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5 डिसमिल जमीन पर प्रतिबंध और अवैध प्लाटिंग का खेल, प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

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कैबिनेट के स्पष्ट आदेश के बावजूद मुंगेली में 5 डिसमिल भूमि की रजिस्ट्री ठप, अवैध कॉलोनियों में डायवर्सन को लेकर भी चर्चा तेज

मुंगेली। छत्तीसगढ़ में पिछले एक वर्ष के दौरान राज्य सरकार द्वारा कैबिनेट में लिए गए कई महत्वपूर्ण फैसलों के क्रियान्वयन को लेकर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। इनमें सबसे अधिक चर्चा 5 डिसमिल भूमि की रजिस्ट्री से जुड़े निर्णय को लेकर हो रही है। राज्य सरकार के कैबिनेट निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि 5 डिसमिल भूमि, चाहे वह किसी भी प्रकृति की हो, उसका विक्रय और नामांतरण किया जा सकेगा। इसके बावजूद मुंगेली जिले में इस आदेश को प्रभावी रूप से लागू नहीं किए जाने की बात सामने आ रही है।

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि यदि इस आदेश को सही तरीके से लागू किया जाता तो जिले को राजस्व के रूप में करोड़ों रुपये की आय हो सकती थी। लेकिन आदेश के प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होने के कारण न केवल लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि संभावित राजस्व हानि की स्थिति भी बन रही है।

इधर जिले में अवैध प्लाटिंग का मुद्दा भी लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। जानकारी के अनुसार अवैध कॉलोनियों के खिलाफ समय-समय पर एसडीएम कार्यालय द्वारा कार्रवाई करते हुए संबंधित प्लॉटों की रजिस्ट्री पर रोक लगाने की बात कही जाती रही है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि जिन क्षेत्रों में अवैध प्लाटिंग को लेकर कार्रवाई की गई, उन्हीं क्षेत्रों में बाद में भूखंडों के डायवर्सन की प्रक्रिया जारी रही।

इस स्थिति को लेकर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं कॉलोनियों में बिके प्लॉटों के डायवर्सन को लेकर चर्चाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक स्तर पर दोहरी व्यवस्था अपनाई जा रही है।

प्रदेश के अन्य जिलों में भी अवैध प्लाटिंग और नगर निकायों द्वारा गलत एनओसी जारी किए जाने के मामलों को लेकर जनप्रतिनिधियों और विधायकों ने विधानसभा में मुद्दा उठाया है और कई मामलों में कार्रवाई भी हुई है। लेकिन मुंगेली जिले में इस तरह के मामलों में अपेक्षित सख्ती देखने को नहीं मिल रही है।

बताया जाता है कि मुंगेली जिले में अवैध प्लाटिंग का इतिहास लगभग 8 से 10 वर्षों पुराना है। इस दौरान कई स्थानों पर बिना नियमानुसार स्वीकृति के कॉलोनियां विकसित की गईं। जानकारों का मानना है कि यदि इन मामलों की निष्पक्ष जांच की जाए तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि अवैध प्लाटिंग के मामलों में कार्रवाई के बाद उन भूखंडों की रजिस्ट्रियों को शून्य करने के बजाय विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से डायवर्सन किए जाने के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यदि इन सभी मामलों की विस्तार से जांच की जाए तो प्रशासनिक स्तर पर हुई प्रक्रियाओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार आने वाले समय में इस पूरे मामले से जुड़े कई दस्तावेज और आंकड़े सामने आ सकते हैं। बताया जा रहा है कि पिछले लगभग 13 वर्षों के दौरान एसडीएम कार्यालय में अवैध प्लाटिंग के नाम पर की गई कार्रवाइयों का विवरण तैयार किया जा रहा है। इसमें यह भी सामने लाने की तैयारी है कि किन मामलों में कार्रवाई के बाद रजिस्ट्रियों को निरस्त करने के बजाय डायवर्सन की अनुमति दी गई।

स्थानीय स्तर पर इस विषय को लेकर चर्चा तेज हो गई है और लोग प्रशासन से पारदर्शिता तथा निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि इस पूरे मामले की गहराई से जांच होती है तो अवैध प्लाटिंग और प्रशासनिक कार्यप्रणाली से जुड़े कई पहलुओं पर बड़ा खुलासा सामने आ सकता है।

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