठिन हो जाता था। उस समय उनकी कुल वार्षिक आय लगभग 80 हजार रुपये थी, जिसमें कृषि, पशुपालन और मजदूरी से होने वाली आय शामिल थी। सीमित आय के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और भविष्य को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती थी।
ललिता साहू के जीवन में बदलाव की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने जय मां महामाया स्व-सहायता समूह से जुड़ने का निर्णय लिया। समूह की नियमित बैठकों में भाग लेने से उन्हें बचत की आदत के साथ-साथ आर्थिक प्रबंधन और विभिन्न आजीविका गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी। समूह से जुड़कर उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ा और कुछ नया करने की प्रेरणा मिली। समूह के माध्यम से उन्हें आर्थिक सहायता भी प्राप्त हुई। उन्हें चक्रीय निधि से 4 हजार रुपये तथा सामुदायिक निवेश कोष से 15 हजार रुपये की राशि मिली। इसके बाद उनकी कार्यक्षमता और लगन को देखते हुए बैंक लिंकेज के माध्यम से 2 लाख रुपये का ऋण भी उपलब्ध कराया गया। ललिता साहू ने इस राशि का उपयोग फ्लाई ऐश ब्रिक्स (ईंट निर्माण) के व्यवसाय को शुरू करने में किया।
शुरुआत में यह कार्य उनके लिए नया था, लेकिन समूह और ग्राम संगठन के सहयोग से उन्हें व्यवसाय संचालन और बाजार से जुड़ी आवश्यक जानकारी मिली। धीरे-धीरे उनका कार्य बढ़ने लगा और आय में भी लगातार वृद्धि होने लगी। पहले जहां परिवार की कुल वार्षिक आय लगभग 80 हजार रुपये थी, वहीं अब उनकी आय बढ़कर करीब 3 लाख 30 हजार रुपये प्रतिवर्ष हो गई है। आज ललिता साहू आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी अच्छे से हो रही है। ललिता साहू बताती हैं कि स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें हर महीने लगभग 20 से 25 हजार रुपये तक की आय होने लगी है। उनकी यह सफलता कहानी साबित करती है कि यदि महिलाओं को सही मार्गदर्शन, अवसर और सहयोग मिले तो वे अपने जीवन में बड़े बदलाव ला सकती हैं और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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