अमरकंटक कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा साल बोरर कीट प्रबंधन पर एक दिवसीय प्रशिक्षण संपन्न।


साल वृक्षों पर साल बोरर कीट सबसे ज्यादा खतरनाक – डॉ.अनिल कुर्मी
संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय


अमरकंटक । मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली / पवित्र नगरी अमरकंटक जो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मध्य स्थित है । यहां के साल वनों में बढ़ते साल बोरर कीट के प्रकोप को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक द्वारा एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । यह प्रशिक्षण 10 नवंबर 2025 को संपन्न हुआ जिसमें वन विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी , फील्ड स्टाफ , एवं नर्मदा समग्र संस्था के अधिकारी उपस्थित रहे ।

प्रशिक्षण के दौरान पौध सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ.अनिल कुर्मी ने बताया कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में देश के कुल साल वनों का लगभग 25 प्रतिशत क्षेत्र आता है । साल वृक्षों को अनेक प्रकार के कीट प्रभावित करते हैं जिनमें साल बोरर सबसे ज्यादा विनाशकारी माना जाता है । यह कीट खड़े और ताजे कटे हुए दोनों प्रकार के साल वृक्षों को नुकसान पहुंचाता है ।जब किसी वन क्षेत्र में 1% से अधिक पेड़ इस कीट से प्रभावित हों तो इसे महामारी की स्थिति माना जाता है ।

डॉ. कुर्मी ने बताया कि साल बोरर कीट गहरे भूरे रंग का होता है जिसके दो कांटेदार एंटीना शरीर से भी लंबे होते हैं । इसकी लंबाई लगभग 3 – 7 सेंटीमीटर तक होती है और इसका जीवनचक्र एक वर्ष का होता है जिसमें अंडा , इल्ली , प्यूपा और वयस्क — चार अवस्थाएँ शामिल हैं ।
मानसून की पहली बारिश के साथ वयस्क कीट साल वृक्षों से बाहर निकलते हैं और यह प्रक्रिया पूरे मानसून भर चलती रहती है । मादा कीट सामान्यतः गिरे हुए या कमजोर पेड़ों पर अंडे देती है जिनसे निकली इल्लियाँ लकड़ी के भीतर सुरंगें बनाती हैं । अधिक प्रकोप होने पर पेड़ सूख जाते हैं और उनकी पत्तियाँ मुरझा जाती हैं ।
प्रशिक्षण में बताया गया कि इस कीट के नियंत्रण हेतु सतत निगरानी आवश्यक है । दिसंबर से फरवरी के बीच प्रभावित पेड़ों की पहचान उन्हें चिन्हित और वर्गीकृत करना चाहिए । मानसून आने से पहले मृत और मरणासन्न पेड़ों को काटकर जंगल से हटा देना चाहिए । साथ ही साल बीज संग्रहण को प्रभावित क्षेत्रों में स्थगित करना चाहिए जब तक की क्षेत्र पुनर्जीवित न हो जाए । लकड़ी के डिपो साल वनों से कम से कम 3 किलोमीटर दूर होने चाहिए ताकि संक्रमण का फैलाव रोका जा सके ।

इस अवसर पर ट्रेप-ट्री तकनीक को सबसे प्रभावी उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया । विशेषज्ञों ने बताया कि जून के अंत या जुलाई के पहले सप्ताह में पहली बारिश के साथ ही ट्रेप-ट्री प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए । इसके अंतर्गत प्रति हेक्टेयर 1 – 2 पेड़ (60 – 90 सेंटीमीटर परिधि वाले) गिराकर उन्हें दो से तीन मीटर लंबे लट्ठों में काटा जाता है । इन लट्ठों की छाल को पीट कर रस निकाला जाता है जो कीटों को आकर्षित करता है । दस दिन बाद सुखी छाल हटाकर फिर से पीटना चाहिए ताकि ताजा रस निकले । रस पीकर कीट सुस्त हो जाते हैं जिससे उन्हें जाल से पकड़ना और मिट्टी के तेल में डुबोकर मारना आसान हो जाता है ।
वन मंडलाधिकारी श्रीमती करुणा वर्मा अनूपपुर ने सुझाव हेतु आमंत्रित राज्य वन अनुसंधान केंद्र जबलपुर से पधारे डॉ उदय होमकर द्वारा दिनांक 10 एवं 11 – 2025 को साल बोरर प्रभावित वन क्षेत्र का विशेष निरीक्षण करते हुए अपना सुझाव दिए कि पेड़ की इल्लियां या कीड़े अभी सुसूक्त अवस्था में है । जब अप्रैल , मई महीना आयेगा तब ये कीड़ों का उपचार करना उचित समय माना जाएगा या ठीक समय रहेगा ।

अमरकंटक वन परिक्षेत्राधिकारी व्ही के श्रीवास्तव ने बताया कि अमरकंटक जंगल भ्रमण कर उच्चाधिकारियों ने निर्देशित किया कि सभी कक्षों में पांच पांच सैंपल प्लाट डालकर साल बोरर प्रभावित वृक्षों की गणना करके डाटा उपलब्ध कराया जाय । जिसके परिपालन में गणना की कार्यवाही की जा रही है ।

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