बिना विभागीय जांच सेवा से बर्खास्तगी अवैध, हाईकोर्ट ने उमराव सिंह ठाकुर के पक्ष में दिया फैसला

0
IMG-20260317-WA0532

रिपोर्टर ✒️ रूपचंद रॉय


जेल प्रहरी की याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट सख्त, 7 साल के संघर्ष के बाद मिली राहत; शासन की अपील खारिज

बिलासपुर/अंबिकापुर । बिना विभागीय जांच किसी भी शासकीय कर्मचारी को सेवा से पृथक नहीं किया जा सकता और उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए—इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराते हुए उच्च न्यायालय ने जेल प्रहरी उमराव सिंह ठाकुर के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने शासन द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को राहत दी है।

मामले के अनुसार उमराव सिंह ठाकुर वर्ष 2009 में जेल प्रहरी के पद पर नियुक्त हुए थे। सेवा अवधि के दौरान उन्होंने समय-समय पर अवकाश लेकर पारिवारिक कारणों से अपने घर पर समय बिताया। अवकाश अवधि के दौरान पारिवारिक कारणों से ड्यूटी पर लौटने में विलंब हो गया, जिसे विभाग द्वारा स्वीकार नहीं किया गया।

आरोप है कि बिना किसी विभागीय जांच और बिना पक्ष सुने ही वर्ष 2018 में उन्हें सेवा से पृथक कर दिया गया। इसके खिलाफ उमराव सिंह ठाकुर ने अपने अधिवक्ता रवि भगत के माध्यम से उच्च न्यायालय बिलासपुर में वर्ष 2019 में WPS क्रमांक 10147/2019 के तहत याचिका दायर की।

10 साल चली सुनवाई, 2025 में मिला पहला फैसला

मामले की सुनवाई लंबी अवधि तक चली और अंततः 7 अगस्त 2025 को उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश पारित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना विभागीय जांच कर्मचारी को सेवा से हटाना नियमों के विपरीत है।

आदेश के बाद भी नहीं हुई बहाली

न्यायालय के आदेश के पालन में याचिकाकर्ता ने 19 अगस्त 2025 को केंद्रीय जेल अधीक्षक अंबिकापुर के समक्ष उपस्थित होकर आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सेवा में पुनः बहाल नहीं किया गया।

अवमानना याचिका और शासन की अपील भी खारिज

इस पर याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। वहीं शासन की ओर से भी इस आदेश के खिलाफ रिट अपील प्रस्तुत की गई।

मामले की अंतिम सुनवाई 17 मार्च 2026 को मुख्य न्यायाधीश की डिविजन बेंच में हुई, जहां न्यायालय ने शासन की अपील को खारिज कर दिया और पूर्व आदेश को बरकरार रखा।

7 साल के संघर्ष के बाद मिला न्याय

इस तरह उमराव सिंह ठाकुर ने अपनी सेवा में पुनः बहाली के लिए करीब 7 वर्षों तक कानूनी संघर्ष किया और अंततः न्यायालय से उनके पक्ष में निर्णय प्राप्त हुआ।

न्यायालय के इस फैसले को शासकीय कर्मचारियों के अधिकारों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि बिना उचित प्रक्रिया और विभागीय जांच के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest News

error: Content is protected !!