अमरकंटक में नौ दिवसीय गूंजती रही श्रीराम कथा की अमृतधारा ,
मनु-सतरूपा प्रसंग और माता कौशल्या के आदर्शों ने किया भावविभोर
संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय

अमरकंटक – मां नर्मदा की उद्गम स्थली / पवित्र पावन नगरी अमरकंटक स्थित मृत्युंजय आश्रम में चल रही नौ दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा महोत्सव श्रद्धा , भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ कथा का आज समापन हुआ । मृत्युंजय आश्रम परिसर में प्रतिदिन श्रद्धालुओं की उपस्थिति में श्रीराम नाम की अमृतधारा प्रवाहित होती रही । कथा के दौरान भजन , कीर्तन एवं श्रीराम जयघोष से संपूर्ण वातावरण भक्तिमय बना रहा ।

दिल्ली से पधारे प्रख्यात कथा वक्ता ‘श्रीराम जी बापू’ (पंडित रमाकांत मिश्र) ने व्यासपीठ से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के दिव्य चरित्र , सनातन संस्कृति के आदर्शों तथा धर्म के मूल सिद्धांतों का अत्यंत भावपूर्ण एवं संगीतमय शैली में वर्णन किया ।
यह श्रीराम कथा 05 अगस्त 2026 दिन बुधवार (श्रावण कृष्ण पक्ष सप्तमी , अश्विनी नक्षत्र) से प्रारंभ होकर 13 अगस्त 2026 दिन गुरुवार (श्रावण शुक्ल प्रतिपदा , आश्लेषा नक्षत्र) तक निरंतर चली । समापन अवसर पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन , पूजन , पूर्णाहुति , कन्या पूजन , संत तथा ब्राह्मण प्रसादी का आयोजन किया गया ।
मनु-सतरूपा की भक्ति बनी भगवान के अवतार का कारण
कथा के दौरान श्रीराम जी बापू ने मनु-सतरूपा के अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायी प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि जब भगवान विष्णु मनु महाराज की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देने पहुंचे तब मनु महाराज ने भगवान के समान पुत्र प्राप्ति की कामना व्यक्त की ।
भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा कि उनके समान पुत्र कहां मिलेगा , इसलिए वे स्वयं ही पुत्र रूप में अवतरित होंगे । इसके पश्चात भगवान ने माता सतरूपा से भी वरदान मांगने को कहा । सतरूपा ने वही इच्छा व्यक्त की जो मनु महाराज की थी । उनकी निष्काम भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें भी मातृत्व का दिव्य वरदान प्रदान किया ।
कथा व्यास जी ने कहा कि सच्ची श्रद्धा , निष्काम भक्ति और समर्पण भाव से की गई साधना कभी निष्फल नहीं जाती । भक्त जिस भाव से भगवान को स्मरण करता है , भगवान उसी भाव से उसकी पुकार स्वीकार करते हैं ।
माता कौशल्या के धैर्य, करुणा और मर्यादा का भावपूर्ण वर्णन
कथा के दौरान माता कौशल्या के आदर्श चरित्र का वर्णन करते हुए श्रीराम जी बापू ने कहा कि माता कौशल्या भारतीय संस्कृति में मातृत्व , त्याग , धैर्य और मर्यादा की सर्वोच्च प्रतीक हैं । जब कैकेयी के वरदान के कारण भगवान श्रीराम को वनवास जाना पड़ा , तब भी माता कौशल्या ने अपने धैर्य , संतुलन और सौम्यता को नहीं छोड़ा ।
उन्होंने कहा कि पुत्र-वियोग जैसी अत्यंत पीड़ादायक परिस्थिति में भी माता कौशल्या धर्म और मर्यादा के मार्ग से विचलित नहीं हुईं ।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपनी वाणी , व्यवहार और संस्कारों की गरिमा बनाए रखनी चाहिए ।
कथा व्यास ने कहा कि धैर्य ही वास्तविक शक्ति है और माता कौशल्या का चरित्र प्रत्येक परिवार एवं समाज के लिए प्रेरणास्रोत है ।
नैमिषारण्य की महिमा और वनवास प्रसंगों का वर्णन
श्रीराम जी बापू ने कथा के मध्य नैमिषारण्य की पवित्रता तथा भगवान श्रीराम की वनयात्रा से जुड़े अनेक प्रसंगों का भी वर्णन किया । उन्होंने भगवान द्वारा कंद-मूल और फलों के सेवन के प्रसंग के माध्यम से भारतीय जीवन दर्शन में सादगी , संयम , संतोष और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को समझाया ।
उन्होंने संचित कर्म , प्रारब्ध कर्म और वर्तमान कर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन उसके कर्मों से निर्मित होता है । सत्कर्म भविष्य को उज्ज्वल बनाते हैं तथा पूर्व जन्मों और पूर्व कर्मों का प्रभाव भी जीवन में परिलक्षित होता है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सत्य , सेवा , सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए ।
रामकथा जीवन जीने की कला सिखाती है
कथा व्यास ने कहा कि श्रीराम कथा केवल भगवान श्रीराम के जीवन का वर्णन नहीं है , बल्कि यह मानव जीवन को मर्यादा , कर्तव्य , सेवा , त्याग , सत्य और संस्कारों का मार्ग दिखाने वाली दिव्य जीवन-दृष्टि है ।
उन्होंने और कहा कि सनातन धर्म की परंपराएं केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं हैं , बल्कि उनमें मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने का गहन दर्शन समाहित है । भगवान श्रीराम का चरित्र हमें प्रत्येक परिस्थिति में धर्म और मर्यादा का पालन करने की प्रेरणा देता है ।
संतों के सान्निध्य में संपन्न हुआ आयोजन
अमरकंटक स्थित शांति कुटी आश्रम के श्रीमहंत स्वामी रामभूषण दास जी महाराज ने बताया कि यह नौ दिवसीय श्रीराम कथा महामंडलेश्वर स्वामी हरिहरानंद जी महाराज के पावन सान्निध्य में संपन्न हुई । प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए उपस्थित होते रहे ।
कथा स्थल पर भक्ति गीतों , मधुर भजनों और भगवान श्रीराम के जयघोष से दिव्य आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो रहा था । मां नर्मदा की पावन धारा के सान्निध्य में आयोजित यह धार्मिक महोत्सव श्रद्धालुओं के लिए आस्था , अध्यात्म और सनातन संस्कृति के त्रिवेणी संगम का अनुपम अनुभव बन गया ।

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