सीजेरियन डिलीवरी का बढ़ता चलन: स्वास्थ्य सेवा या मुनाफे का कारोबार?
अक्षय लहरे प्रधान संपादक अपना छत्तीसगढ़
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र से एक सकारात्मक खबर सामने आई है कि अब लगभग 90 प्रतिशत बच्चों का जन्म अस्पतालों में हो रहा है। यह आंकड़ा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, सरकारी योजनाओं के विस्तार और स्वास्थ्य सुविधाओं तक लोगों की बेहतर पहुंच को दर्शाता है। इसी तरह देश की प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) घटकर 2.0 पर पहुंचना भी परिवार नियोजन के प्रति समाज में आई जागरूकता का संकेत है। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा आंकड़ा भी सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है।
नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-6) के अनुसार देश के निजी अस्पतालों में 54 प्रतिशत प्रसव सीजेरियन पद्धति से हो रहे हैं। कुछ राज्यों में यह स्थिति और भी गंभीर है। पश्चिम बंगाल में लगभग 88 प्रतिशत तथा तेलंगाना में 84 प्रतिशत प्रसव सीजेरियन के माध्यम से कराए जा रहे हैं। यह आंकड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार केवल 10 से 15 प्रतिशत मामलों में ही सीजेरियन डिलीवरी की वास्तविक आवश्यकता होती है।
प्रश्न यह उठता है कि जब अधिकांश गर्भवती महिलाएं सामान्य प्रसव के लिए सक्षम होती हैं, तब निजी अस्पतालों में आधे से अधिक प्रसव ऑपरेशन के जरिए क्यों कराए जा रहे हैं? क्या वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में चिकित्सकीय जटिलताएं मौजूद हैं, या फिर इसके पीछे कोई और कारण है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे आर्थिक हित एक बड़ा कारण हो सकता है। सामान्य प्रसव की तुलना में सीजेरियन डिलीवरी अधिक महंगी होती है। इसमें अस्पतालों को अधिक शुल्क, ऑपरेशन थिएटर का उपयोग, अतिरिक्त दवाइयों और लंबे समय तक भर्ती रखने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि कई बार ऐसी परिस्थितियों में भी ऑपरेशन की सलाह दी जाती है, जहां सामान्य प्रसव संभव होता है।
भारत में स्वास्थ्य बीमा कवरेज लगातार बढ़ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के लोग भी अस्पतालों में उपचार कराने लगे हैं। लेकिन इसी व्यवस्था का कुछ निजी संस्थान लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जब अस्पतालों को पता होता है कि खर्च का भुगतान बीमा कंपनी या सरकारी योजना के माध्यम से हो जाएगा, तब मरीजों पर महंगे उपचार के लिए दबाव बनाने की आशंका बढ़ जाती है।
सीजेरियन डिलीवरी केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मां और नवजात दोनों के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है। अनावश्यक ऑपरेशन से संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव, भविष्य में गर्भधारण संबंधी जटिलताओं और मानसिक तनाव का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा स्वास्थ्य व्यवस्था पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
सरकार और स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं को इस प्रवृत्ति की गंभीरता से जांच करनी चाहिए। अस्पतालों में होने वाले सीजेरियन प्रसवों का नियमित ऑडिट होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऑपरेशन केवल चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर ही किया जाए। साथ ही गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों को सामान्य प्रसव के लाभों के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है।
भारत ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन यदि चिकित्सा सेवाएं मुनाफे के दबाव में संचालित होने लगें, तो यह चिंता का विषय है। स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य जीवन बचाना और बेहतर स्वास्थ्य प्रदान करना है, न कि मरीजों की मजबूरी को आर्थिक अवसर में बदलना। इसलिए समय रहते इस बढ़ती प्रवृत्ति पर नियंत्रण आवश्यक है, ताकि चिकित्सा व्यवस्था में लोगों का विश्वास बना रहे और मातृत्व सुरक्षित एवं सम्मानजनक बन सके।

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