भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता, नियमों की अनदेखी कर अपात्र को चयन; अवमानना की आशंका

0
IMG_20260215_173655_642

मुंगेली। जिले में आयोजित एक शैक्षणिक संस्थान की भर्ती प्रक्रिया अब गंभीर विवाद और कानूनी संकट के घेरे में आ गई है। प्रार्थी बसंत कुमार ने भर्ती प्रक्रिया में नियमों के खुले उल्लंघन, पात्र अभ्यर्थी की अनदेखी और अपात्र को लाभ पहुंचाने के आरोप लगाए हैं। मामले में संचालनालय के निर्देशों से लेकर माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों तक की अवहेलना का दावा किया गया है, जिसे अवमानना की श्रेणी में माना जा सकता है। संचालनालय के पत्र क्रमांक 1438 दिनांक 12 मार्च 2019 के अनुसार जिन पदों के लिए CTI/ATI अनिवार्य है, वहां सर्वप्रथम CTI/ATI उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की पृथक मेरिट सूची बनाना आवश्यक है। आरोप है कि प्राचार्य मुंगेली ने प्रेस विज्ञप्ति में नियमों से हटकर “ITI/डिप्लोमा/डिग्री” शब्द जोड़ दिए, जिससे मूल मेरिट व्यवस्था को प्रभावित किया गया और CTI/ATI धारकों को पीछे किया गया।
इसी तरह शपथ पत्र से जुड़े नियमों में भी कथित रूप से जानबूझकर शब्दों का हेरफेर किया गया। संयुक्त संचालक की 5 अगस्त 2024 की बैठक में स्पष्ट किया गया था कि आवेदन अथवा शपथ पत्र में हस्ताक्षर न होने पर आवेदन अमान्य होगा, लेकिन विज्ञप्ति में “अथवा” को बदलकर “एवं” कर दिया गया। इससे योग्य अभ्यर्थियों को तकनीकी आधार पर बाहर करने का रास्ता तैयार किया गया।
चयन प्रक्रिया में यह भी सामने आया है कि चयनित अभ्यर्थी SCVT उत्तीर्ण है, जबकि संयुक्त संचालक के निर्णय अनुसार SCVT आवेदकों के आवेदन मान्य नहीं किए जाने थे। दूसरी ओर, प्रार्थी NCVT उत्तीर्ण है तथा उसके पास CITS/ATI का उच्च प्रमाण-पत्र और तीन वर्ष का अनुभव होने के बावजूद उसे अपात्र घोषित कर दिया गया। इसे ‘अयोग्यता को वरीयता’ देने का स्पष्ट उदाहरण बताया जा रहा है।
विज्ञप्ति में निर्धारित समय-सीमा का भी पालन नहीं हुआ। चयनित अभ्यर्थी द्वारा 10 दिनों के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं किया गया और देरी से शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया, जबकि नियमों के अनुसार ऐसी स्थिति में प्रतीक्षा सूची के पहले अभ्यर्थी को अवसर मिलना चाहिए था।
प्रकरण में उच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों का उल्लंघन भी बताया गया है, जिनमें अनुभव को वरीयता देने और “एडहॉक को एडहॉक से न बदलने” के सिद्धांत स्पष्ट हैं। इसके अलावा पात्र-अपात्र सूची को जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड न कर केवल नोटिस बोर्ड तक सीमित रखने से पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हुए हैं। अब यह मामला प्रशासनिक गलती से आगे बढ़कर संभावित न्यायिक अवमानना की ओर इशारा कर रहा है। प्रार्थी ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest News

error: Content is protected !!