दुर्लभ हॉर्नबिल संरक्षण की विशेष पहल उदंती-सीतानदी में विकसित हो रहे प्राकृतिक उद्यान

• ‘हॉर्नबिल रेस्टोरेंट’ से मिलेगा सुरक्षित आवास और भरपूर भोजन

रायपुर । दुनिया के सबसे आकर्षक और विशिष्ट पक्षियों में शामिल हॉर्नबिल के संरक्षण को लेकर छत्तीसगढ़ में एक अनूठी और दूरदर्शी पहल की जा रही है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में दुर्लभ मालाबार पाइड हॉर्नबिल के संरक्षण के लिए विशेष प्राकृतिक उद्यान विकसित किए जा रहे हैं, जिन्हें “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” का नाम दिया गया है। यह पहल जैव विविधता संरक्षण की दिशा में राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
विशाल आकार, बड़ी और मजबूत चोंच, रंगीन पंख तथा शोरगुल भरे व्यवहार के कारण हॉर्नबिल को जंगल के सबसे अलग और पहचान योग्य पक्षियों में गिना जाता है। इनकी घोंसला बनाने की अनोखी आदतें भी इन्हें विशेष बनाती हैं। हॉर्नबिल को ‘जंगल का किसान’ या ‘फॉरेस्ट इंजीनियर’ कहा जाता है, क्योंकि ये फल खाने के बाद बीजों को दूर-दूर तक फैलाते हैं, जिससे वनों का प्राकृतिक विस्तार होता है।


वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण कुमार पाण्डेय के नेतृत्व में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व प्रबंधन द्वारा यह अभिनव योजना शुरू की गई है। इसका उद्देश्य हॉर्नबिल प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे को कम करना और उनके लिए सुरक्षित एवं अनुकूल वातावरण तैयार करना है।

‘हॉर्नबिल रेस्टोरेंट’ किसी प्रकार का कृत्रिम ढांचा नहीं होगा, बल्कि जंगल और आसपास के क्षेत्रों में फलदार वृक्षों का प्राकृतिक समूह विकसित किया जाएगा। इसके तहत पीपल, बरगद और फाइकस प्रजाति के पौधों का रोपण किया जा रहा है, जिनके फल हॉर्नबिल का प्रमुख आहार हैं। इससे इन पक्षियों को पूरे वर्ष प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होगा और उनके आवास क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।
संरक्षण योजना के अंतर्गत घोंसलों की नियमित निगरानी, कृत्रिम घोंसलों की स्थापना, अनुसंधान कार्य और स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ‘घोंसला गोद लेने’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीणों को संरक्षण से जोड़ा जा रहा है, जिससे जागरूकता के साथ जिम्मेदारी भी बढ़े।
उल्लेखनीय है कि सामान्यतः पश्चिमी घाट क्षेत्र में पाए जाने वाले मालाबार पाइड हॉर्नबिल अब उदंती-सीतानदी क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में दिखाई देने लगे हैं। अनुकूल जलवायु, घना जंगल और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां इनकी उपस्थिति तेजी से बढ़ी है। पहले जहां इनका दर्शन कभी-कभार होता था, वहीं अब सप्ताह में दो से तीन बार इनके समूह देखे जा रहे हैं। समुद्र तल से लगभग 800 से 1000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र इनके लिए आदर्श आवास साबित हो रहा है।
इन दुर्लभ पक्षियों की सुरक्षा के लिए विशेष ट्रैकिंग टीमें गठित की गई हैं, जिनमें वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं को भी शामिल किया गया है। ये टीमें घोंसलों की सुरक्षा, गतिविधियों की निगरानी और संभावित खतरों पर नजर रख रही हैं। साथ ही ड्रोन तकनीक के माध्यम से शिकार गतिविधियों और वनाग्नि पर भी कड़ी निगरानी की जा रही है।
वन विभाग का मानना है कि यह पहल न केवल पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण को मजबूती देगी, बल्कि ईको-टूरिज्म को भी बढ़ावा देगी। पर्यटक प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित दूरी से इन दुर्लभ पक्षियों को देख सकेंगे, जिससे क्षेत्र की पहचान बढ़ेगी और लोगों में वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता भी पैदा होगी।

The News Related To The News Engaged In The https://apnachhattisgarh.com Web Portal Is Related To The News Correspondents The Editor Does Not Necessarily Agree With These Reports The Correspondent Himself Will Be Responsible For The News.



