दुर्ग मॉडल: पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण उद्यमिता की मिसाल, कोलिहापुरी बना जिले का प्रथम मटेरियल रिकवरी सेंटर
381 गांवों का कचरा अब बनेगा कमाई का साधन
जिला प्रशासन की वेस्ट टू वेल्थ पहल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दी नई उड़ान
रायपुर । छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले ने स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के कार्यान्वयन में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। जनपद पंचायत दुर्ग द्वारा ग्राम पंचायत कोलिहापुरी में स्थापित प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई को अब जिले के प्रथम आधिकारिक मटेरियल रिकवरी सेंटर (एमआरसी) के रूप में विकसित किया गया है। यह केंद्र न केवल कचरा निपटान का एक केंद्र है, बल्कि यह आत्मनिर्भर ग्राम स्वराज की दिशा में एक सशक्त कदम है।

तकनीकी मार्गदर्शन और सामुदायिक भागीदारी से कचरा प्रबंधन बना लाभदायक उद्यम इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए कलेक्टर श्री अभिजित सिंह ने कहा कि "कोलिहापुरी एमआरसी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन के साथ- साथ ग्रामीण क्षेत्रों में वेस्ट टू वेल्थ (कचरे से कमाई) के मॉडल को मूर्त रूप देना है। यह केंद्र इस बात का प्रमाण है कि यदि सही तकनीकी मार्गदर्शन और सामुदायिक भागीदारी हो, तो ग्रामीण कचरा प्रबंधन को एक लाभदायक उद्यम में बदला जा सकता है। हम इस मॉडल को पूरे जिले के लिए एक मानक (बेंचमार्क) के रूप में देख रहे हैं।"
381 गांवों के प्लास्टिक कचरे का वैज्ञानिक पद्धति से रिसाइकिल जिला पंचायत दुर्ग के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री बजरंग दुबे ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि कोलिहापुरी एमआरसी को जिले के स्वच्छता अभियान का नोडल सेंटर बनाया गया है। इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार करते हुए दुर्ग जनपद के सभी 81 ग्रामों, धमधा के ग्राम लिटिया और पाटन के ग्राम पतोरा की इकाइयों को इस केंद्र से लिंकेज प्रदान की गई है। इस एकीकृत तंत्र के माध्यम से जिले के कुल 381 गांवों में उत्पन्न होने वाले प्लास्टिक कचरे को एकत्र कर उसे वैज्ञानिक पद्धति से रिसाइकिल किया जा रहा है।
गांवों के सेग्रीगेशन शेड से प्लास्टिक वेस्ट के संग्रहण की रियल-टाइम मॉनिटरिंग कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती—यानी घर-घर से कचरा संग्रहण—को हल करने के लिए जिला प्रशासन ने स्मार्ट तकनीक का उपयोग किया है। कचरा प्रबंधन में तकनीक का समावेश करते हुए, जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफ) के माध्यम से 04 अत्याधुनिक ई-रिक्शा उपलब्ध कराए गए हैं। इन रिक्शाओं की विशेषता यह है कि इनमें जीपीएस ट्रैकिंग प्रणाली स्थापित की गई है, जो सीधे कंट्रोल रूम से जुड़ी है। इसके माध्यम से गांवों के सेग्रीगेशन शेड से प्लास्टिक वेस्ट के संग्रहण की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है। यह संपूर्ण प्रक्रिया केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के पोर्टल पर पंजीकृत है, जो इसके वैज्ञानिक और कानूनी मानकों के अनुरूप होने की पुष्टि करती है।
आर्थिक स्वावलंबन और वेस्ट टू वेल्थ का मॉडल यह केंद्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता की एक सफल गाथा लिख रहा है, जहां प्रतिदिन 150 किलोग्राम प्लास्टिक कचरे को आधुनिक मशीनों के जरिए प्रसंस्करण किया जा रहा है। प्लास्टिक को पिघलाकर उससे लम्स (लम्प्स) तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी बाजार में भारी मांग है। इन लम्स को 20 से 25 रुपये प्रति किलो की दर से बड़ी निर्माण कंपनियों को बेचा जा रहा है। पिछले छह महीनों के सफल संचालन के उपरांत, सभी परिचालन खर्चों, बिजली शुल्क, मशीनों के रखरखाव और श्रमिकों के मानदेय का भुगतान करने के पश्चात इकाई प्रतिमाह लगभग 15 हजार रुपए का शुद्ध लाभांश अर्जित कर रही है।
सामाजिक सुरक्षा के साथ समान साप्ताहिक मजदूरी और बीमा कवरेज भी इस परियोजना ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए द्वार खोले हैं। एएस पॉलिमर के साथ हुए एमओयू के तहत स्थानीय निवासियों को प्रत्यक्ष रोजगार दिया गया है। श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए उन्हें मनरेगा दरों के समान साप्ताहिक मजदूरी और बीमा कवरेज प्रदान किया गया है। इस मॉडल का सामाजिक पहलू अत्यंत सराहनीय है कि 5 प्रतिशत लाभ ग्राम पंचायत को सामाजिक कल्याण गतिविधियों के लिए, 5 प्रतिशत लाभ स्थानीय शिव शक्ति स्व-सहायता समूह को सशक्तिकरण हेतु दिया गया है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम यह परियोजना स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और मनरेगा के अभिसरण (कन्वर्जेंस) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। विगत वर्ष 2024 में स्वच्छ भारत मिशन से 6 लाख और मनरेगा से 12 लाख, कुल 18 लाख की लागत से भवन तैयार किया गया। मशीनरी बेलिंग, फटका और श्रेडर मशीनें स्थापित करने हेतु लगभग 8 लाख स्वच्छ भारत मिशन से उपलब्ध कराई गई है। निजी भागीदारी एएस पॉलिमर द्वारा परियोजना में 9 लाख का निवेश किया गया है और बिजली कनेक्शन हेतु 1 लाख रुपये का योगदान दिया गया है। ग्राम पंचायत द्वारा इकाई के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराई गई है। जनपद पंचायत दुर्ग के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बताते हुए कहा कि यह मॉडल न केवल गांवों को कचरा मुक्त रखेगा, बल्कि ग्रामीण विकास के लिए एक सतत आय का स्रोत भी बना रहेगा। 11 महीने की अवधि वाला यह समझौता ज्ञापन (एमओयू) दुर्ग जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में सक्षम है।

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